सावित्री-यमसंवादः
Sāvitrī’s Dialogue with Yama and the Restoration of Satyavān
एताश्षान्याश्च दीप्ताक्ष्य: करभोत्कटमूर्द्धजा: । परिवायसिते सीतां दिवारात्रमतन्द्रिता:,ये तथा दूसरी बहुत-सी राक्षसियाँ निद्रा और आलस्यको छोड़कर दिन-रात सीताको घेरे रहती थीं। उनकी आँखें आगकी तरह प्रज्वलित होती थीं और सिरके बाल ऊँटोंके समान रूखे तथा भूरे थे
मार्कण्डेय उवाच