ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
वर्तमानस्तदा तस्य जाग्रदित्यभिधीयते मनोबुद्धिर् अहङ्कारं चित्तं चेति चतुष्टयम्
vartamānastadā tasya jāgradityabhidhīyate manobuddhir ahaṅkāraṃ cittaṃ ceti catuṣṭayam
जब देहधारी जीव वर्तमान बाह्य अवस्था में प्रवृत्त होता है, तब वह ‘जाग्रत्’ कहलाती है। उसमें अन्तःकरण का चतुष्टय—मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त—कार्य करता है।
Suta Goswami