Adhyaya 343
Sahitya-shastraAdhyaya 34332 Verses

Adhyaya 343

Arthālaṅkāras (Ornaments of Meaning): Definitions, Taxonomy, and the Centrality of Upamā

शब्दालंकारों का निरूपण पूर्ण कर भगवान् अग्नि अर्थालंकारों का क्रमबद्ध विवेचन आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि अर्थ-आभूषण के बिना शब्द-शोभा अंततः अरमणीय है—मानो अलंकार-विहीन सरस्वती। पहले ‘स्वरूप/स्वभाव’ को आधार-दृष्टि बनाकर साङ्सिद्धिक (स्वाभाविक) और नैमित्तिक (अवसरजन्य) भेद बताते हैं। फिर सादृश्य को केंद्र में रखकर उपमा का विस्तृत वर्गीकरण देते हैं—तुलना के सूचक, समास/असमास रूप, और विश्लेषण से अनेक उपभेद, अंततः अष्टादश प्रकार की स्पष्टता तक। परस्पर, व्यत्यय, नियत/अनियत, विरोधी, बहु, मालोपमा, परिणामी, अद्भुत, मायिक, सन्दिग्ध/निश्चित, वाक्यार्थ, स्वोपमा, क्रमवर्धिनी (गगनोपमा) तथा पाँच व्यवहार-रूप—प्रशंसा, निन्दा, कल्पित, यथार्थ, अंश—गिनाए जाते हैं। आगे रूपक, सहोक्ति, अर्थान्तरन्यास, उत्क्रेक्षा, अतिशय (सम्भव/असम्भव), विशेषोक्ति, विभावना व सङ्गतीकरण, विरोध और हेतु को कारक/ज्ञापक तथा व्याप्ति के संकेत सहित समझाया गया है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे अलङ्कारे शब्दालङ्कारनिरूपणं नाम द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अर्थालङ्काराः अग्निर् उवाच अलङ्करणमर्थानामर्थालङ्कार इष्यते तं विना शब्दसौन्दर्यमपि नास्ति मनोहरम्

इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘अलंकार में शब्दालंकार-निरूपण’ नामक 342वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब 343वाँ अध्याय ‘अर्थालंकार’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—अर्थों का जो अलंकरण है वही ‘अर्थालंकार’ माना जाता है; उसके बिना शब्दों का सौन्दर्य भी मनोहर नहीं होता।

Verse 2

अर्थालङ्काररहिता विधवेव सरस्वती स्वरूपमथ सादृश्यमुत्प्रेक्षातिशयावपि

अर्थालंकारों से रहित वाणी (सरस्वती) विधवा के समान है। अब इनके स्वरूप का, तथा सादृश्य, उत्प्रेक्षा और अतिशय का भी वर्णन किया जाता है।

Verse 3

विभावना विरोधश् च हेतुश् च सममष्टधा स्वभाव एव भावानां स्वरूपमभिधीयते

विभावना, विरोध और हेतु—इस प्रकार आठ भेदों सहित—भावों का स्वभाव ही उनका स्वरूप (परिभाषक तत्त्व) कहा जाता है।

Verse 4

निजमागन्तुकञ्चेति द्विविधं तदुदाहृतम् सांसिद्धिकं नियं नैमित्तिकमागन्तुकं तथा

यह दो प्रकार का कहा गया है—निज (स्वाभाविक) और आगन्तुक (आकस्मिक/अर्जित)। निज वह है जो स्वयंसिद्ध, प्राकृतिक नियम है; और आगन्तुक वह है जो किसी विशेष निमित्त से किया जाता है।

Verse 5

विधुरेवेति ख , ट च सादृश्यं धर्मसामान्यमुपमा रूपकं तथा महोक्त्यर्थान्तरन्यासाविति स्यात्तु चतुर्विधम्

‘विधुरेवेति’ आदि। उपमा चार प्रकार की होती है—(1) सादृश्य, (2) धर्म-सामान्य, (3) रूपक, तथा (4) महोक्ति और अर्थान्तरन्यास।

Verse 6

उपमा नाम सा यस्यामुपमानोपमेययोः सत्ता चान्तरसामान्ययोगित्वेपि विवक्षितं

उपमा वह अलंकार है जिसमें उपमान और उपमेय के विषय में उनका परस्पर संबंध अभिप्रेत होता है—अर्थात् भीतर के किसी सामान्य गुण की सत्ता का संकेत, यद्यपि ऐसी समानता सामान्यतः संभव हो।

Verse 7

किञ्चिदादाय सारूप्यं लोकयात्रा प्रवर्तते समासेनासमासेन सा द्विधा प्रतियोगिनः

कुछ समानता को ग्रहण करके लोक-व्यवहार (सामान्य वाणी) चलता है; वह या तो समास के द्वारा या बिना समास के—इस प्रकार संबंधित पदों के विषय में वह दो प्रकार की होती है।

Verse 8

विग्रहादभिधानस्य ससमासान्यथोत्तरा उपमाद्योतकपदेनोपमेयपदेनच

विग्रह (विश्लेषण) से अभिधान का निश्चय करना चाहिए; और समास में उत्तरपदों का अर्थ यथानुसार समझना चाहिए। उपमा में तो उपमा-द्योतक पद तथा उपमेय-पद के द्वारा (तुलना का) संबंध सूचित होता है।

Verse 9

ताभ्याञ्च विग्रहात्त्रेधा ससमासान्तिमात् त्रिधा विशिष्यमाणा उपमा भवन्त्यष्टादश स्फुटाः

और उन दोनों (प्रकारों) से विग्रह के द्वारा यह तीन प्रकार का हो जाता है; तथा समास के अन्तिम पद के आधार पर भी यह तीन प्रकार का होता है। इस प्रकार भेद किए जाने पर उपमाएँ स्पष्ट रूप से अठारह होती हैं।

Verse 10

यत्र साधारणो धर्मः कथ्यते गम्यते ऽपि वा ते धर्मवस्तुप्राधान्याद्धर्मवस्तूपमे उभे

जहाँ साधारण धर्म (सामान्य गुण) कहा जाता है या केवल समझा जाता है, वहाँ धर्म और वस्तु—दोनों की प्रधानता होने से वे दोनों ‘धर्मवस्तु-उपमा’ कहलाते हैं।

Verse 11

तुल्यमेवोपमीयेते यत्रान्योन्येन धर्मिणौ परस्परोपमा सा स्यात् प्रसिद्धेरन्यथा तयोः

जहाँ समान गुणों वाले दो आधार एक-दूसरे के समान कहे जाएँ और परस्पर उपमान बनें, उसे ‘परस्परोपमा’ कहते हैं; अन्यथा दोनों में जो अधिक प्रसिद्ध हो वही उपमान (मानक) माना जाता है।

Verse 12

विपरीतोपमा सा स्याद्व्यावृत्तेर् नियमोपमा अन्यत्राप्यनुवृत्तेस्तु भवेदनियमोपमा

इसे ‘विपरीतोपमा’ कहा जाता है। जहाँ बहिष्कार (व्यावृत्ति) द्वारा तुलना सीमित हो, वह ‘नियमोपमा’ है; और जहाँ कही गई समानता अन्यत्र भी लागू हो, वह ‘अनियमोपमा’ होती है।

Verse 13

समुच्चयोपमातो ऽन्यधर्मवाहुल्यकीर्तनात् वहोर्धम्मस्य साम्येपि वैलक्ष्ण्यं विवक्षितं

दोनों के साझा धर्मों में समानता होते हुए भी यहाँ भिन्नता का अभिप्राय है, क्योंकि ‘समुच्चयोपमा’ के विपरीत इसमें अन्य (अतिरिक्त) गुणों की बहुलता का वर्णन किया जाता है।

Verse 14

यदुच्यते ऽतिरिक्तत्वं व्यतिरेकोपमा तु सा यत्रोपमा स्याद्वहुभिः सदृशैः सा बहूपमा

जिस अलंकार में ‘अतिरिक्तता/श्रेष्ठता’ का कथन हो, वह ‘व्यतिरेकोपमा’ कहलाता है। और जहाँ अनेक समान उपमानों के द्वारा उपमा की जाए, वह ‘बहूपमा’ कही जाती है।

Verse 15

धर्माः प्रत्युपमानञ्चेदन्ये मालोपमैव साअप्_३४३०१५अबुपमानविकारेण तुलना विक्रियोपमा

यदि धर्मों का तथा प्रत्युपमान का विन्यास अन्य प्रकार से किया जाए, तो वह ‘मालोपमा’ के समान हो जाती है। उपमान में परिवर्तन करके जो तुलना की जाए, वह ‘तुलना’ कहलाती है; और रूपान्तरणयुक्त उपमा ‘विक्रियोपमा’ कही जाती है।

Verse 16

त्रिलोक्यासम्भवि किमप्यारोप्य प्रतियोगिनि कविनोपमीयते या प्रथते साद्भुतोपमा

जिस उपमा में कवि उपमान (प्रतीयोगी) पर त्रिलोकों में भी न मिलने वाली किसी वस्तु का आरोप करके उपमेय का साम्य दिखाता है, वह ‘अद्भुतोपमा’ कहलाती है।

Verse 17

प्रतियोगिनमारोप्य तदभेदेन कीर्तनम् उपमेयस्य सा मोहोपमासौ भ्रान्तिमद्वचः

उपमान (प्रतीयोगी) का आरोप करके उपमेय का उससे अभेद रूप में वर्णन करना ‘मोहोपमा’ कहलाता है; यह भ्रान्ति-युक्त कथन है।

Verse 18

उभयोर्धर्मिणोस्तथ्यानिश् चयात् संशयोपमा उपमेयस्य संशय्य निश् चयान्निश् चयोपमा

उपमेय और उपमान—दोनों में समान धर्म का यथार्थ निश्चय होने पर भी यदि उपमा को संशय रूप में कहा जाए, तो वह ‘संशयोपमा’ है। पर यदि स्वयं उपमेय ही संदिग्ध हो और फिर भी उपमा निश्चयपूर्वक कही जाए, तो वह ‘निश्चयोपमा’ कहलाती है।

Verse 19

वाक्यार्थनैव वाक्यार्थोपमा स्यादुपमानतः आत्मनोपमानादुपमा साधारण्यतिशायिनी

जब पूरे वाक्य के अर्थ की तुलना की जाती है, तब उपमान के कारण वह ‘वाक्यार्थोपमा’ कहलाती है। और जब किसी वस्तु की तुलना उसी से की जाए, तो उससे ‘साधारणी’ या ‘अतिशायिनी’ उपमा उत्पन्न होती है।

Verse 20

उपमेयं यद्न्यस्य तद्न्यस्योपमा मता यद्युत्तरोत्तरं याति तदासौ गगनोपमा

जब एक वस्तु किसी के लिए उपमेय बनकर उपमा का विषय हो, और वही आगे चलकर दूसरी वस्तु के लिए उपमेय बन जाए, ऐसी उपमा मानी जाती है; और जब यह तुलना क्रमशः उत्तरोत्तर बढ़ती जाए, तब वह ‘गगनोपमा’ कहलाती है।

Verse 21

प्रशंसा चैव निन्दा च कल्पिता सदृशी तथा किञ्चिच्च सदृशी ज्ञेया उपमा पञ्चधा पुरः

यहाँ उपमा को पाँच प्रकार का कहा गया है—प्रशंसात्मक, निंदात्मक, कल्पित, वास्तविक समानता पर आधारित, तथा आंशिक (सीमित) समानता पर आधारित।

Verse 22

उपमानेन यत्तत्वमुपमेयस्य रूप्यते गुणानां समतां दृष्ट्वा रूपकं नाम तद्विदुः

गुणों की समानता देखकर जब उपमान का स्वभाव ही उपमेय पर आरोपित कर दिया जाता है, तब विद्वान उस अलंकार को ‘रूपक’ (रूपक-उपमा/रूपक) कहते हैं।

Verse 23

उपमैव तिरोभूतभेदा रूपकमेव वा सहोक्तिः सहभावेन कथनं तुल्यधर्मिणां

समान धर्म वाले पदार्थों का सहभाव (एक साथ उपस्थित होने) के रूप में संयुक्त कथन ‘सहोक्ति’ है; यह भेद-तिरोहित उपमा भी हो सकती है या रूपक भी।

Verse 24

भवेदर्थान्तरन्यासः सादृश्येनोत्तरेण सः अन्यथोपस्थिता वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य च

सादृश्ययुक्त उत्तरवाक्य द्वारा जहाँ अर्थ का समर्थन किया जाता है, वह ‘अर्थान्तरन्यास’ है; तथा चेतन या अचेतन में किसी वृत्ति/व्यवहार का अन्यथा (भिन्न रूप से) आरोप भी इसी में आता है।

Verse 25

अन्यथा मन्यते यत्र तामुत्प्रेक्षां प्रचक्षते लोकसीमान्वृत्तस्य वस्तुधर्मस्य कीर्तनम्

जहाँ किसी वस्तु को उसके यथार्थ से भिन्न रूप में कल्पित/समझा जाता है, उसे ‘उत्प्रेक्षा’ कहते हैं; यह लोक-सीमा के भीतर रहने वाले वस्तु-धर्म का कथन है।

Verse 26

भवेदतिशयो नाम सम्भवासम्भवाद्द्विधा गुणजातिक्रियादीनां यत्र वैकल्यर्दर्शनं

‘अतिशय’ अलंकार दो प्रकार का है—सम्भव और असम्भव। जहाँ गुण, जाति/स्वभाव, क्रिया आदि के विषय में मानो कमी (वैकल्य) दिखाकर प्रभाव को बढ़ाया जाता है।

Verse 27

विशेषदर्शनायैव सा विशेषोक्तिरुच्यते पवनोपमेति ख गमनोपमेति क , ट च प्रसिद्धहेतुव्यावृत्या यत् किञ्चित् कारणान्तरम्

विशेष को प्रत्यक्ष कराने के लिए ही उसे ‘विशेषोक्ति’ कहते हैं—जब प्रसिद्ध कारण को हटाकर कोई अन्य (अप्रत्याशित) कारण बताया जाए; जैसे “पवन के समान” (ख), “गमन के समान” (क), तथा (ट) आदि।

Verse 28

यत्र स्वाभाविकत्वं वा विभाव्यं सा विभावना सङ्गतीकरणं युक्त्या यदसंगच्छमानयोः

जहाँ स्वाभाविकता को अनुमानित या कल्पित रूप से स्थापित किया जाए, वह ‘विभावना’ है। और ‘संगतीकरण’ वह है जिसमें जो दो बातें सामान्यतः नहीं मिलतीं, उन्हें युक्ति से जोड़कर संगत किया जाता है।

Verse 29

विरोधपूर्वकत्वेन तद्विरोध इति स्मृतं सिसाधयिषितार्थस्य हेतुर्भवति साधकः

जो विरोध से पूर्वक होकर प्रस्तुत हो, वह ‘विरोध’ कहलाता है। वह साध्य अर्थ के लिए कारण के रूप में तो रखा जाता है, पर वास्तव में उसकी सिद्धि में बाधक बनता है।

Verse 30

कारको ज्ञापक इति द्विधा सो ऽप्युपजायते प्रवर्तते कारकाख्यः प्राक् पश्चात् कार्यजन्मनः

कारण भी दो प्रकार का होता है—(1) कारक और (2) ज्ञापक। ‘कारक’ वह है जो कार्य के उत्पन्न होने से पहले या बाद में उत्पन्न होकर प्रवृत्त होता है।

Verse 31

पूर्वशेष इति ख्यातस्तयोरेव विशेषयोः कार्यकारणभावाद्वा स्वमावाद्वा नियामकात्

वह संबंध ‘पूर्व-शेष’ कहलाता है—विशेषतः उन दोनों विशेषों के विषय में—या तो कार्य-कारण-भाव से, या स्वभाव से, अथवा किसी नियामक (नियंत्रक) कारण से।

Verse 32

ज्ञापकाख्यस्य भेदो ऽस्ति नदीपूरादिदर्शनात् अविनाभावनियमो ह्य् अविनाभावदर्शनात्

‘ज्ञापक’ नामक एक भेद (लिङ्ग/चिह्न) होता है, जैसा नदी-प्रवाह (बाढ़) आदि के उदाहरणों से देखा जाता है। वास्तव में अविनाभाव (व्याप्ति) का नियम अविनाभाव के दर्शन से ही निश्चित होता है।

Frequently Asked Questions

The chapter emphasizes a formal taxonomy of meaning-ornaments, especially the mechanics and sub-classification of upamā—how comparison is marked (upamā-dyotaka), how samāsa vs non-samāsa expressions affect form, and how analytical expansion yields an 18-fold differentiation.

By prioritizing arthālaṅkāra, it frames language as a disciplined vehicle for truthful, affective, and dharmic communication—showing that beauty becomes spiritually and pedagogically effective when meaning is clarified, intensified, and ethically oriented.