ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
किमनेन द्विजश्रेष्ठा विषं वक्ष्ये सुदारुणम् संहरेत्तद्विषं यस्तु स समर्थो ह्यनेन किम्
kimanena dvijaśreṣṭhā viṣaṃ vakṣye sudāruṇam saṃharettadviṣaṃ yastu sa samartho hyanena kim
हे द्विजश्रेष्ठो! इसका क्या प्रयोजन? मैं एक अत्यन्त भयानक विष की बात कहता हूँ। जो उस विष को सचमुच नष्ट कर सके, वही समर्थ है; फिर उसे और किसकी आवश्यकता?
Suta Goswami (narrating to the sages at Naimisharanya)