न ह्य् आत्मा शक्यते द्रष्टुम् इन्द्रियैः कामगोचरैः प्रवर्तमानैर् अनेकैर् दुर्धरैर् अकृतात्मभिः //
यह ब्रह्मपुराण का उन्यासीवाँ श्लोक-स्थान है; इसका मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है।