ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
विदितं नास्ति वेद्यं च निर्वाणं परमार्थतः निर्वाणं चैव कैवल्यं निःश्रेयसमनामयम्
viditaṃ nāsti vedyaṃ ca nirvāṇaṃ paramārthataḥ nirvāṇaṃ caiva kaivalyaṃ niḥśreyasamanāmayam
परमार्थ में निर्वाण न तो पहले से जाना हुआ है, न वह जानने योग्य कोई वस्तु है। निर्वाण ही कैवल्य है—निर्दोष, शोक-रहित परम कल्याण (निःश्रेयस)।
Suta Goswami (narrating the teaching within the Linga Purana’s liberation discourse)