पश्यन्ती च भवेद् दृष्टी रसन्ती रसना भवेत् जिघ्रन्ती भवति घ्राणं बुद्धिर् विकुरुते पृथक् //
इस अध्याय का उनहत्तरवाँ श्लोक—यहाँ केवल संख्या है, श्लोक-पाठ नहीं; इसलिए अनुवाद संभव नहीं।