अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्य — काशी-वाराणसी में मोक्ष, लिङ्ग-तीर्थ-मानचित्र, और उपासना-विधि
रोचते मे सदा वासो येन कार्येण तच्छृणु मन्मना मम भक्तश् च मयि नित्यार्पितक्रियः
rocate me sadā vāso yena kāryeṇa tacchṛṇu manmanā mama bhaktaś ca mayi nityārpitakriyaḥ
जिस आचरण से मेरा निवास सदा प्रिय होता है, उसे सुनो। वह मन से मुझमें ही लगा रहे, मेरा भक्त बने, और अपने समस्त कर्म नित्य मुझमें अर्पित करे।
Shiva (as teacher within Suta’s narration)