दिक्पालादि-शिवलोकान्तर-कथनम्
Account of the Dikpālas and Intervening Realms toward Śiva’s Worlds
तन्मध्यकक्ष्याभागे ऽस्ति सर्वाप्यानन्दवापिका / तत्र दिव्यं महामद्यं बकुलामोदमेदुरम् / प्रतप्तकनकच्छायं तज्जलत्वेन वर्त्तते
tanmadhyakakṣyābhāge 'sti sarvāpyānandavāpikā / tatra divyaṃ mahāmadyaṃ bakulāmodameduram / prataptakanakacchāyaṃ tajjalatvena varttate
उसके मध्य-कक्ष्य भाग में सर्वत्र आनंद देने वाली ‘आनंद-वापिका’ है। वहाँ दिव्य महामद्य बहता है, जो बकुल-पुष्प की सुगंध से परिपूर्ण और तप्त स्वर्ण-सी आभा वाला होकर जल के रूप में स्थित है।