कदाचिल् लभते प्रीतिं कदाचिद् अपि शोचति न सुखेन च दुःखेन कदाचिद् इह मुह्यते //
यहाँ श्लोक का पाठ निर्दिष्ट है; मूल ग्रन्थ में यथोक्त श्लोक-संख्या 71 मानी गई है।