Saṃkhyāvarta (संख्यावर्त्त): Commencement of Yajña at the Dawn of Tretāyuga
यज्ञेन देवानाप्नोति वैराजं तपसा पुनः / ब्राह्मं तु कर्म संन्यासाद्वैराग्यात्प्रकृतेर्जयम्
yajñena devānāpnoti vairājaṃ tapasā punaḥ / brāhmaṃ tu karma saṃnyāsādvairāgyātprakṛterjayam
यज्ञ से मनुष्य देवों को प्राप्त करता है, और तप से वैराज पद को। पर संन्यास और वैराग्य से ब्राह्म कर्म—अर्थात् प्रकृति पर विजय—प्राप्त होती है।