ध्यानयोगेन रुद्रदर्शनम् — रुद्रावतार-परिवर्तक्रमः, लकुली (कायावतार), पाशुपतयोगः, लिङ्गार्चन-निष्ठा
तीर्णस्तारयते जन्तुर् दश पूर्वान्दशोत्तरान् आत्मानमेकविंशं तु तारयित्वा महालये
tīrṇastārayate jantur daśa pūrvāndaśottarān ātmānamekaviṃśaṃ tu tārayitvā mahālaye
जो स्वयं तर गया, वही प्राणी तारक बनता है; वह दस पूर्वजों और दस उत्तरजों का उद्धार करता है, और इक्कीसवें रूप में महालय में स्वयं को भी पार लगाता है।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)