
Īśvara-gītā (Adhyāya 2) — Ātma-svarūpa, Māyā, and the Unity of Sāṅkhya–Yoga
ईश्वर-गीता के इस अध्याय में भगवान् पहले से भी अधिक गूढ़ आत्म-ज्ञान बताते हैं, जिसे देवता भी कठिनाई से समझते हैं। वे आत्मा को एकाकी, स्व-प्रतिष्ठित, सूक्ष्म, नित्य और तम से परे अंतःसाक्षी कहते हैं तथा पंचतत्त्व, इन्द्रियाँ, मन, प्राण और कर्तृत्व से तादात्म्य का निषेध करते हैं। अज्ञान और अध्यास से बंधन, अहंकार, कर्म, पुण्य-पाप और देहधारण उत्पन्न होते हैं। प्रकाश-अंधकार, धुएँ से अछूता आकाश, और आधार से रंगा स्फटिक जैसे दृष्टान्तों से बताया गया है कि मायाजनित उपाधियों से निर्मल आत्मा बंधी-सी प्रतीत होती है। श्रवण-मनन-निदिध्यासन और अविच्छिन्न योग-स्थित से प्रत्यक्ष बोध होता है—सबमें आत्मा और आत्मा में सबका दर्शन—जिससे समाधि, कैवल्य और हृदय की वासनाओं का क्षय होता है। भगवान् सांख्य और योग की एकता बताते हैं: योग एकाग्रता है और ज्ञान उसका फल; सिद्धियों में आसक्त योगियों से सावधान करते हैं। अंत में सायुज्य और पुनर्जन्म-रहित अवस्था का वर्णन कर, उपदेश को योग्य पुत्र, शिष्य या योगी तक सीमित रखते हुए आगे के रहस्यों की भूमिका बाँधते हैं।
Verse 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) प्रथमो ऽध्यायः ईश्वर उवाच अवाच्यमेतद् विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् / यन्न देवा विजानन्ति यतन्तो ऽपि द्विजातयः
इस प्रकार श्रीकूर्मपुराण की षट्साहस्त्री संहिता के उत्तरविभाग में, ईश्वरगीता का प्रथम अध्याय। ईश्वर बोले—यह विज्ञान अवाच्य है, आत्मा का सनातन रहस्य है; जिसे देवता भी नहीं जानते, और प्रयत्न करते हुए भी द्विजाति नहीं जान पाते।
Verse 2
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः / न संसारं प्रपद्यन्ते पूर्वे ऽपि ब्रह्मवादिनः
इस ज्ञान का आश्रय लेकर श्रेष्ठ द्विज ब्रह्मभाव में स्थित हो जाते हैं; और पूर्वकाल के ब्रह्मवादी मुनि भी फिर संसार-चक्र में नहीं गिरते।
Verse 3
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः / वक्ष्ये भक्तिमतामद्य युष्माकं ब्रह्मवादिनाम्
गुप्त से भी अति-गुप्त, प्रत्यक्ष सत्य—जिसे यत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए—उस उपदेश को मैं आज तुम भक्त और ब्रह्मवादी जनों से कहूँगा।
Verse 4
आत्मायः केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः / अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः
आत्मा एकमेव, स्वयंसिद्ध, शान्त, सूक्ष्म और सनातन है। वह सबके भीतर स्थित साक्षी है—केवल चैतन्य—अज्ञानरूपी तम से परे।
Verse 5
सो ऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः / स कालो ऽग्निस्तदव्यक्तं स एवेदमिति श्रुतिः
वही अन्तर्यामी है, वही पुरुष है, वही प्राण है, वही महेश्वर है। वही काल है, वही अग्नि है, वही अव्यक्त है—श्रुति कहती है: ‘वही यह सब है’।
Verse 6
अस्माद् विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते / स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः
उसी से यह समस्त विश्व उत्पन्न होता है और उसी में लीन हो जाता है। वह मायापति, मानो अपनी ही माया से बँधा हुआ, विविध देह-रूप धारण करता है।
Verse 7
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत् प्रभुः / नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः
यह परम प्रभु न स्वयं संसार में भटकता है, न किसी को भटकाता है। वह न पृथ्वी है, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश।
Verse 8
न प्राणे न मनो ऽव्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च / न रूपरसगन्धाश्च नाहं कर्ता न वागपि
मैं न प्राण हूँ, न मन, न अव्यक्त। मैं न शब्द हूँ, न स्पर्श; न रूप, रस, गन्ध। मैं कर्ता नहीं, और वाणी भी नहीं।
Verse 9
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं द्विजोत्तमाः / न कर्ता न च भोक्ता वा न च प्रकृतिपूरुषौ / न माया नैव च प्राश्चैतन्यं परमार्थतः
हे द्विजोत्तमो! परमार्थ में उसके न हाथ-पाँव हैं, न पायु, न उपस्थ। वह न कर्ता है, न भोक्ता; न प्रकृति-पुरुष की द्वैतता। वह न माया है, न आद्य (प्राक्) चैतन्य—यही परम सत्य है।
Verse 10
यथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धो नोपपद्यते / तद्वदैक्यं न संबन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः
जैसे प्रकाश और तमस का वास्तविक सम्बन्ध नहीं बनता, वैसे ही प्रपञ्च और परमात्मा के बीच कहा गया ‘ऐक्य’ भी सम्बन्ध नहीं है; सम्बन्ध तो केवल प्रपञ्च में ही होता है।
Verse 11
छायातपौ यथा लोके परस्परविलक्षणौ / तद्वत् प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः
जैसे लोक में छाया और धूप परस्पर भिन्न हैं, वैसे ही परमार्थ में प्रपञ्च और पुरुष (चेतन आत्मा) अलग-अलग हैं।
Verse 12
यद्यात्मा मलिनो ऽस्वस्थो विकारी स्यात् स्वभावतः / नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि
यदि आत्मा स्वभाव से मलिन, अस्थिर और विकारी हो, तो ऐसे जन को सैकड़ों जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिलती।
Verse 13
पश्यन्ति मुनयो युक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः / विकारहीनं निर्दुः खमानन्दात्मानमव्ययम्
योग में स्थित संयमी मुनि परमार्थतः अपने आत्मस्वरूप को देखते हैं—जो विकाररहित, दुःखरहित, आनन्दस्वरूप और अव्यय है।
Verse 14
अहं कर्ता सुखी दुः खी कृशः स्थूलेति या मतिः / सा चाहङ्कारकर्तृत्वादात्मन्यारोप्यते जनैः
“मैं कर्ता हूँ, मैं सुखी-दुःखी हूँ, मैं दुबला- मोटा हूँ”—यह बुद्धि अहंकारजन्य कर्तृत्व से उत्पन्न होकर लोग आत्मा पर आरोपित कर देते हैं।
Verse 15
वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम् / भोक्तारमक्षरं शुद्धं सर्वत्र समवस्थितम्
वेद के ज्ञाता आत्मा को साक्षी, प्रकृति से परे परम, भोक्ता, अक्षर, शुद्ध और सर्वत्र समभाव से स्थित बताते हैं।
Verse 16
तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम् / अज्ञानादन्यथा ज्ञानं तच्च प्रकृतिसंगतम्
इसलिए समस्त देहधारियों का संसार अज्ञानमूल है। अज्ञान से ही विपरीत-सा ज्ञान उत्पन्न होता है, और वह प्रकृति से संयुक्त रहता है।
Verse 17
नित्योदितः स्वयं ज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः / अहङ्काराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते
परम पुरुष नित्य प्रकाशित, स्वयंज्योति और सर्वव्यापी है; पर अहंकारजन्य अविवेक से जीव ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेता है।
Verse 18
पश्यन्ति ऋषयो ऽव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् / प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः
ऋषि उस अव्यक्त को देखते हैं जो नित्य है और सत्-असत् दोनों का स्वरूप लिए है। उसे प्रधान, प्रकृति जानकर ब्रह्मवादी उसे जगत् का कारण कहते हैं।
Verse 19
तेनायं संगतो ह्यात्मा कूटस्थो ऽपि निरञ्जनः / स्वात्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्येत तत्त्वतः
उसी (अविद्या) से यह आत्मा देह-मन से संयुक्त-सा प्रतीत होता है, जबकि वह कूटस्थ, निरंजन और साक्षी है। इसलिए मनुष्य अपने आत्मा को अक्षर ब्रह्म रूप में तत्त्वतः नहीं जान पाता।
Verse 20
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद् दुः खं तथेतरम् / रगद्वेषादयो दोषाः सर्वे भ्रान्तिनिबन्धनाः
अनात्मा में आत्मबुद्धि होने से ही दुःख और मोक्ष-विरोधी सब कुछ उत्पन्न होता है। राग-द्वेष आदि समस्त दोष भ्रान्ति को ही कारण मानकर बँधे हैं।
Verse 21
कर्मण्यस्य भवेद् दोषः पुण्यापुण्यमिति स्थितिः / तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः
इस देही के कर्म में ‘पुण्य’ और ‘पाप’ नामक स्थिति उत्पन्न होती है। उसी के अधीन सब प्राणियों के लिए सब प्रकार के देहों की उत्पत्ति होती है।
Verse 22
नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः / एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः
आत्मा नित्य और सर्वव्यापी है, कूटस्थ तथा दोषरहित है। वह एक ही होकर भी शक्ति—माया—से विभक्त-सा प्रतीत होता है, अपने स्वभाव से नहीं।
Verse 23
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः / भेदो व्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया
इसलिए मुनि परम अर्थ में केवल अद्वैत को ही सत्य कहते हैं। भेद का अनुभव व्यक्त रूप-स्वभाव से होता है, और वह भेद आत्माश्रिता माया पर टिका है।
Verse 24
यथा हि धूमसंपर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत् / अन्तः करणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते
जैसे धुएँ के संपर्क से आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अंतःकरण से उत्पन्न भावों से आत्मा लिप्त नहीं होती।
Verse 25
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिको ऽमलः / उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते
जैसे निर्मल स्फटिक अकेला होकर अपनी ही प्रभा से चमकता है, वैसे ही उपाधिरहित, विमल आत्मा स्वयं प्रकाशमान होती है।
Verse 26
ज्ञानस्वूपमेवाहुर्जगदेतद् विचक्षणाः / अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः
विचक्षण जन इस जगत को ज्ञान-स्वरूप ही कहते हैं; पर अज्ञानी, कुदृष्टि वाले अन्य लोग इसे केवल पदार्थ-स्वरूप ही देखते हैं।
Verse 27
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः / दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तिदृष्टिभिः
आत्मा कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और स्वभावतः शुद्ध चैतन्य है; पर भ्रान्त दृष्टि वाले पुरुषों को वह मानो विषय-रूप होकर दिखाई देता है।
Verse 28
यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः / रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः
जैसे निर्मल स्फटिक भी लाल रंग के आधार पर रखे जाने से लोगों को लाल प्रतीत होता है, वैसे ही परमपुरुष उपाधियों के कारण गुणयुक्त-सा दिखाई देता है।
Verse 29
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतो ऽव्ययः / उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः
इसलिए आत्मा—अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वगत और अव्यय—का मुमुक्षुओं को उपासना सहित ध्यान करना, मनन करना और श्रवण करना चाहिए।
Verse 30
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा / योगिनो ऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम्
जब मन में सर्वत्रग और सदा विद्यमान चैतन्य प्रकाशित होता है, तब अव्यवधान से स्थित योगी को स्वयमेव साक्षात्कार हो जाता है।
Verse 31
यदा सर्वाणि बूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति / सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म संपद्यते तदा
जब साधक समस्त भूतों को अपने ही आत्मा में देखता है और समस्त भूतों में आत्मा को देखता है, तभी वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
Verse 32
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति / एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः
जब साधक समाधि में स्थित होकर समस्त भूतों को पृथक् नहीं देखता, परमेश्वर से एकीभूत होकर तब वह कैवल्य में ‘केवल’—स्वतंत्र—हो जाता है।
Verse 33
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा ये ऽस्य हृदि स्थिताः / तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः
जब हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ पूर्णतः छूट जाती हैं, तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर परम-क्षेम—निश्चिन्त शान्ति—को प्राप्त होता है।
Verse 34
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति / तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा
जब वह भूतों की पृथकता को भी ‘एक’ में स्थित देखता है, उसी बोध से तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है—जो मूल भी है और सर्व-विस्तार भी।
Verse 35
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः / मायामात्रं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः
जब वह परमार्थतः केवल आत्मा को ही देखता है और समस्त जगत् को मात्र माया जानता है, तब वह निर्वृत—पूर्ण शान्त—हो जाता है।
Verse 36
यदा जन्मजरादुः खव्याधीनामेकभेषजम् / केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायते ऽसौ तदा शिवः
जब जन्म, जरा, दुःख और व्याधि के लिए एकमात्र औषध—केवल ब्रह्म-ज्ञान—उदय होता है, तब वह साधक सचमुच शिव—मंगलस्वरूप मुक्त—हो जाता है।
Verse 37
यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः / तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत्
जैसे इस लोक की नदियाँ और सरिताएँ समुद्र में मिलकर एक हो जाती हैं, वैसे ही यह देहधारी आत्मा निष्कल, अक्षर परमात्मा में एकत्व को प्राप्त करे।
Verse 38
तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः / अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति
इसलिए वास्तव में केवल विज्ञान (सच्चा ज्ञान) ही है; न कोई प्रपञ्च है, न ही संसरण। परंतु अज्ञान से आच्छादित जगत उसी ज्ञान के विषय में मोहित हो जाता है।
Verse 39
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् / अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम्
वही ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, विकल्प-रहित और अव्यय है। उसके अतिरिक्त जो कुछ है वह अज्ञान है—विज्ञान के विषय में मेरा यही मत है।
Verse 40
एतद् वः परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् / सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता
यह परम सांख्य—यह उत्तम ज्ञान—मैंने तुमसे कहा है। यह समस्त वेदान्त का सार है; और उसमें योग का अर्थ है चित्त की एकाग्रता।
Verse 41
योगात् संजायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते / योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित्
योग से ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान से योग दृढ़ होता है। जो योग और ज्ञान—दोनों में निरत है, उसके लिए कहीं भी अप्राप्य कुछ नहीं रहता।
Verse 42
यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते / एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित्
जिस परम लक्ष्य को योगी प्राप्त करते हैं, वही सांख्य के अनुयायी भी जान लेते हैं। जो सांख्य और योग को एक ही तत्त्व रूप में देखता है, वही तत्त्वज्ञ है।
Verse 43
अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः / मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः
हे विप्र ऋषियों! अन्य योगी, जिनका चित्त ऐश्वर्य और सिद्धियों में आसक्त है, वे उन्हीं-उन्हीं उपलब्धियों में बार-बार डूब जाते हैं; पर श्रुति कहती है—“वह इनके लिए आत्मा नहीं है।”
Verse 44
यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् / ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात्
वह सर्वव्यापी, दिव्य, महान्, अचल ऐश्वर्य—जो ज्ञानयोग में दृढ़तापूर्वक युक्त है, वह देहान्त में उसे प्राप्त करता है।
Verse 45
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः / कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः
मैं वही आत्मा हूँ—अव्यक्त, मायाधारी परमेश्वर—जो समस्त वेदों में कीर्तित है; मैं सबका आत्मा हूँ, सर्वदिशाओं में व्याप्त मुख वाला।
Verse 46
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धो ऽजरो ऽमरः / सर्वतः पाणिपादो ऽहमन्तर्यामी सनातनः
मैं सर्वकाम-प्रदाता, समस्त रसों का सार और सब गन्धों में स्थित सुगन्ध हूँ। मैं अजर-अमर हूँ। सर्वत्र हाथ-पाँव वाला, मैं सनातन अन्तर्यामी हूँ।
Verse 47
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः / अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम्
वह हाथ-पाँव रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करने वाला है, हृदय में स्थित है। नेत्र रहित होकर भी मैं देखता हूँ, और कर्ण रहित होकर भी सुनता हूँ।
Verse 48
वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन / प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः
मैं इस समस्त को—सचमुच सब कुछ—जानता हूँ; पर मुझे कोई यथार्थतः नहीं जानता। तत्त्वदर्शी मुझे ही एकमात्र महापुरुष कहते हैं।
Verse 49
पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः / निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम्
सूक्ष्मदर्शी ऋषि आत्मा के कारण को देखते हैं—उस निर्गुण, निर्मल स्वरूप तत्त्व की परम ऐश्वर्य-शक्ति को।
Verse 50
यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया / वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः
जिसे देवता भी मेरी माया से मोहित होकर नहीं समझ पाते, उसे अब मैं कहूँगा। तुम सब एकाग्र और संयत हो जाओ; सुनो, हे ब्रह्मवादियों।
Verse 51
नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः / प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः
स्वभाव से मैं माया से परे हूँ; मैं सबका शासक-नियन्ता नहीं हूँ। तथापि मैं इस प्रवाह को प्रेरित करता हूँ—इसे ही कारण-तत्त्व ज्ञानीजन जानते हैं।
Verse 52
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः / प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनो ऽव्ययम्
जो योगी तत्त्वदर्शी हैं, वे मेरे परम-गुह्य, सर्वव्यापी स्वरूप में प्रवेश करके मेरे साथ अविनाशी सायुज्य—पूर्ण एकत्व—को प्राप्त होते हैं।
Verse 53
तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी / लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह
उनके लिए मेरी विश्वरूपिणी माया वश में आ जाती है; और वे परम शुद्धि तथा निर्वाण को प्राप्त करके मेरे साथ ही स्थित रहते हैं।
Verse 54
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि / प्रसादान्मम योगीन्द्रा एतद् वेदानुशासनम्
उनके लिए पुनरावृत्ति नहीं होती, कल्पों की करोड़ों गणनाओं तक भी। हे योगीन्द्र! यह मेरे प्रसाद से वेद का विधान है।
Verse 55
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं ब्रह्मवादिभिः / मदुक्तमेतद् विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्
ब्रह्म का उपदेश करने वालों को यह ज्ञान उस व्यक्ति को नहीं देना चाहिए जो न पुत्र हो, न शिष्य, न योग्य योगी। यह वही विज्ञान है जो मैंने कहा—सांख्य और योग पर आश्रित।
Saṃsāra is rooted in ignorance: egoic confusion produces the sense of doership, which generates karma (merit and demerit) and thereby the succession of bodies; the Self itself remains the immutable Witness, only appearing associated through māyā and superimposition.
They are presented as one in truth: Yoga is one-pointedness of mind that stabilizes realization, while Sāṅkhya is discriminative knowledge of Reality; knowledge arises from Yoga, and Yoga becomes firm through knowledge.
It asserts non-dual Reality in the highest sense (paramārtha) while explaining perceived difference as belonging to manifestation and māyā; the Self remains stainless and undivided, though it appears diversified through adjuncts.
Because it is described as ‘more secret than the secret’ (guhyāt guhyatara), requiring adhikāra—ethical and yogic qualification—so it is to be given only to a son, a disciple, or a qualified yogin capable of guarding and realizing it.