भुवनकोशस्वभाववर्णनम् — सप्तद्वीप-पर्वत-लोकविन्यासः तथा यक्ष-उमा-प्रकाशः
परार्धे तु तमो नित्यं लोकालोकस्ततः स्मृतः एवं संक्षेपतः प्रोक्तो भूर्लोकस्य च विस्तरः
parārdhe tu tamo nityaṃ lokālokastataḥ smṛtaḥ evaṃ saṃkṣepataḥ prokto bhūrlokasya ca vistaraḥ
उसके परार्ध में सदा अन्धकार है; इसलिए वह ‘लोकालोक’—लोक और अलोक का सीमापर्वत—कहलाता है। इस प्रकार संक्षेप में भूरलोक का विस्तार कहा गया।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)