एवंस्वभावम् एवेदम् इति बुद्ध्वा न मुह्यति अशोचन् संप्रहृष्यंश् च नित्यं विगतमत्सरः //
यह ब्रह्मपुराण का अठहत्तरवाँ श्लोक-स्थान है; मूल वाक्य यहाँ उपलब्ध नहीं है।