
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by converting offices into predictable revenue machines. Chapter 2.7 (here: sutras 16–30) is a micro-architecture of fiscal control over sea-linked commerce and its documentation—where movement of goods, advances (nīvī), and ledgers are treated as a single governable circuit. Kautilya’s objective is not merely “accounting,” but anti-collusion: he forces arriving record-holders (samudrapustaka-bhāṇḍa-nīvīka) into controlled, non-communicating settings, then reconciles reported receipts/expenditures against expected margins and time-cycles (day/5-night/fortnight/month/season/year). The state thus secures Kośa by (a) preventing cartelized narration, (b) enforcing punctual reporting, and (c) making supervisory negligence itself punishable. In the Saptāṅga organism, Kośa nourishes Daṇḍa (coercive capacity) and Bala (army); hence this chapter sits as a “metabolic rule-set” ensuring that maritime profit does not leak into private hands or falsified books.
Sutra 1
अक्षपटलमध्यक्षः प्रान्मुखमुदन्मुखं वा विभक्तोपस्थानं निबन्धपुस्तकस्थानं कारयेत् ॥ कZ_०२.७.०१ ॥
लेखा-कार्यालय (अक्षपटल) का अध्यक्ष पूर्वमुख या उत्तरमुख करके अलग-अलग बैठने की व्यवस्था कराए और रजिस्टर-पुस्तकों के लिए निश्चित स्थान बनवाए।
Sutra 2
तत्राधिकरणानां संख्याप्रचारसंजाताग्रं कर्मान्तानां द्रव्यप्रयोगवृद्धिक्षयव्ययप्रयामव्याजीयोगस्थानवेतनविष्टिप्रमाणम् रत्नसारफल्गुकुप्यानामर्घप्रतिवर्णकमानप्रतिमानोन्मानावमानभाण्डम् देशग्रामजातिकुलसंघानां धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानम् राजोपजीविनां प्रग्रहप्रदेशभोगपरिहारभक्तवेतनलाभम् राज्ञश्च पत्नीपुत्राणां रत्नभूमिलाभं निर्देशोत्पातिकप्रतीकारलाभं मित्रामित्राणां च संधिविग्रहप्रदानादानं निबन्धपुस्तकस्थं कारयेत् ॥ कZ_०२.७.०२ ॥
वहाँ रजिस्टर-पुस्तकों में यह दर्ज कराए—अधिकरणों/मामलों की संख्या, आवागमन, प्राप्ति और शेष; राज्य-कार्यों/उद्यमों में धन का प्रयोग, वृद्धि-क्षय, व्यय, समय-विलंब, कमीशन/अंतर (व्याजी), नियुक्तियाँ, कार्यस्थल, वेतन, बेगार (विष्टि) और माप-मान; रत्न, धातु और सामान्य वस्तुओं के मूल्य, प्रकार/वर्ण के अनुसार वर्गीकरण, माप-तौल के मानक तथा माल की हानि/क्षति का लेखा; देश-ग्राम-जाति-कुल-संघों के धर्म, व्यवहार, रीति और संस्थाएँ; राजसेवा से जीविका करने वालों के अनुग्रह/ग्रहण, क्षेत्र-आवंटन, भोग, परिहार, भत्ता, वेतन और लाभ; राजा तथा उसकी पत्नियों-पुत्रों के रत्न व भूमि-लाभ, विशेष आदेशों से तथा उत्पात/आपदा-निवारण से होने वाले लाभ; और मित्र-शत्रुओं के संधि-विग्रह, दान और प्राप्ति—इन सबको रजिस्टर-पुस्तकों में रखवाए।
Sutra 3
ततः सर्वाधिकरणानां करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवीमुपस्थानं प्रचारं चरित्रं संस्थानं च निबन्धेन प्रयच्छेत् ॥ कZ_०२.७.०३ ॥
तत्पश्चात् वह सभी विभागों के लिए लिखित विवरण (निबन्ध) में—क्या करना है और क्या सिद्ध हो चुका है, शेष, आय-व्यय, नकद-निधि (नीवी), उपस्थिति/स्थापना-बल, भ्रमण/निरीक्षण (प्रचार), आचरण-लेखा (चरित्र) तथा कार्य-स्थिति (संस्थान)—प्रस्तुत करे।
Sutra 4
उत्तममध्यमावरेषु च कर्मसु तज्जातिकमध्यक्षं कुर्यात्सामुदयिकेष्ववक्लृप्तिकम् (अवकॢप्तिकम्) यमुपहत्य राजा नानुतप्येत ॥ कZ_०२.७.०४ ॥
उत्तम, मध्यम और निम्न श्रेणी के कार्यों में उसी प्रकार के उपयुक्त अध्यक्ष की नियुक्ति करे; और सामुदायिक/सामूहिक कार्यों में ऐसा अवकॢप्तिक (नियंत्रक/समायोजक) नियुक्त करे कि यदि वह अधिकारी अपराध में दण्डित भी हो, तो राजा को बाद में पश्चात्ताप न हो।
Sutra 5
सहग्राहिणः प्रतिभुवः कर्मोपजीविनः पुत्रा भ्रातरो भार्या दुहितरो भृत्याश्चास्य कर्मच्छेदं वहेयुः ॥ कZ_०२.७.०५ ॥
उसके सहग्राही/सहभागी, प्रतिभू (जमानतदार), उसके पद से जीविका चलाने वाले, तथा (जहाँ लागू हो) उसके पुत्र, भाई, पत्नी, पुत्रियाँ और सेवक—उसके सरकारी दुराचार से उत्पन्न कर्मच्छेद/जब्ती का भार वहन करें।
Sutra 6
त्रिशतं चतुःपञ्चाशच्चाहोरात्राणां कर्मसंवत्सरः ॥ कZ_०२.७.०६ ॥
कर्मसंवत्सर (कार्य-वर्ष) अहोरात्रों के तीन सौ चौवन का होता है।
Sutra 7
तमाषाढीपर्यवसानमूनं पूर्णं वा दद्यात् ॥ कZ_०२.७.०७ ॥
वह आषाढ़ी के अंत तक, परिस्थिति के अनुसार, हिसाब/निपटान कम (घाटा सहित) या पूरा (पूर्ण) दे सकता है।
Sutra 8
करणाधिष्ठितमधिमासकं कुर्यात् ॥ कZ_०२.७.०८ ॥
करण (विभाग/कार्यालय) के अधीन-नियंत्रण में अधिमास का समायोजन स्थापित करे।
Sutra 9
अपसर्पाधिष्ठितंच प्रचारम् ॥ कZ_०२.७.०९ ॥
प्रचार (निरीक्षण/गश्त) पर अपसर्प (गुप्त निरीक्षक/प्रतिगुप्तचर) की निगरानी होनी चाहिए।
Sutra 10
प्रचारचरित्रसंस्थानान्यनुपलभमानो हि प्रकृतः समुदयमज्ञानेन परिहापयति उत्थानक्लेशासहत्वादालस्येन शब्दादिष्विन्द्रियार्थेषु प्रसक्तः प्रमादेन संक्रोशाधर्मानर्थभीरुभायेन कार्यार्थिष्वनुग्रहबुद्धिः कामेन हिंसाबुद्धिः कोपेन विद्याद्रव्यवल्लभापाश्रयाद्दर्पेण तुलामानतर्कगणितान्तरोपधानाल्लोभेन ॥ कZ_०२.७.१० ॥
जो अधिकारी प्रचार (मैदानी गतिविधि), आचरण और कार्य-स्थिति को नहीं जान पाता, वह अज्ञान से राजस्व-समुदाय की हानि करता है; कर्तव्य-उठान के श्रम को न सह पाने से आलस्य के कारण; शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों में आसक्त होकर प्रमाद से; जन-आक्रोश, अधर्म या अनर्थ के भय से; कामवश याचकों/कार्यार्थियों पर अनुचित अनुग्रह-बुद्धि से; क्रोधवश हिंसा-बुद्धि से; विद्या, धन और प्रियजनों के आश्रय पर निर्भर होकर दर्प से; और लोभवश तौल-मान में हेरफेर तथा तर्क-गणना में छिपे अंतर रखकर।
Sutra 11
तेषामानुपूर्व्या यावानर्थोपघातस्तावानेकोत्तरो दण्डः इति मानवाः ॥ कZ_०२.७.११ ॥
मानवों के अनुसार: उस क्रम में जितनी भौतिक हानि हो, दण्ड उतना ही क्रमशः (एक-एक करके) बढ़ना चाहिए।
Sutra 12
सर्वत्राष्टगुणः इति पाराशराः ॥ कZ_०२.७.१२ ॥
पाराशरों के अनुसार: सर्वत्र (इन मामलों में) दण्ड आठगुना है।
Sutra 13
दशगुणः इति बार्हस्पत्याः ॥ कZ_०२.७.१३ ॥
दण्ड/जुर्माना दसगुना (होना चाहिए)—ऐसा बार्हस्पत्य (बृहस्पति के अनुयायी) कहते हैं।
Sutra 14
विंशतिगुणः इत्यौशनसाः ॥ कZ_०२.७.१४ ॥
(दूसरों के मत में) दण्ड बीस गुना होना चाहिए—ऐसा उशनस् के अनुयायी कहते हैं।
Sutra 15
यथापराधमिति कौटिल्यः ॥ कZ_०२.७.१५ ॥
कौटिल्य कहते हैं: (दण्ड) अपराध के अनुसार (होना चाहिए)।
Sutra 16
गाणनिक्यानि आषाढीमागच्छेयुः ॥ कZ_०२.७.१६ ॥
लेखाकार (गाणनिक) आषाढ़ (मास) में उपस्थित हों (निर्धारित लेखा-जाँच हेतु)।
Sutra 17
आगतानां समुद्रपुस्तकभाण्डनीवीकानामेकत्रासम्भाषावरोधं कारयेत् ॥ कZ_०२.७.१७ ॥
जो लोग समुद्रपुस्तक, भाण्ड (भंडार-लेख) और नीवी (पूँजी/अग्रिम-लेख) लेकर आए हों, उनके लिए वह एक ही स्थान पर परस्पर बातचीत का अवरोध कराए (अर्थात् जाँच के समय मिलीभगत न होने दे)।
Sutra 18
आयव्ययनीवीनामग्राणि श्रुत्वा नीवीमवहारयेत् ॥ कZ_०२.७.१८ ॥
आय, व्यय और नीवी के प्रारम्भिक अंकों को सुनकर वह नीवी को जाँच-निर्णय हेतु प्रस्तुत/दर्ज कराए (अर्थात् उसे लेखा-समाधान के लिए उठाए)।
Sutra 19
यच्चाग्रादायस्यान्तरपर्णे नीव्यां वर्धेत व्ययस्य वा यत्परिहापयेत्तदष्टगुणमध्यक्षं दापयेत् ॥ कZ_०२.७.१९ ॥
यदि प्रारम्भिक प्रविष्टि के बाद बीच के पन्ने में आय को छिपाकर ‘नीवी’ बढ़ाई जाए, या व्यय का कोई भाग गायब कर दिया जाए, तो उतनी राशि का आठ गुना अधीक्षक से वसूल कराया जाए।
Sutra 20
विपर्यये तमेव प्रति स्यात् ॥ कZ_०२.७.२० ॥
विपरीत स्थिति में वही दायित्व उसी व्यक्ति पर होगा।
Sutra 21
यथाकालमनागतानामपुस्तकभाण्डनीवीकानां वा देयदशबन्धो दण्डः ॥ कZ_०२.७.२१ ॥
जो नियत समय पर नहीं आते, या आवश्यक बही, भंडार-लेखा अथवा नीवी-हिसाब के बिना आते हैं, उन पर देय ‘दशबन्ध’ (दस पण) का दण्ड लगे।
Sutra 22
कार्मिके चोपस्थिते कारणिकस्याप्रतिबध्नतः पूर्वः साहसदण्डः ॥ कZ_०२.७.२२ ॥
और जब कार्मिक उपस्थित हों, तब यदि कारणिक (उत्तरदायी अधिकारी) रोक-थाम नहीं करता, तो उस पर पूर्व-श्रेणी का ‘साहस’ दण्ड लगे।
Sutra 23
विपर्यये कार्मिकस्य द्विगुणः ॥ कZ_०२.७.२३ ॥
अनियमितता/विसंगति होने पर उत्तरदायी कर्मचारी/कार्मिक का दंड (देयता) दुगुना होता है।
Sutra 24
प्रचारसमं महामात्राः समग्राः श्रावयेयुरविषममन्त्राः ॥ कZ_०२.७.२४ ॥
महामात्र (वरिष्ठ अधिकारी) पूरी तरह अवगत होकर स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप रिपोर्ट प्रस्तुत करें और उनके कथन एकरूप (अविरोधी) हों।
Sutra 25
पृथग्भूतो मिथ्यावादी चैषामुत्तमं दण्डं दद्यात् ॥ कZ_०२.७.२५ ॥
यदि उनमें से कोई अलग होकर (सामूहिक प्रक्रिया से बाहर) कार्य करे और झूठ बोलता पाया जाए, तो उसे सर्वोच्च दण्ड दिया जाए।
Sutra 26
अकृताहोरूपहरं मासमाकाङ्क्षेत ॥ कZ_०२.७.२६ ॥
जो हिसाब/विवरण अभी प्रस्तुत नहीं किया गया हो, उसके लिए कार्रवाई से पहले एक माह तक प्रतीक्षा की जा सकती है।
Sutra 27
मासादूर्ध्वं मासद्विशतोत्तरं दण्डं दद्यात् ॥ कZ_०२.७.२७ ॥
एक माह के बाद (समय बीत जाने पर), आगे की प्रत्येक माह की देरी पर दो सौ (अधिक) का दण्ड लगाया जाए।
Sutra 28
अल्पशेषलेख्यनीवीकं पञ्चरात्रमाकाङ्क्षेत ॥ कZ_०२.७.२८ ॥
जिस लिखित हिसाब में केवल थोड़ा शेष/बकाया दिखे, उसके मिलान के लिए पाँच रात (पाँच दिन) तक प्रतीक्षा की जा सकती है।
Sutra 29
ततः परं कोशपूर्वमहोरूपहरं धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानसंकलननिर्वर्तनानुमानचारप्रयोगैरवेक्षेत ॥ कZ_०२.७.२९ ॥
इसके बाद वह कोष में प्रविष्ट किए जाने वाले (आय-पक्ष के) प्रतिदिन के आय-विवरण की जाँच धर्म, व्यवहार/लेन-देन, आचरण, संस्थागत व्यवस्था, संकलन, निष्पादन-परिणाम, अनुमान तथा गुप्तचर-प्रयोग पर आधारित परीक्षणों से करे।
Sutra 30
दिवसपञ्चरात्रपक्षमासचातुर्मास्यसंवत्सरैश्च प्रतिसमानयेत् ॥ कZ_०२.७.३० ॥
वह दिन, पंचरात्र, पक्ष, मास, चातुर्मास्य और संवत्सर के अनुसार तुलनात्मक रूप से मिलान करे।
Sutra 31
व्युष्टदेशकालमुखोत्पत्त्यनुवृत्तिप्रमाणदायकदापकनिबन्धकप्रतिग्राहकैश्चायं समानयेत् ॥ कZ_०२.७.३१ ॥
वह इस (आय) का मिलान देश-काल-प्रमुख (स्रोत) की पहचान, उत्पत्ति व निरन्तरता, माप-मानक तथा दाता, दिलवाने वाला, लेखबद्ध करने वाला और ग्रहणकर्ता—इनकी जाँच से करे।
Sutra 32
व्युष्टदेशकालमुखलाभकारणदेययोगप्रमाणाज्ञापकोद्धारकविधातृकप्रतिग्राहकैश्च व्ययं समानयेत् ॥ कZ_०२.७.३२ ॥
वह व्यय का मिलान देश-काल-प्रमुख (स्रोत), अपेक्षित लाभ, कारण, देय राशि व उसकी उपयुक्तता, प्रमाण/माप-मानक, आज्ञापक, उद्धारक/निकासी करने वाला, विधाता/कार्यान्वयनकर्ता और प्रतिग्राहक (प्राप्तकर्ता)—इनकी जाँच से करे।
Sutra 33
व्युष्टदेशकालमुखानुवर्तनरूपलक्षणप्रमाणनिक्षेपभाजनगोपायकैश्च नीवीं समानयेत् ॥ कZ_०२.७.३३ ॥
बीते हुए देश-काल, प्रविष्टियों के क्रम व शीर्ष (मुख), आदेशानुसारता, वस्तु का रूप व पहचान-चिह्न, माप/तौल, जमा-राशि, पात्र, तथा संरक्षण-उपाय—इनकी जाँच करके वह शेष/बकाया (नीवी) का मिलान कर आगे बढ़ाए।
Sutra 34
राजार्थे कारणिकस्याप्रतिबध्नतः प्रतिषेधयतो वाज्ञां निबन्धादायव्ययमन्यथा नीवीमवलिखतो द्विगुणः ॥ कZ_०२.७.३४ ॥
राजकार्य में यदि कोई अधिकारी (कारणिक) उचित नियंत्रण लागू नहीं करता, या वैध आदेश में बाधा डालता है; या लिखित रजिस्टर के विरुद्ध आय‑व्यय दर्ज करता है; या आगे ले जाई गई शेष राशि (नीवी) में हेर‑फेर करता है—तो दंड दुगुना होगा।
Sutra 35
क्रमावहीनमुत्क्रममविज्ञातं पुनरुक्तं वा वस्तुकमवलिखतो द्वादशपणो दण्डः ॥ कZ_०२.७.३५ ॥
किसी मद/वस्तु की प्रविष्टि यदि क्रम से रहित, क्रम से उलटी, अस्पष्ट/अनिर्धारित, या दोहराई हुई लिखी जाए—तो बारह पण का दंड है।
Sutra 36
नीवीमवलिखतो द्विगुणः ॥ कZ_०२.७.३६ ॥
नीवी (आगे ले जाई गई शेष राशि) में हेर‑फेर करने पर दंड दुगुना है।
Sutra 37
भक्षयतोऽष्टगुणः ॥ कZ_०२.७.३७ ॥
माल का उपभोग/हड़प करने पर दंड आठ गुना है।
Sutra 38
नाशयतः पञ्चबन्धः प्रतिदानं च ॥ कZ_०२.७.३८ ॥
माल नष्ट करने पर ‘पंचबन्ध’ दंड और साथ ही प्रतिदान/भरपाई भी।
Sutra 39
मिथ्यावादे स्तेयदण्डः ॥ कZ_०२.७.३९ ॥
मिथ्या बयान/झूठी गवाही देने पर चोरी के लिए निर्धारित दंड लगेगा।
Sutra 40
पश्चात्प्रतिज्ञाते द्विगुणः प्रस्मृतोत्पन्ने च ॥ कZ_०२.७.४० ॥
यदि पहले स्वीकार/प्रतिज्ञा करने के बाद (झूठ/इन्कार) हो, तो दंड दुगुना होगा; और स्मरण दिलाने/याद आने के बाद उत्पन्न होने पर भी।
Sutra 41
महोपकारं चाध्यक्षं प्रग्रहेणाभिपूजयेत् ॥ कZ_०२.७.४१च्द् ॥
जो अधीक्षक बड़ा उपकार/सेवा करे, उसे ‘प्रग्रह’—निष्ठा बाँधने वाला अनुग्रह/उपहार/विशेषाधिकार—देकर सम्मानित व बनाए रखना चाहिए।
Stable public revenue through fraud-resistant maritime accounting: timely reporting, segregated testimony, and periodic reconciliation reduce embezzlement, enabling regular provisioning of administration and security without arbitrary exactions.
Graded penalties: late/non-arrival or missing books/cargo/advance records incur a daśabandha fine; obstruction by an accountant when the operative is present triggers a sāhasa penalty; false or separated testimony invites the highest fine; padding income or suppressing expenses leads to eightfold payment by the superintendent, with liability reversing when the fault is opposite; continued non-settlement after set waiting periods leads to escalating fines.