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Shloka 14

अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्य — काशी-वाराणसी में मोक्ष, लिङ्ग-तीर्थ-मानचित्र, और उपासना-विधि

क्वचित् प्रफुल्लाम्बुजरेणुभूषितैर् विहङ्गमैश् चानुकलप्रणादिभिः विनादितं सारसचक्रवाकैः प्रमत्तदात्यूहवरैश् च सर्वतः

kvacit praphullāmbujareṇubhūṣitair vihaṅgamaiś cānukalapraṇādibhiḥ vināditaṃ sārasacakravākaiḥ pramattadātyūhavaraiś ca sarvataḥ

कहीं-कहीं वह प्रदेश प्रफुल्ल कमलों की पराग-धूलि से भूषित था और पक्षियों के मधुर, लयबद्ध कलरव से गूँजता था। सर्वत्र सारस और चक्रवाक के स्वर तथा प्रमुदित श्रेष्ठ दात्यूह पक्षियों की ध्वनि प्रतिध्वनित होती थी—ऐसा पावन नाद पाशु को स्थिर कर मन को पति, श्रीशिव की ओर अंतर्मुख करता है।

क्वचित्in some places
क्वचित्:
प्रफुल्लfully blossomed
प्रफुल्ल:
अम्बुजlotus
अम्बुज:
रेणुpollen-dust
रेणु:
भूषितैःadorned with
भूषितैः:
विहङ्गमैःby birds
विहङ्गमैः:
and
:
अनुकलin rhythm/keeping time
अनुकल:
प्रणादिभिःwith calls/sounds
प्रणादिभिः:
विनादितम्made resonant, filled with sound
विनादितम्:
सारसsarasa crane
सारस:
चक्रवाकैःby cakravāka birds
चक्रवाकैः:
प्रमत्तdelighted, intoxicated with joy
प्रमत्त:
दात्यूहa water-bird (dātyūha)
दात्यूह:
वरैःexcellent, best
वरैः:
and
:
सर्वतःon all sides, everywhere
सर्वतः:

Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)