ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
अज्ञान = सोउर्चे ओफ़् संसार नान्तःप्रज्ञो बहिःप्रज्ञो न चोभयगतस् तथा न प्रज्ञानघनस्त्वेवं न प्राज्ञो ज्ञानपूर्वकः
ajñāna = source of saṃsāra nāntaḥprajño bahiḥprajño na cobhayagatas tathā na prajñānaghanastvevaṃ na prājño jñānapūrvakaḥ
अज्ञान ही संसार में बहाने वाली धारा है। उससे बँधा पशु न भीतर से जाग्रत होता है, न बाहर से, न दोनों में स्थित; न उसकी चेतना घनी-स्थिर होती है। इसलिए वह प्राज्ञ नहीं—जब तक पहले सम्यक् ज्ञान उदित न हो, जो मोक्ष का कारण है।
Suta Goswami (narrating Shaiva teaching within the Linga Purana discourse)