तेषां तु मनसा रश्मीन् यदा सम्यङ् नियच्छति तदा प्रकाशते श्यात्मा दीपदीप्ता यथाकृतिः //
यह सप्तत्रिंश अध्याय का अस्सीवाँ श्लोक है; यहाँ श्लोक-पाठ प्रदान नहीं किया गया है।