ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
न च स्पर्शं विजानाति स वै समरसः स्मृतः पार्थिवे पटले ब्रह्मा वारितत्त्वे हरिः स्वयम्
na ca sparśaṃ vijānāti sa vai samarasaḥ smṛtaḥ pārthive paṭale brahmā vāritattve hariḥ svayam
वह स्पर्श को भी नहीं जानता; वही समरस (समत्व-स्थित) कहा गया है। पार्थिव पटल में ब्रह्मा और वारि-तत्त्व में स्वयं हरि (विष्णु) अधिष्ठाता है।
Suta Goswami