लोकज्ञान-वर्णन (Lokajñāna-varṇana) — Description of World-Knowledge / Cosmogonic Classification
पन्नत्वात्पन्नगाश्चापि व्यपसर्पाच्च सर्प्पता / तेषां लयः पृथिव्यां यः सूर्याचन्द्रमसौ घनाः
pannatvātpannagāścāpi vyapasarpācca sarppatā / teṣāṃ layaḥ pṛthivyāṃ yaḥ sūryācandramasau ghanāḥ
पन्न होने से वे ‘पन्नग’ भी कहलाए, और सरककर हटने से ‘सर्प’ कहे गए। उनका जो लय (विलय/आश्रय) पृथ्वी में है, वही सूर्य और चन्द्रमा के घने (तेज) रूप में प्रकट हुआ।