श्वेतमुनिना कालस्य निग्रहः (मृत्युञ्जय-भक्ति-प्रसादः)
ससर्जुर् अस्य मूर्ध्नि वै मुनेर्भवस्य खेचराः सुशोभनं सुशीतलं सुपुष्पवर्षमंबरात्
sasarjur asya mūrdhni vai munerbhavasya khecarāḥ suśobhanaṃ suśītalaṃ supuṣpavarṣamaṃbarāt
तब आकाशचारी दिव्य जनों ने गगन से भव-स्वरूप मुनि के मस्तक पर सुशोभित, शीतल, उत्तम पुष्पों की वर्षा की।
Suta Goswami