आभ्यन्तरध्यान-तत्त्वगणना-चतुर्व्यूहयोगः
Adhyaya 28
महांस् तथा त्वहङ्कारं तन्मात्रं पञ्चकं पुनः कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा बुद्धीन्द्रियाणि च
mahāṃs tathā tvahaṅkāraṃ tanmātraṃ pañcakaṃ punaḥ karmendriyāṇi pañcaiva tathā buddhīndriyāṇi ca
प्रकृति से महत् उत्पन्न होता है, फिर अहंकार प्रकट होता है। उसके बाद पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं; साथ ही पाँच कर्मेन्द्रियाँ और वैसे ही पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ भी। इसी से पशु के लिए पाश—बंधन का क्षेत्र—विस्तृत होता है, जिसे पति—शिव—के अधीन होकर जीता जाता है।
Suta Goswami (narrating the cosmological teaching within the Linga Purana discourse)