अध्याय ९६: शरभ-प्रादुर्भावः, नृसिंह-दर्पशमनम्, विष्णोः शिवस्तुतिः, फलश्रुति
स्थूला ये हि प्रपश्यन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् द्यावापृथिव्या इन्द्राग्नियमस्य वरुणस्य च
sthūlā ye hi prapaśyanti tadviṣṇoḥ paramaṃ padam dyāvāpṛthivyā indrāgniyamasya varuṇasya ca
जो स्थूल-बुद्धि हैं, वे उसी को विष्णु का परम पद मानते हैं; और इसी प्रकार द्यावा-पृथिवी तथा इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण आदि के लोक-वैभव को भी परम समझते हैं। पर पतिक (शिव) के अन्वेषी के लिए ये सब संसार के सीमित अधिकार हैं, पाश से अंतिम मुक्ति नहीं।
Suta Goswami