ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
तथाष्टचत्वारिंशच्च षट्पञ्चाशत्प्रकारतः चतुःषष्टिविधं चैव दुःखमेव विवेकिनः
tathāṣṭacatvāriṃśacca ṣaṭpañcāśatprakārataḥ catuḥṣaṣṭividhaṃ caiva duḥkhameva vivekinaḥ
इसी प्रकार विवेकी जन दुःख को अड़तालीस प्रकार का, और छप्पन प्रकार के रूपों वाला, तथा चौसठ विधियों वाला भी कहते हैं; विवेक से देखा जाए तो यह सब केवल दुःख ही है—पाश में बँधा पशु, जब तक पति शिव की शरण नहीं लेता, तब तक बँधा रहता है।
Suta Goswami (narrating the teaching within the Linga Purana discourse to the sages of Naimisharanya)