
Chapter 279 — सिद्धौषधानि (Siddhauṣadhāni, “Perfected Medicines”) — Colophon/Closure
यह खंड ‘सिद्धौषधानि’ नामक पूर्ववर्ती आयुर्वेद-विषय का औपचारिक उपसंहार (कोलोफन) है। पुराण-रचना में यह समाप्ति-सूचक केवल संपादकीय संकेत नहीं, बल्कि अग्नेय विद्या के अंतर्गत एक स्वतंत्र आयुर्वेद-विद्या के पूर्ण संप्रेषण का प्रमाण है। अध्याय-नाम लेकर और समाप्ति-मुद्रा देकर ग्रंथ चिकित्सा को शिक्षणीय, संरक्षित और प्रामाणिक शास्त्र के रूप में स्थापित करता है। इसके तुरंत बाद ‘सर्वरोगहर औषधियाँ’ वाले अगले पाठ के लिए भूमिका बनती है—विशेष सिद्ध उपचारों से अधिक सार्वत्रिक, निवारक और समन्वयकारी उपायों की ओर संकेत करते हुए। अग्निपुराण की समन्वय-पद्धति में यह वैद्यक ज्ञान व्यावहारिक भी है और पवित्र भी, जो देह-स्थैर्य से मन को धर्म और भक्ति हेतु स्थिर करता है।
Verse 1
इत्य् आग्नेये महापुराणे सिद्धौषधानि नामाष्ट्सप्तत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः अथैकोनाशीत्यधिकद्विशततमो ऽध्यायः सर्वरोगहराण्यौषधानि धन्वन्तरिर् उवाच शारीरमानमागन्तुसहजा व्याधयो मताः शारीरा ज्वरकुष्ठाद्या क्रोधाद्या मानसा मताः
इस प्रकार अग्नि-महापुराण में ‘सिद्धौषधाणि’ नामक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब दो सौ अस्सीवाँ अध्याय—‘सर्वरोगहर औषधियाँ’—आरम्भ होता है। धन्वन्तरि ने कहा: रोग शरीर-सम्बन्धी माने गए हैं और दो प्रकार के हैं—आगन्तुक (बाह्य कारण से) तथा सहज (जन्मजात)। शारीरिक रोगों में ज्वर, कुष्ठ आदि आते हैं; और मानसिक रोग क्रोध आदि से उत्पन्न माने गए हैं।
Verse 2
आगन्तवो विघातोत्था सहजाः क्षुज्जरादयः शारीरागन्तुनाशाय सूर्यवारे घृतं गुडम्
रोग अनेक प्रकार के होते हैं—आगन्तुक, आघात से उत्पन्न, और सहज, जैसे भूख, ज्वर आदि। शरीर में आए आगन्तुक विकारों के नाश हेतु रविवार को घी और गुड़ देना चाहिए।
Verse 3
लवणं सहिरण्यञ्च विप्रायापूपमर्पयेत् चन्द्रे चाभ्यङ्गदो विप्रे सर्वरोगैः प्रमुच्यते
नमक को स्वर्ण सहित तथा अपूप (मिष्ठान्न) ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए। और चन्द्र के अवसर पर ब्राह्मण को अभ्यंग-दान (तेल-मर्दन हेतु द्रव्य) देने से मनुष्य सब रोगों से मुक्त होता है।
Verse 4
तैलं शनैश् चरे दद्यादाश्विने गोरसान्नदः घृतेन पयसा लिङ्गं संस्नाप्य स्याद्रुगुज्झितः
शनैश्चर (शनिवार) को तैल-दान करे; और आश्विन मास में गो-रसादि से बना अन्न अर्पित करे। घी और दूध से शिवलिङ्ग का अभिषेक करने पर मनुष्य रोग-रहित होता है।
Verse 5
गायत्र्या हावयेद्वह्नौ दूर्वान्त्रिमधुराप्लुताम् यस्मिन् भे व्याधिमाप्नोति तस्मिन् स्नानं बलिः शुभे
गायत्री का जप करते हुए त्रिमधुर (दूध, दही, घी/मधु आदि) से सिक्त दूर्वा को अग्नि में हवन करे। जिस नक्षत्र में रोग प्राप्त हुआ हो, उसी में स्नान और शुभ बलि-दान करना चाहिए।
Verse 6
मानसानां रुजादीनां विष्णोः स्तोत्रं हरं भवेत् वातपित्तकफा दोषा धातवश् च तथा शृणु
मानसिक पीड़ा आदि के निवारण हेतु विष्णु-स्तोत्र हरने वाला होता है। अब वात, पित्त, कफ—ये दोष तथा धातुओं के विषय में भी सुनो।
Verse 7
भुक्तं पक्वाशयादन्नं द्विधा याति च सुश्रुत अंशेनैकेन किट्टद्वं रसताञ्चापरेण च
हे सुश्रुत! खाया हुआ अन्न पक्वाशय में पहुँचकर दो भागों में बँट जाता है—एक भाग किट्ट (अपशिष्ट) बनता है और दूसरा भाग रस (पोषक सार) बन जाता है।
Verse 8
किट्टभागो मलस्तत्र विन्मूत्रस्वेददूषिकाः नासामलङ्कर्णमलं तथा देहमलञ्च यत्
इनमें किट्ट का भाग ‘मल’ कहलाता है—अर्थात् विष्ठा, मूत्र, स्वेद आदि दूषक; तथा नासिका का मल, कान का मैल (कर्णमल) और जो भी देह-मल है।
Verse 9
रसभागाद्रसस्तत्र समाच्छोणिततां व्रजेत् मांसं रक्तत्तितो मेदो मेदसो ऽस्थ्नश् च सम्भवः
रस-भाग से वही रस आगे चलकर रक्त बनता है; रक्त से मांस उत्पन्न होता है; मांस से मेद (चर्बी) होता है; और मेद से अस्थि की उत्पत्ति होती है।
Verse 10
अस्थ्नो मज्जा ततः शुक्रं शुकाद्रागस्तथौजसः देशमार्तिं बलं शक्तिं कालं प्रकृतिमेव च
अस्थि से मज्जा होती है, उससे शुक्र; और शुक्र से राग (आसक्ति) तथा ओज (जीवन-तेज) होता है। साथ ही देश, आर्ति/रोग, बल, शक्ति, काल और प्रकृति का भी परीक्षण करना चाहिए।
Verse 11
ज्ञात्वा चिकित्सतं कुर्याद्भेषजस्य तथा बलम् तिथिं रिक्तान्त्यजेद् भौमं मन्दभन्दारुणोग्रकम्
स्थिति जानकर वैद्य को चिकित्सा करनी चाहिए और औषधि के बल (प्रभाव) का भी निर्धारण करना चाहिए। उपचार आरम्भ में रिक्ता तिथियों तथा भौम (मंगलवार) का त्याग करे, जो मंद, बाधक, दारुण और उग्र माना गया है।
Verse 12
हरिगोद्विजचन्द्रार्कसुरादीन् प्रतिपूज्य च शृणु मन्त्रमिमं विद्वन् भेषजारम्भमाचरेत्
हरि, गौ, द्विज (ब्राह्मण), चन्द्र, सूर्य तथा देवगण आदि की विधिपूर्वक पूजा करके, हे विद्वान्, इस मंत्र को सुनो; फिर औषध-चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिए।
Verse 13
ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्रभूचन्द्रार्कानिलानलाः ऋषयश् चौषधिग्रामा भूतसङ्घाश् च पान्तु ते
ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, वायु और अग्नि—तथा ऋषिगण, औषधियों के समुदाय और भूतसमूह—ये सब तुम्हारी रक्षा करें।
Verse 14
रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं यथा सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते
यह औषधि तुम्हारे लिए वैसी ही हो जैसे ऋषियों के लिए रसायन, देवताओं के लिए अमृत, और श्रेष्ठ नागों के लिए सुधा—अर्थात् तुम्हारे लिए यह सच्ची चिकित्सा बने।
Verse 15
वातश्लेष्मातको देशो बहुवृक्षो बहूदकः अनूपड्तिबिख्यातो जाङ्गलस्तद्विवर्जितः
वात और श्लेष्म (कफ) प्रधान देश वह है जहाँ बहुत वृक्ष और बहुत जल हो; वह ‘अनूप’ (आर्द्र/दलदली) प्रदेश कहलाता है। इसके विपरीत ‘जाङ्गल’ (शुष्क) देश होता है।
Verse 16
किञ्चिद्वृक्षोदको देशस् तथा साधारणः स्मृतः जाङ्गलः पित्तबहुलो मध्यः साधारणः स्मृतः
जिस देश में वृक्ष और जल थोड़ा-सा हो, वह भी ‘साधारण’ (मध्यम) माना गया है। जाङ्गल (शुष्क) देश पित्त-बहुल होता है; और ‘मध्य’ देश साधारण (मध्यम) कहा गया है।
Verse 17
रूक्ष्मः शीतश् चलो वायुः पित्तमुष्णं कटुत्रयम् स्थिराम्लस्निग्धमधुरं बलाशञ्च प्रचक्षते
वे वायु (वात) को रूक्ष, शीत और चल बताते हैं; पित्त को उष्ण तथा कटु-त्रय से युक्त; और बल/श्लेष्म (कफ) को स्थिर, अम्ल, स्निग्ध और मधुर गुणों वाला कहते हैं।
Verse 18
वृद्धिः समानैर् एतेषां विपरीतैर् विपर्ययः रसाः स्वाद्वम्ललवणाः श्लेष्मला वायुनाशनाः
इन दोषों की वृद्धि समान कारणों से होती है और विपरीत कारणों से उनका विपर्यय (शमन) होता है। मधुर, अम्ल और लवण रस कफवर्धक हैं तथा वात का शमन करते हैं।
Verse 19
कटुतिक्तकषायाश् च वातलाः श्लेष्मनाशनाः कट्वम्ललवणा ज्ञेयास् तथा पित्तविवर्धनाः
कटु, तिक्त और कषाय रस वातवर्धक तथा श्लेष्म (कफ)नाशक हैं। इसी प्रकार कटु, अम्ल और लवण रस पित्तवर्धक जानने चाहिए।
Verse 20
तिक्तस्वादुकषायाश् च तथा पित्तविनाशनाः रसस्यैतद्गुणं नास्ति विपाकस्यैतदिष्यते
तिक्त, मधुर और कषाय रस भी पित्तनाशक हैं। यह गुण रस का नहीं माना जाता; इसे विपाक (पाचनान्त परिवर्तन) का गुण स्वीकार किया गया है।
Verse 21
वीर्योष्णाः कफवातघ्नाः शीताः पित्तविनाशनाः प्रभावतस् तथा कर्म ते कुर्वन्ति च सुश्रुत
उष्णवीर्य द्रव्य कफ और वात का शमन करते हैं; शीतवीर्य द्रव्य पित्त का विनाश करते हैं। और प्रभाव से वे अपने-अपने विशेष कर्म भी करते हैं, हे सुश्रुत।
Verse 22
शिशिरे च वसन्ते च निदाघे च तथा क्रमात् चयप्रकोपप्रशमाः कफस्य तु प्रकीर्तिताः
शिशिर, वसंत और निदाघ (ग्रीष्म) में क्रमशः कफ के चय, प्रकोप और प्रशमन की अवस्थाएँ बताई गई हैं।
Verse 23
निदाघवर्षारात्रौ च तथा शरदि सुश्रुत चयप्रकोपप्रशमाः पवनस्य प्रकीर्तिताः
निदाघ, वर्षा, रात्रि तथा शरद् में—सुश्रुत के अनुसार—वात (पवन) के चय, प्रकोप और प्रशमन की अवस्थाएँ वर्णित हैं।
Verse 24
मेघकाले च शरदि हेमन्ते च यथाक्रमात् चयप्रकोपप्रशमास् तथा पित्तस्य कीर्तिताः
पित्त के लिए भी मेघकाल, शरद् और हेमन्त में क्रमशः चय, प्रकोप और प्रशमन की अवस्थाएँ कही गई हैं।
Verse 25
वर्षाद्यो विसर्गस्तु हेमन्ताद्यास् तथा त्रयः शिशिराद्यास् तथादानं ग्रीष्मान्ता ऋतवस्त्रयः
वर्षा से आरम्भ होने वाले तीन ऋतु ‘विसर्ग’ कहलाते हैं; हेमन्त से आरम्भ होने वाले भी तीन (उसी प्रकार गिने जाते हैं); और शिशिर से आरम्भ होने वाले तीन ‘आदान’ कहलाते हैं—इस प्रकार ऋतु-त्रय ग्रीष्म तक माने गए हैं।
Verse 26
सौम्यो विसर्गस्त्वादानमाग्नेयं परिकीर्तितम् वर्षादींस्त्रीनृतून् सोमश् चरन् पर्यायशो रसान्
‘विसर्ग’ को सौम्य (चन्द्र-स्वभाव) और ‘आदान’ को आग्नेय (अग्नि-स्वभाव) कहा गया है। सोम वर्षा से आरम्भ तीन ऋतुओं में क्रमशः विचरते हुए रसों का यथाक्रम संचार करता है।
Verse 27
जनयत्यम्ललवणमधुरांस्त्रीन् यथाक्रमम् शिशिरादीनृतूनर्कश् चरन् पर्ययशो रसान्
शिशिर आदि ऋतुओं में क्रमशः विचरता हुआ सूर्य यथाक्रम अम्ल, लवण और मधुर—इन तीन रसों को उत्पन्न करता है।
Verse 28
विवर्धयेत्तथा तिक्तकषायकटुकान् क्रमात् यथा रजन्यो वर्धन्ते वलमेकं हि वर्धते
इसी प्रकार तिक्त, कषाय और कटु रसों को भी क्रमशः बढ़ाना चाहिए, जिससे दोष नियंत्रित रूप से बढ़ें; क्योंकि वास्तव में केवल बल (देह-शक्ति) ही बढ़ाया जाना चाहिए।
Verse 29
क्रमशो ऽथ मनुष्याणां हीयमानासु हीयते रात्रिभुक्तदिनानाञ्च वयसश् च तथैव च
मनुष्यों के लिए जैसे-जैसे भोगे हुए (बीते हुए) रात्रि और दिन क्रमशः घटते जाते हैं, वैसे ही आयु भी उसी प्रकार घटती जाती है।
Verse 30
आदिमध्यावसानेषु कफपित्तसमीरणाः प्रकोपं यान्ति कोपादौ काले तेषाञ्चयः स्मृतः
आरम्भ, मध्य और अन्त में कफ, पित्त और समीरण (वात) प्रकोप को प्राप्त होते हैं; और उनके प्रकोप-काल के आरम्भ में ही उनका संचय कहा गया है।
Verse 31
प्रकोपोत्तरके काले शमस्तेषां प्रकीर्तितः अदिभोजनतो विप्र तथा चाभोजनेन च
हे विप्र! उनके प्रकोप के बाद वाले काल में उनका शमन कहा गया है—अतिभोजन से भी, और इसी प्रकार अभोजन (उपवास) से भी।
Verse 32
रोगा हि सर्वे जायन्ते वेगोदीरणधारणैः अन्नेन कुक्षेर्द्वावंशावेकं पानेन पूरयेत्
निश्चय ही, वेगों को जबरन बढ़ाने या रोकने से सभी रोग उत्पन्न होते हैं। पेट को ऐसे भरें कि दो भाग अन्न से और एक भाग पेय से हो।
Verse 33
आश्रयं पवनादीनां तथैकमवशेषयेत् व्याधेर् निदानस्य तथा विपरीतमथौषधम्
वात आदि दोषों के आश्रय-स्थान का निर्धारण करके, विचार के बाद जो शेष रहे उसे निर्णायक कारण मानें। उसी प्रकार रोग के निदान (कारण) को पहचानकर उसके विपरीत औषध का प्रयोग करें।
Verse 34
कर्तव्यमेतदेवात्र मया सारं प्रकीर्तितम् नाभेरूर्ध्वमधश् चैव गुदश्रोण्योस्तथैव च
यहाँ यही करना चाहिए; मैंने इसका सार कहा है। इसे नाभि के ऊपर और नीचे, तथा गुद और श्रोणि-प्रदेश में भी लागू करें।
Verse 35
बलाशपित्तवातानां देहे स्थानं प्रकीर्तितं तथापि सर्वगाश् चैते देहे वायुर्विशेषतः
देह में बलास (श्लेष्म/कफ), पित्त और वात के स्थान बताए गए हैं; तथापि ये सब पूरे शरीर में व्याप्त हैं—विशेषतः वात।
Verse 36
देहस्य मध्ये हृदयं स्थानं तन्मनसः स्मृतम् कृशो ऽल्पकेशश् चपलो बहुवाग्विषमानलः
देह के मध्य में हृदय को उस मन का स्थान कहा गया है। (ऐसा व्यक्ति) कृश, अल्पकेशी, चंचल, बहुत बोलने वाला और विषम जठराग्नि वाला होता है।
Verse 37
व्योमगश् च तथा स्वप्ने वातप्रकृतिरुच्यते अकालपलितः क्रोधी प्रस्वेदी मधुरप्रियः
जो स्वप्न में आकाश में विचरण करता है, वह वात-प्रकृति का कहा गया है; वह अकाल में श्वेतकेशी, क्रोधी, अधिक पसीना करने वाला और मधुर रस का प्रिय होता है।
Verse 38
स्वप्ने च दीप्तिमत्प्रेक्षी पित्तप्रकृतिरुच्यते दृढाङ्गः स्थिरचित्तश् च सुप्रभः स्निग्धसूर्धजः
जो स्वप्न में भी दीप्तिमान (अग्निसदृश) दृश्य देखता है, वह पित्त-प्रकृति का कहा गया है; उसके अंग दृढ़, चित्त स्थिर, वर्ण तेजस्वी तथा केश-श्मश्रु स्निग्ध होते हैं।
Verse 39
शुद्धाम्बुदर्शी स्वप्ने च कफप्रकृतिको नरः तामसा राजसाश् चैव सात्विकाश् च तथा स्मृताः
जो पुरुष स्वप्न में शुद्ध जल देखता है, वह कफ-प्रकृति का होता है; और ये स्वप्न-लक्षण तीनों गुणों—तामस, राजस और सात्त्विक—के अनुसार भी समझे जाते हैं।
Verse 40
मनुष्या मुनिर्शादूल वातपित्तकफात्मकाः रक्तपित्तं व्यवायाच्च गुरुकर्मप्रवर्तनैः
हे मुनिशार्दूल! मनुष्य वात, पित्त और कफ से युक्त हैं; और व्यवाय (अतिशय मैथुन) तथा गुरु/कठोर कर्मों के प्रवर्तन से रक्तपित्त रोग उत्पन्न होता है।
Verse 41
कदन्नभोजनाद्वायुर्देहे शोकाच्च कुप्यति विदाहिनां तथोल्कानामुष्णान्नाध्वनिसेविनां
कदन्न (निकृष्ट/अहितकर) भोजन करने से तथा शोक से देह में वायु कुपित होती है; इसी प्रकार विदाहक पदार्थों के सेवन करने वालों में, अग्नि/ताप के संपर्क में रहने वालों में, उष्ण अन्न खाने वालों में और अधिक यात्रा करने वालों में भी।
Verse 42
पित्तं प्रकोपमायाति भयेन च तथा द्विज अत्यम्बुपानगुर्वन्नभोजिनां भुक्तशायिनाम्
हे द्विज! भय से पित्त का प्रकोप होता है; इसी प्रकार जो अत्यधिक जल पीते हैं, भारी भोजन करते हैं और भोजन के तुरंत बाद लेट जाते हैं, उनमें भी पित्त बढ़ जाता है।
Verse 43
श्लेकेष्माप्रकोपमायाति तथा ये चालसा जनाः वाताद्युत्थानि रोगाणि ज्ञात्वा शाम्यानि लक्षणैः
इसी प्रकार आलसी लोगों में श्लेष्म (कफ) का प्रकोप होता है; और वात आदि दोषों से उत्पन्न रोगों को उनके लक्षणों से पहचानकर, उन्हीं लक्षणों के अनुसार उनका शमन करना चाहिए।
Verse 44
अस्थिभङ्गः कषायत्वमास्ये शुष्कास्यता तथा जृम्भणं लोमहर्षश् च वातिकव्याधिलक्षणम्
हड्डियाँ टूटने-सी पीड़ा, मुख में कसैलापन, मुख का सूखना, बार-बार जम्हाई आना और रोमांच—ये वातजन्य रोगों के लक्षण हैं।
Verse 45
नखनेत्रशिराणान्तु पीतत्वं कटुता मुखे तृष्णा दाहोष्णता चैव पित्तव्याधिनिदर्शनम्
नाखून, नेत्र और शिराओं का पीलापन, मुख में कटुता, प्यास, दाह और अत्यधिक उष्णता—ये पित्तजन्य रोगों के संकेत हैं।
Verse 46
आलस्यञ्च प्रसेकश् च गुरुता मधुरास्यता उष्णाभिलाषिता चेति श्लैष्मिकव्याधिलक्षणम्
आलस्य, अधिक लार आना, भारीपन, मुख में मिठास और उष्णता की इच्छा—ये कफ (श्लेष्म) जन्य रोगों के लक्षण हैं।
Verse 47
स्निग्धोष्णमन्नमभ्यङ्गस्तैलपानादि वातनुत् आज्यं क्षीरं सिताद्यञ्च चन्द्ररश्म्यादि पित्तनुत्
स्निग्ध और उष्ण भोजन, अभ्यंग (तेल-मर्दन) तथा तैलपान आदि उपाय वात को शांत करते हैं। घी, दूध, शर्करा आदि तथा चन्द्रकिरणों जैसे शीतल उपचार पित्त को शांत करते हैं।
Verse 48
सक्षौद्रं त्रिफलातैलं व्यायामादि कफापहम् सर्वरोगप्रशान्त्यै स्यद्विष्णोर्ध्यानञ्च पूजनम्
मधुयुक्त त्रिफला-तैल तथा व्यायाम आदि उपाय कफ को दूर करते हैं। समस्त रोगों की शांति के लिए विष्णु का ध्यान और पूजन भी विधान किया गया है।
It emphasizes the completion of a bounded Ayurvedic teaching unit, preserving it as a distinct śāstric module within the Agni Purana’s encyclopedic transmission.
By framing medical knowledge as dharmic revelation, it legitimizes bodily care as a support for steadiness in worship, discipline, and the pursuit of mokṣa.