
Chapter 336 — काव्यादिलक्षणम् (Definitions of Poetry and Related Arts)
भगवान् अग्नि साहित्य-शास्त्र का क्रमबद्ध विवेचन आरम्भ करते हैं। वे वाङ्मय के आधार—ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य—की परिभाषा देकर शास्त्र और इतिहास का भेद बताते हैं: एक में शब्द-रचना की प्रधानता, दूसरे में स्थिर अभिप्राय की। काव्य को अभिधा (प्रत्यक्ष अर्थ) की प्रधानता से समझाते हुए वे सच्ची विद्या, काव्य-शक्ति और विवेक की दुर्लभता कहते हैं। विभक्ति, वाक्य-सीमा आदि भाषिक तत्त्वों के बाद काव्य-मीमांसा आती है—काव्य अलंकारयुक्त, गुणसम्पन्न और दोषरहित हो; उसका प्रमाण वेद और लोक-व्यवहार दोनों हैं। फिर भाषा-स्तर और रूप के अनुसार (गद्य, पद्य, मिश्र) रचना-विभाग, गद्य-शैलियाँ तथा पाँच गद्यकाव्य-प्रकार—आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा, कथानिका—का वर्णन होता है। उत्तरार्ध में छन्द और प्रमुख पद्य-रूपों के साथ महाकाव्य-लक्षण बताया जाता है: रीतियों और रस से समृद्ध महाकाव्य, और रस को काव्य का प्राण कहा गया है, चाहे शब्द-कौशल कितना भी प्रमुख हो—इस प्रकार तकनीक और सौन्दर्य-आध्यात्मिक उद्देश्य का समन्वय होता है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे शिक्षानिरूपणं नाम पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः खटवसा इति ख अथ षट्त्रिंशदधिकत्रिशततमो ऽध्यायः काव्यादिलक्षणं अग्निर् उवाच काव्यस्य नाटकादेश् च अलङ्कारान् वदाम्य् अथ ध्वनिर्वर्णाः पदं वाक्यमित्येतद्वाङ्मयं मतं
इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘शिक्षा-निरूपण’ नामक तीन सौ पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ (पाठ-चिह्न: ‘खटवसा’)। अब तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय ‘काव्यादि-लक्षण’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—अब मैं काव्य, नाटक आदि के अलंकार बताता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य—इसी को वाङ्मय (वाणी-सम्बन्धी साहित्य) माना गया है।
Verse 2
शास्त्रेतिहासवाक्यानां त्रयं यत्र समाप्यते शास्त्रे शब्दप्रधानत्वमितिहासेषु निष्ठता
जहाँ शास्त्र और इतिहास के वाक्यों के ये तीन भेद सम्यक् रूप से निर्धारित होते हैं, वहाँ शास्त्र में शब्द (वाक्य-रचना) की प्रधानता मानी जाती है, और इतिहासों में निष्ठा—अर्थ की स्थिरता तथा कथा-सत्य के प्रति निबद्धता—मुख्य होती है।
Verse 3
अभिधायाः प्रधानत्वात् काव्यं ताभ्यां विभिद्यते नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र च दुर्लभा
अभिधा (प्रत्यक्ष वाच्यार्थ) की प्रधानता के कारण काव्य का विभाजन उसी आधार पर दो प्रकारों में किया जाता है। संसार में मनुष्य-देह दुर्लभ है, और उसमें भी सच्ची विद्या और अधिक दुर्लभ है।
Verse 4
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र च दुर्लभा व्युत्पातिर्दुर्लभा तत्र विवेकस्तत्र दुर्लभः
वहाँ (उस दुर्लभ मानव-जीवन में) कवित्व दुर्लभ है; वहीं अभिव्यक्ति-शक्ति भी दुर्लभ है। वहाँ शास्त्र-व्यवहार की व्युत्पत्ति (पारंगतता) दुर्लभ है और विवेक भी दुर्लभ है।
Verse 5
सर्वं शास्त्रमविद्वद्भिर्मृग्यमाणन्न सिध्यति आदिवर्णा द्वितीयाश् च महाप्राणस्तुरीयकः
अविद्वानों द्वारा खोजा/पढ़ा गया समस्त शास्त्र सिद्ध नहीं होता। प्रथम वर्ग के वर्ण, द्वितीय वर्ग के वर्ण तथा चतुर्थ (वर्ग) के वर्ण ‘महाप्राण’ (प्रबल प्राणयुक्त) माने जाते हैं।
Verse 6
वर्गेषु वर्णवृन्दं स्यात् पदं सुप्तिड्प्रभेदतः सङ्क्षेपाद्वाक्यमिष्टार्थव्यवछिन्ना पदाबली
वर्गों (ध्वनि-वर्गों) में वर्णों का समूह ‘वर्णवृन्द’ कहलाता है। ‘पद’ वह है जो सुप् और तिङ् (नाम और क्रिया-प्रत्यय) के भेद से निर्धारित हो। संक्षेप में, ‘वाक्य’ इच्छित अर्थ को व्यक्त करने हेतु सीमित/नियत शब्द-समूह है।
Verse 7
काव्यं स्फुटदलङ्कारं गुणवद्दोषवर्जितम् योनिर्वेदश् च लोकश् च सिद्धमन्नादयोनिजं
काव्य वह है जिसमें अलंकार स्पष्ट हों, जो गुणों से युक्त और दोषों से रहित हो। उसकी योनियाँ वेद और लोक-व्यवहार हैं; यह सिद्ध (मान्य) कला है, जो ‘अन्न आदि’ की योनियों से उत्पन्न मानी गई है।
Verse 8
देवादीनाम् संस्कृतं स्यात् प्राकृतं त्रिविधं नृणां गद्यं पद्यञ्च मिश्रञ्च काव्यादि त्रिविधं स्मृतम्
देवों आदि के लिए भाषा संस्कृत कही गई है; मनुष्यों के लिए प्राकृत तीन प्रकार की मानी गई है। काव्य आदि रचना भी तीन प्रकार की स्मृत है—गद्य, पद्य और मिश्र।
Verse 9
अपदः पदसन्तानो गद्यन्तदपि गद्यते चूर्णकोत्कलिकागन्धिवृत्तभेदात् त्रिरूपकम्
छन्द के पद (पाद) रहित शब्दों की निरन्तर धारा गद्य कहलाती है; और जो छन्दान्त-लय से युक्त हो, वह भी गद्य ही कही जाती है। चूर्णक, उत्कलिका और गन्धी—इन शैली-भेदों से यह तीन रूपों वाली मानी गई है।
Verse 10
अल्पाल्पविग्रहं नातिमृदुसन्दर्भनिर्भरं चूर्णकं नाम्तो दीर्घसमासात् कलिका भवेत्
जिसमें विग्रह (पद-विभाग) बहुत थोड़ा हो और जो अत्यन्त मृदु-सन्दर्भ पर अधिक निर्भर न हो, वह ‘चूर्णक’ कहलाता है; परन्तु दीर्घ समासों से युक्त होने पर वही ‘कलिका’ हो जाता है।
Verse 11
भवेन्मध्यमसन्दर्भन्नातिकुत्सितविग्रहम् वृत्तच्छायाहरं वृत्तं गन्धिनैतत् किलोत्कटम्
उसमें सन्दर्भ-सम्बन्ध मध्यम हो और विग्रह अत्यन्त दोषपूर्ण न हो। जो छन्द दूसरे छन्द की छाया (लय-स्वभाव) को हर ले, वह ‘गन्धी’ (मिश्र/दूषित) कहलाता है; और इसे ही भारी दोष माना गया है।
Verse 12
आख्यायिका कथा खण्डकथा परिकथा तथा कथानिकेति मन्यन्ते गद्यकाव्यञ्च पञ्चधा
वे गद्यकाव्य को पाँच प्रकार का मानते हैं—आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा तथा कथानिका।
Verse 13
कर्तृवंशप्रशंसा स्याद्यत्र गद्येन विस्तरात् कन्याहरणसंग्रामविप्रलम्भविपत्तयः
जिस रचना में विस्तृत गद्य द्वारा कर्ता के वंश की प्रशंसा हो, और साथ ही कन्या-हरण, संग्राम, प्रेम-विरह तथा विपत्तियों के प्रसंग आएँ, वही (विधा) कही जाती है।
Verse 14
भवन्ति यत्र दीप्ताश् च रीतिवृत्तिप्रवृत्तयः उच्छासैश् च परिच्छेदो यत्र या चूर्णकोत्तरा
जिस छन्दोबद्ध रचना में रीति और वृत्ति की प्रवृत्तियाँ दीप्त हो उठें, जहाँ उच्छ्वास (विराम) द्वारा परिच्छेद किया जाए, और जहाँ ‘चूर्णकोत्तरा’ नामक समापन-लय हो—वही (लक्षण) है।
Verse 15
वक्त्रं वापरवक्त्रं वा यत्र साख्यायिका स्मृता श्लोकैः स्ववंशं संक्षेपात् कविर्यत्र प्रशंसति
जिस रचना में कथा कवि के अपने वक्त्र से या किसी अन्य वक्ता के माध्यम से कही जाए, और जिसमें कवि श्लोकों द्वारा संक्षेप में अपने वंश की प्रशंसा करे—वह ‘आख्यायिका’ कही गई है।
Verse 16
सुख्यस्यार्थावताराय भवेद्यत्र कथान्तरम् परिच्छेदो न यत्र स्याद्भवेद्वालम्भकैः क्वचित्
जहाँ पाठक-सुख और अर्थ के स्पष्ट अवतरण के लिए ही कथान्तर का प्रवेश कराया जाए, वहीं उसे करना चाहिए; और जहाँ उचित परिच्छेद न हो, वहाँ कभी-कभी कथा को सँभालने हेतु ‘वालम्भक’ सहायक-प्रसंग रखे जा सकते हैं।
Verse 17
सा कथा नाम तद्गर्भे निबध्नीयाच्चतुष्पदीं भवेत् खण्डकथा यासौ यासौ परिकथा तयोः
जिस कथा के गर्भ में चतुष्पदी (चार-पंक्तियों का खण्ड) रचा जाए, वह ‘कथा’ कहलाती है। जो खण्डित रूप की हो वह ‘खण्डकथा’ है; और जो प्रसंगवश सहायक रूप में हो वह ‘परिकथा’—इन दोनों का यही भेद है।
Verse 18
अमात्यं सार्थकं वापि द्विजं वा नायकं विदुः स्यात्तयोः करुणं विद्धि विप्रलम्भश् चतुर्विधः
अमात्य, सार्थक (कारवाँ-नायक/व्यापारी) अथवा ब्राह्मण—इनमें से किसी को नायक मानते हैं। इनके प्रसंग में करुण रस प्रधान है; और विप्रलम्भ (वियोग) चार प्रकार का जानना चाहिए।
Verse 19
समाप्यते तयोर् नाद्या सा कथामनुधावति कथाख्यायिकयोर्मिश्रभावात् परिकथा स्मृता
उन दोनों में से पहली कथा के समाप्त होने पर दूसरी कथा, कथारूप की धारा का अनुसरण करती है। कथा और आख्यायिका के मिश्रित स्वरूप के कारण उसे ‘परिकथा’ कहा गया है।
Verse 20
भयानकं सुखपरं गर्भे च करुणो रसः अद्भुतो ऽन्ते सुकॢप्तार्थो नोदात्ता सा कथानिका
जो कथा भय उत्पन्न करने वाली होकर भी सुखद परिणाम की ओर उन्मुख हो, मध्य में करुण रस रखे, अंत में अद्भुत से समाप्त हो, अर्थ की दृष्टि से सुव्यवस्थित हो और उदात्त शैली न अपनाए—वही ‘कथानिका’ कहलाती है।
Verse 21
पद्यं चतुष्पदी तच्च वृत्तं जातिरितित्रिधा वृत्तमक्षरसंख्येयमुक्थं तत् कृतिशेषजम्
पद्य चार पंक्तियों का होता है। वह तीन प्रकार का है—वृत्त, जाति और ‘उक्थ’ (जो कृति-निर्माण के शेष से उत्पन्न कहा गया है)। वृत्त अक्षरों की संख्या से निर्धारित होता है।
Verse 22
मात्राभिर्गणना सा जातिरिति काश्यपः सममर्धसमं वृत्तं विषमं पैङ्गलं त्रिधा
काश्यप के अनुसार मात्राओं द्वारा की गई गणना ‘जाति’ कहलाती है। और पिङ्गल के मत में वृत्त तीन प्रकार का है—सम, अर्धसम और विषम।
Verse 23
सा विद्या नौस्तितीषूर्णां गभीरं काव्यसागरं महाकाव्यं कलापश् च पर्याबन्धो विशेषकम्
जो गहरे काव्य-सागर को पार करना चाहते हैं, उनके लिए वह विद्या नाव के समान है; वह महाकाव्य, कलाप, पर्याबन्ध और विशेषक—इन काव्य-रूपों का विवेचन करती है।
Verse 24
कुलकं मुक्तकं कोष इति पद्यकुटुम्बकम् सर्गबन्धो महाकाव्यमारब्धं संस्कृतेन यत्
‘पद्यकुटुम्बक’ के भेद—कुलक, मुक्तक और कोष—कहे गए हैं। जो रचना परिष्कृत संस्कृत में आरम्भ होकर सर्ग-रचना (सर्गबन्ध) के क्रम में बँधी हो, वही महाकाव्य कहलाती है।
Verse 25
तादात्म्यमजहत्तत्र तत्समं नाति दुष्यति इतिहासकथोद्भूतमितरद्वा सदाश्रयं
वहाँ मुख्यार्थ को न छोड़ने वाला तादात्म्य स्वीकार्य है; और उसके समकक्ष प्रयोग भी अधिक दोषपूर्ण नहीं होते। वह इतिहास या कथा से उद्भूत हो अथवा अन्यत्र से, उसे सदा उचित आधार पर प्रतिष्ठित होना चाहिए।
Verse 26
मन्त्रदूतप्रयाणाजिनियतं नातिविस्तरम् शक्कर्यातिजगत्यातिशक्कर्या त्रिष्टुभा तथा
मन्त्रदूत, प्रयाण और आजिनी—ये छन्द नियत हैं और अत्यधिक विस्तृत नहीं; इसी प्रकार शक्करि, अतिजगती, अतिशक्करि तथा त्रिष्टुभ भी (छन्दों में) गिने जाते हैं।
Verse 27
पुष्पिताग्रादिभिर्वक्राभिजनैश्चारुभिः समैः मुक्ता तु भिन्नवृत्तान्ता नातिसंक्षिप्तसर्गकम्
जो रचना ‘पुष्पिताग्र’ आदि से अलंकृत, सुन्दर वक्रता और अभिजन-शैली से युक्त, रमणीय तथा सम (लयबद्ध) हो—वह ‘मुक्ता’ कहलाती है; उसके वृत्तान्त विविध हों और सर्ग अत्यधिक संक्षिप्त न हों।
Verse 28
अतिशर्क्वरिकाष्टिभ्यामेकसङ्कीर्णकैः परः मात्रयाप्यपरः सर्गः प्राशस्त्येषु च पश्चिमः
पूर्वोक्त छन्दों के आगे ‘अतिशर्क्वरी’ और ‘काष्टी’ नामक भेद आते हैं। फिर एक ही प्रकार के संकीर्ण-मिश्र छन्द होते हैं। एक अन्य वर्ग मात्राओं के आधार पर भिन्न होता है; और प्रशस्ति-छन्दों में अन्तिम ‘पश्चिम’ कहलाता है।
Verse 29
कल्पो ऽतिनिन्दितस्तस्मिन्विशेषानादरः सतां नगरार्णवशैलर्तु चन्द्रार्काश्रमपादपैः
उस प्रकार की रचना में ‘कल्प’ (शैली-रचना) अत्यन्त निन्दित है; क्योंकि उसमें विद्वानों द्वारा मान्य भेदों का आदर नहीं रहता और ‘नगर, अर्णव, शैल, ऋतु, चन्द्र, अर्क, आश्रम, पादप’ आदि शब्दों का अविवेकपूर्ण प्रयोग होता है।
Verse 30
उद्यानसलिलक्रीडामधुपानरतोत्सवैः दूतीवचनविन्यासैर् असतीचरिताद्भूतैः
उद्यान और जल-क्रीड़ाओं, मधुपान में आसक्त उत्सवों, भोग-विलासों, दूती के वचनों की चतुर विन्यास-शैली, तथा असती स्त्री के चरित्र के अद्भुत प्रसंगों के द्वारा (उसका) चित्रण किया जाता है।
Verse 31
तमसा मरुताप्यन्यैर् विभावैर् अतिनिर्भरैः कश्यप इति ज , ञ , ट च तादर्थमजहत्तत्रेति ज अनुष्टुभेति ज व्यक्तेति ञ सर्ववृत्तिप्रवृत्तञ्च सर्वभावप्रभावितम्
तम, मरुत् तथा अन्य अत्यन्त प्रबल कारणों से अभिभूत (पाठ) में ‘कश्यप’—यह ज-, ञ- और ट-परम्पराओं के अनुसार है। वहाँ ज-परम्परा कहती है—‘तादर्थम् अजहत्तत्र’ (अर्थ का परित्याग नहीं किया) तथा ‘अनुष्टुभे’ (अनुष्टुभ्-छन्द में); और ञ-परम्परा कहती है—‘व्यक्त’। यह वही है जो समस्त वृत्तियों को प्रवृत्त करता और समस्त भावों से प्रभावित होता है।
Verse 32
सर्वरीतिरसैः पुष्टं पुष्टङ्गुणविभूषणैः अत एव महाकाव्यं तत्कर्ता च महाकविः
जो रचना समस्त रीति और रसों से पुष्ट हो, तथा परिपक्व गुणों और अलंकारों से विभूषित हो—वही ‘महाकाव्य’ कहलाती है; और उसका रचयिता ‘महाकवि’ कहा जाता है।
Verse 33
वाग्वैदग्ध्यप्रधानेपि रस एवात्र जीवितम् पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यं वाग्वक्रिम्नि रसाद्वपुः
यहाँ वाणी-चातुर्य प्रधान होने पर भी काव्य का प्राण केवल रस ही है। वाणी की वक्रता अलग प्रयत्न से उत्पन्न होती है, पर उसका शरीर रस से ही बना है।
Verse 34
चतुर्वर्गफलं विश्वग्व्याख्यातं नायकाख्यया समानवृत्तिनिर्व्यूटः कौशिकीवृत्तिकोमलः
इसका फल चतुर्वर्ग की सिद्धि है; और ‘नायक’ नाम से इसे सर्वत्र लागू रूप में समझाया गया है। यह सम-वृत्त में रचित है तथा कौशिकी वृत्ति के अनुरूप कोमल स्वभाव वाला है।
Verse 35
कलापो ऽत्र प्रवासः प्रागनुरागाह्वयो रसः सविशेषकञ्च प्राप्त्यादि संस्कृतेनेत्रेण च
यहाँ क्रम यह है—पहले प्रवासजन्य वियोग; फिर ‘प्रागनुराग’ नामक रस; तथा ‘सविशेषक’ प्रकार का निरूपण, और प्राप्ति आदि अवस्थाएँ—इन सबको संस्कृत-नेत्र, अर्थात् संस्कारित समझ से पहचानना चाहिए।
Verse 36
श्लोकैर् अनेकैः कुलकं स्यात् सन्दानितकानि तत् मुक्तकं श्लोक एकैकश् चमत्कारक्षमः सता ं
अनेक श्लोकों का समूह ‘कुलक’ कहलाता है; वही ‘सन्दानितक’ (परस्पर जुड़ा हुआ) भी कहा जाता है। ‘मुक्तक’ तो एक ही श्लोक है, जो अकेला ही सज्जनों में काव्य-चमत्कार उत्पन्न करने में समर्थ होता है।
Verse 37
सूक्तिभिः कविसिंहानां सुन्दरीभिः समन्वितः कोषो ब्रह्मापरिच्छिन्नः स विदग्धाय रोचते
कवि-सिंहों की सुन्दर सूक्तियों से युक्त ऐसा कोश—जो ब्रह्मा से भी अपरिच्छिन्न, अर्थात् असीम है—वही विदग्ध रसिक को प्रिय लगता है।
Verse 38
आभासोपमशक्तिश् च सर्गे यद्भिन्नवृत्तता मिश्रं वपुरिति ख्यातं प्रकीर्णमिति च द्विधा श्रव्यञ्चैवाभिनेयञ्च प्रकीर्णं सकलोक्तिभिः
जब किसी सर्ग में छन्दों का विविध प्रयोग हो और आभास, उपमा तथा शक्ति आदि अलंकार भी साथ हों, तब वह रचना “मिश्र-वपु” कहलाती है। वही “प्रकीर्ण” भी कही जाती है, जो दो प्रकार की है—(1) श्रव्य और (2) अभिनय-योग्य; क्योंकि उसमें सब प्रकार की उक्तियाँ/संवादात्मक अभिव्यक्तियाँ होती हैं।
It defines the hierarchy of verbal units (dhvani–varṇa–pada–vākya), specifies pada via sup/tiṅ inflections, defines vākya as an intended-meaning-delimited word-sequence, and classifies metres by akṣara-count (vṛtta) and mātrā-count (jāti), including Piṅgala’s sama/ardhasama/viṣama scheme.
By treating literary science as disciplined speech aligned with dharma: it anchors poetry in Veda and loka, demands freedom from doṣa and cultivation of guṇa, and places rasa as the ‘life’ of expression—training discernment (viveka) and refined cognition that can support ethical living and inner purification.
As composition with clearly manifest alaṅkāras, endowed with guṇas, and devoid of doṣas, grounded in both Vedic authority and established worldly usage.
Ākhyāyikā, kathā, khaṇḍakathā, parikathā, and kathānikā.