इन्द्रियाणां पृथग्भावाद् बुद्धिर् विकुरुते ह्य् अनु शृण्वती भवति श्रोत्रं स्पृशती स्पर्श उच्यते //
इस अध्याय का अड़सठवाँ श्लोक—मूल पाठ अनुपलब्ध है; अतः शास्त्रसम्मत अनुवाद संभव नहीं।