ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)
अपरामृष्टमद्यैव विज्ञेयं मुक्तिदं त्विदम् अज्ञानमलपूर्वत्वात् पुरुषो मलिनः स्मृतः
aparāmṛṣṭamadyaiva vijñeyaṃ muktidaṃ tvidam ajñānamalapūrvatvāt puruṣo malinaḥ smṛtaḥ
जैसे संस्कार-स्पर्श से रहित मद्य त्याज्य समझा जाता है, वैसे ही यह उपदेश ‘मुक्तिदायक’ जानना चाहिए। क्योंकि पुरुष पहले से ही अज्ञान-मल से आच्छादित होने के कारण ‘मलिन’ कहा गया है।
Suta Goswami (narrating Shaiva doctrine as received in the Linga Purana tradition)