शिवार्चनविधिः — देवतानां पाशुपतव्रतप्राप्तिः तथा पशुपाशविमोक्षणम् (अध्याय ८०)
अथ द्वादशवर्षं वा मासद्वादशकं तु वा दिनद्वादशकं वापि कृत्वा तद् व्रतम् उत्तमम्
atha dvādaśavarṣaṃ vā māsadvādaśakaṃ tu vā dinadvādaśakaṃ vāpi kṛtvā tad vratam uttamam
फिर उस उत्तम व्रत को—चाहे बारह वर्ष, या बारह मास, अथवा बारह दिन—विधिपूर्वक करके (भक्त शिव-पूजा के उच्च फल का अधिकारी होता है); क्योंकि ऐसा नियमबद्ध अनुष्ठान पशु (बद्ध जीव) को शुद्ध कर पति, परमेश्वर की ओर प्रवृत्त करता है।
Suta Goswami (narrating the vrata-vidhi to the sages of Naimiṣāraṇya)