Adhyaya 70: आदिसर्गः—महत्-अहङ्कार-तन्मात्रा-भूतसृष्टिः, ब्रह्माण्डावरणम्, प्रजासर्गः, त्रिमूर्ति-शैवाधिष्ठानम्
बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान् हितं तथा यस्माद्बोधयते चैव बुद्धिस्तेन निरुच्यते
budhyate puruṣaścātra sarvān bhāvān hitaṃ tathā yasmādbodhayate caiva buddhistena nirucyate
यहाँ पुरुष समस्त भावों को तथा जो वास्तव में हितकर है उसे जानता है; और जो उसे बोध कराती व जाग्रत करती है, वही ‘बुद्धि’ कहलाती है।
Suta Goswami