गणेश-एकदन्त-उत्पत्तिः (Origin of Gaṇeśa’s Single Tusk) / Bhārgava–Gaṇeśa Encounter
श्रीकृष्म उवाच अयि नगनं दिनि निन्दितचन्द्रमुखि त्वमिमं जमदग्निसुतम् / नय निजहस्तसरोजसमर्पितम्स्तकमङ्कमनन्तगुणे
śrīkṛṣma uvāca ayi naganaṃ dini ninditacandramukhi tvamimaṃ jamadagnisutam / naya nijahastasarojasamarpitamstakamaṅkamanantaguṇe
श्रीकृष्ण बोले— हे पर्वतराज की नंदिनी, चंद्रमा को भी लज्जित करने वाले मुखवाली, इस जमदग्नि-पुत्र को स्वीकार कर लो। हे अनंत गुणों वाली, जिसने अपने कमल-हस्तों से मस्तक अर्पित किया है, उसे अपने अंक में ले लो।