
Chapter 344: Ornaments of Word-and-Meaning (शब्दार्थालङ्काराः)
भगवान् अग्नि साहित्य-शास्त्र में उन अलंकारों का निरूपण करते हैं जो शब्द (अभिव्यक्ति) और अर्थ (भाव) दोनों को एक साथ सुशोभित करते हैं, जैसे एक ही हार कंठ और वक्षस्थल को अलंकृत करे। वे रचना के छह सक्रिय गुण बताते हैं—प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता और अभिव्यक्ति। प्रशस्ति वह वाणी है जो श्रोता के अंतःकरण को ‘पिघला’ दे; यह स्नेहपूर्ण संबोधन और औपचारिक स्तुति—दो रूपों में मानी गई है। कान्ति कथ्य और कथन की मनोहर संगति है। औचित्य तब होता है जब रीति, वृत्ति और रस विषय के अनुरूप हों तथा तेज और माधुर्य का संतुलन रहे। आगे अभिव्यक्ति में श्रुति (प्रत्यक्ष मुख्यार्थ) और आक्षेप (संकेतित/व्यंग्य अर्थ) का विवेचन, मुख्या-उपचार, तथा संबंध/सान्निध्य/समवाय से उत्पन्न लक्षणा का निरूपण है। अंत में आक्षेप और समासोक्ति, अपह्नुति, पर्यायोक्ता आदि को ध्वनि से जोड़कर व्यंग्यार्थ को काव्य-शक्ति का प्रधान आधार बताया गया है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे अलङ्कारे अर्थालङ्कारनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ चतुश् चत्वारिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः शब्दार्थालङ्काराः अग्निर् उवाच शब्दार्थयोरलङ्कारो द्वावलङ्कुरुते समं एकत्र निहितो हारः स्तनं ग्रीवामिव स्त्रियाः
इस प्रकार अग्नि-महापुराण के ‘अलंकार’ प्रकरण में ‘अर्थालंकार-निरूपण’ नामक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब तीन सौ चवालीसवाँ अध्याय—‘शब्दार्थालंकार’—आरम्भ होता है। अग्नि बोले: शब्द और अर्थ—दोनों का अलंकार—दोनों को समान रूप से शोभित करता है; जैसे एक ही हार, एक स्थान पर रखा हुआ, स्त्री के स्तनों और ग्रीवा—दोनों को सुशोभित करता है।
Verse 2
प्रशस्तिः कान्तिरौचित्यं संक्षेपो यावदर्थता अभिव्यक्तिरिति व्यक्तं षड्भेदास्तस्य जाग्रति
प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता (अर्थ जितना अपेक्षित हो उतना ही कहना) और अभिव्यक्ति (स्पष्ट प्रकाशन)—ये उसके छह भेद हैं, जिन्हें रचना में सदा जाग्रत रखना चाहिए।
Verse 3
प्रशस्तिः परवन्मर्मद्रवीकरणकर्मणः वाचो युक्तिर्द्विधा सा च प्रेमोक्तिस्तुतिभेदतः
प्रशस्ति वह वाक्-युक्ति है जिसका कार्य मानो दूसरे के मर्म को द्रवित कर देना है। वह वाक्-प्रकार दो प्रकार का है—प्रेमोक्ति और स्तुति—इन भेदों के अनुसार।
Verse 4
प्रेमोक्तिस्तुतिपर्यायौ प्रियोक्तिगुणकीर्तने कान्तिः सर्वमनोरुच्यवाच्यवात्तकसङ्गतिः
‘प्रेमोक्ति’ और ‘स्तुति’ पर्याय हैं; ‘प्रियोक्ति’ वह वाणी है जो गुणों का कीर्तन करती है। ‘कान्ति’ वह है जो सब मनों को रिझाए—वाच्य और भावित अर्थ का यथोचित सामंजस्य।
Verse 5
यथा वस्तु तथा रीतिर्यथा वृत्तिस् तथा रसः ऊर्जस्विमृदुसन्दर्भादौचित्यमुपजायते
जैसा विषय हो वैसी ही रीतिः हो; जैसी वृत्ति हो वैसा ही रस हो। जो रचना एक साथ ओजस्वी और मृदु हो, उससे औचित्य उत्पन्न होता है।
Verse 6
संक्षेपो वाचकैर् अल्पैर् वहोरर्थस्य संग्रहः अन्यूनाधिकता शब्दवस्तुनोर्यावदर्थता
संक्षेप वह है जिसमें थोड़े-से वाचक शब्दों से बहुत-सा अर्थ समेट दिया जाए; जहाँ शब्द और अभिप्रेत वस्तु न न्यून हों न अधिक—अर्थात् यावदर्थता हो।
Verse 7
प्रकटत्वमभिव्यक्तिः श्रुतिराक्षेप इत्य् अपि तस्या भेदौ श्रुतिस्तत्र शब्दं स्वार्थसमर्पणम्
प्रकटता को ‘अभिव्यक्ति’ कहते हैं। इसके दो भेद ‘श्रुति’ और ‘आक्षेप’ भी कहलाते हैं। वहाँ ‘श्रुति’ वह है जिसमें शब्द अपना मुख्य अर्थ सीधे ही प्रदान करता है।
Verse 8
भवेन्नैमित्तिकी पारिभाषिकी द्विविधैव सा सङ्केतः परिभाषेति ततः स्यात् पारिभाषिकी
वह (परिभाषा/तकनीकी व्याख्या) दो प्रकार की है—नैमित्तिकी और पारिभाषिकी। ‘सङ्केत’ परंपरागत संज्ञा-नियम है और ‘परिभाषा’ तकनीकी परिभाषा; इसलिए वह ‘पारिभाषिकी’ कहलाती है।
Verse 9
मुख्यौपचारिकी चेति सा च सा च द्विधा द्विधा स्वाभिधेयस्खलद्वृत्तिरमुख्यार्थस्य वाचकः
शब्द-शक्ति दो प्रकार की कही गई है—मुख्य और उपचारिकी (गौण/लाक्षणिक)। और इन दोनों के भी दो-दो भेद हैं। जब शब्द की वृत्ति अपने स्वाभिधेय (प्रत्यक्ष अर्थ) से हट जाती है, तब वही वृत्ति अमुख्य (गौण) अर्थ की वाचक बनती है।
Verse 10
यया शब्दो निमित्तेन केनचित्सौपचारिकी सा च लाक्षणिकी गौणी लक्षणागुणयोगतः
जिस क्रिया से कोई शब्द किसी विशेष निमित्त/आधार के कारण उपचार (रूपक) में प्रयुक्त होता है, वह उपचारिकी ‘लाक्षणिकी’ कहलाती है। लक्षणा और गुण के योग (सम्बन्ध) से वह ‘गौणी’ भी कही जाती है।
Verse 11
अभिधेयाविनाभूता प्रतीतिर् लक्षणोच्यते अभिधेयेन सम्बन्धात्सामीप्यात्समवायतः
जो प्रतीति अभिधेय (मुख्य वाच्यार्थ) से अविनाभूत रूप से जुड़ी रहती है, वही ‘लक्षणा’ कहलाती है। वह अभिधेय से सम्बन्ध, सामीप्य (निकटता) या समवाय (अन्तर्निहित सम्बन्ध) के कारण उत्पन्न होती है।
Verse 12
वैपरीत्यात्क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता गौणीगुणानामानन्त्यादनन्ता तद्विवक्षया
विपरीतता (विरोध) के कारण और अभिप्रेत क्रिया-योग के कारण लक्षणा पाँच प्रकार की मानी गई है। परन्तु गौणी गुण अनन्त होने से, वक्ता की विवक्षा के अनुसार वह (गौणी) अनन्त भी हो जाती है।
Verse 13
अन्यधर्मस्ततो ऽन्यत्र लोकसीमानुरोधिना सम्यगाधीयते यत्र स समाधिरिह स्मृतः
जहाँ लोक-सीमा (लोकाचार की स्वीकृत मर्यादा) के अनुरोध से किसी अन्य स्थान पर किसी भिन्न धर्म-नियम को सम्यक् रूप से ग्रहण किया जाता है, वही यहाँ ‘समाधि’ (स्थिर विधि-निर्णय) कहा गया है।
Verse 14
श्रूतेरलभ्यमानो ऽर्थो यस्माद्भाति सचेतनः स आक्षेपो धनिः स्याच्च ध्वनिना व्यज्यते यतः
जो अर्थ सुने हुए शब्दों से सीधे नहीं मिलता, परन्तु संवेदनशील बुद्धिमान पाठक के मन में प्रकट हो जाता है, उसे ‘आक्षेप’ कहते हैं; वह ध्वनि/व्यञ्जना द्वारा सूचित होकर प्रकट होता है, इसलिए उसे ‘धनि’ (ध्वनि का एक भेद) कहा गया है।
Verse 15
शब्देनार्थेन यत्रार्थः कृत्वा स्वयमुपार्जनम् प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषो ऽभिधित्सया
जहाँ शब्द अपने वाच्यार्थ के द्वारा ऐसा अर्थ पहुँचाता है कि श्रोता स्वयं ही अभिप्रेत अर्थ को ग्रहण कर लेता है, वहाँ इच्छित (शाब्दिक) अर्थ का मानो ‘निषेध’ करके जो विशेष अर्थ उभरता है, वह वक्ता की अभिधित्सा (विशेष अर्थ कहने की इच्छा) से उत्पन्न होता है।
Verse 16
तमाक्षेपं व्रुवन्त्यत्र स्तुतं स्तोत्रमिदं पुनः अधिकारादपेतस्य वस्तुनो ऽन्यस्य या स्तुतिः
यहाँ इस अलंकार को ‘आक्षेप’ कहते हैं। फिर इसे ‘स्तोत्र’ भी कहा गया है—अर्थात् जो स्तुति उचित विषय (अधिकार) से हटकर किसी अन्य वस्तु की ओर की जाए, वही स्तोत्र-रूप स्तुति है।
Verse 17
यत्रोक्तं गम्यते नार्थस्तत्समानविशेषणं सा समासोकितिरुदिता सङ्क्षेपार्थतया बुधैः
जहाँ कही हुई बात से अभिप्रेत अर्थ स्पष्ट नहीं होता, किन्तु उसी के समान सामान्य अर्थ वाले, पर विशेषण-युक्त कथन से वह समझ में आ जाता है—विद्वानों ने उसे ‘समासोक्ति’ कहा है, क्योंकि वह अर्थ को संक्षेप में प्रकट करती है।
Verse 18
अपह्नुतिरपह्नुत्य किञ्चिदन्यार्थसूचनम् पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेनाभिधीयते एषामेकंतमस्येव समाख्या ध्वनिरित्यतः
‘अपह्नुति’ वह है जिसमें नकार (छिपाने) के द्वारा किसी अन्य अर्थ का संकेत किया जाता है। ‘पर्यायोक्त’ वह है जो किसी दूसरे प्रकार से कहा जाए। अतः इनमें से किसी एक में भी व्यञ्जना (सूचना) का कार्य होने से ‘ध्वनि’ नाम लागू होता है।
It defines ornaments that simultaneously beautify both wording and meaning, then systematizes six compositional excellences and connects explicit meaning and suggested meaning (dhvani) to poetic effect.
By disciplining speech through propriety, clarity, and ethically resonant praise, it treats aesthetic mastery as a dharmic refinement of mind and communication—supporting right conduct and contemplative discernment.