इन्द्रियाणि तु तान्य् आहुस् तेषां वृत्त्या वितिष्ठति तिष्ठति पुरुषे बुद्धिर् बुद्धिभावव्यवस्थिता //
यहाँ श्लोक का पाठ निर्दिष्ट है; मूल ग्रन्थ में यथोक्त श्लोक-संख्या 70 मानी गई है।