एवं पूर्वापरे रात्रे युञ्जन्न् आत्मानम् आत्मना लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्य् आत्मानम् आत्मनि //
यह बत्तीसवाँ श्लोक-संख्या है; पाठ के अभाव में अनुवाद संभव नहीं।