भुवनकोशस्वभाववर्णनम् — सप्तद्वीप-पर्वत-लोकविन्यासः तथा यक्ष-उमा-प्रकाशः
दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य यक्षस्य वह्निर्न शशाक विप्राः वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये स्वान्स्वान्प्रभावान् सकलामरेन्द्राः
dagdhuṃ tṛṇaṃ vāpi samakṣamasya yakṣasya vahnirna śaśāka viprāḥ vāyustṛṇaṃ cālayituṃ tathānye svānsvānprabhāvān sakalāmarendrāḥ
हे विप्रों, उस यक्ष के सामने अग्नि तृण का एक तिनका भी न जला सका; वैसे ही वायु उसे हिला भी न सका। इस प्रकार समस्त देवेशों की अपनी-अपनी शक्तियाँ निष्फल हो गईं।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)