सभा पर्व, अध्याय ३७ — युधिष्ठिरस्य भीष्मोपदेशः
Yudhiṣṭhira’s Consultation and Bhīṣma’s Counsel in the Assembly
नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च । शल्ये मद्राधिपे चैव कथं कृष्णस्त्वयार्चित:,पुरुषप्रवर राजाधिराज दुर्योधन और भरतवंशके आचार्य महात्मा कृपके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजाका औचित्य कैसे स्वीकार किया? तुमने किम्पुरुषोंके आचार्य ट्रुमका उल्लंघन करके कृष्णकी अग्रपूजा क्यों की? पाण्डुके समान दुर्धर्ष वीर तथा राजोचित शुभ- लक्षणोंसे सम्पन्न भीष्मक, राजा रुक्मी और उसी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य तथा मद्रराज शल्यके रहते हुए तुम्हारे द्वारा कृष्णकी पूजा किस दृष्टिसे की गयी?
nṛpe ca rukmiṇi śreṣṭhe ekalavye tathaiva ca | śalye madrādhipe caiva kathaṃ kṛṣṇas tvayārcitaḥ ||
“And when the eminent king Rukmī, Ekalavya the foremost archer, and Śalya the lord of Madra were present, how could Kṛṣṇa be the one you chose to honor with worship?”
शिशुपाल उवाच