Śrāddha-kalpa: Amarakantaka–Tīrtha-Māhātmya and Akṣaya Pitṛ-Tarpaṇa
तपसा तेजसा तस्य भ्रजते स नगोत्तमः / शृङ्गे माल्यवतो नित्यं वह्निः संवर्त्तको यथा
tapasā tejasā tasya bhrajate sa nagottamaḥ / śṛṅge mālyavato nityaṃ vahniḥ saṃvarttako yathā
उसके तप और तेज से वह श्रेष्ठ पर्वत दीप्तिमान होता है; जैसे माल्यवान् के शिखर पर संवर्तक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है।