ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
तत्क्षयाद्धि भवेन्मुक्तिर् नान्यथा जन्मकोटिभिः ज्ञानमेकं विना नास्ति पुण्यपापपरिक्षयः
tatkṣayāddhi bhavenmuktir nānyathā janmakoṭibhiḥ jñānamekaṃ vinā nāsti puṇyapāpaparikṣayaḥ
बंधनोत्पादक कर्म के क्षय से ही मुक्ति होती है, अन्यथा नहीं—करोड़ों जन्मों से भी नहीं। एकमात्र ज्ञान के बिना पुण्य-पाप का पूर्ण क्षय नहीं होता।
Suta Goswami (narrating the teaching contextually as Linga Purana doctrine)