युद्धेनाराधित: स्थाणुर्देवाश्न॒ वरदास्तव । तस्य पार्थ प्रसादेन देवदेवस्थ शूलिन:,“जिनकी मूर्ति बड़ी ही उग्र और भयंकर है, जो महात्मा हैं, जिनके तीन नेत्र और मस्तकपर जटाजूट है, उन सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान् शंकरको दूसरे लोग देख भी नहीं सकते फिर उनके साथ युद्ध करनेकी तो बात ही कया है? परंतु तुमने सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण करनेवाले उन्हीं स्थाणुस्वरूप महादेव साक्षात् भगवान् शिवकी युद्धके द्वारा आराधना की है, अन्य देवताओंने भी तुम्हें वरदान दिये है; इसलिये महाबाहु पार्थ! तुम उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शंकरकी कृपासे कर्णको उसी प्रकार मार डालो, जैसे वृत्रविनाशक इन्द्रने नमुचिका वध किया था। कुन्तीनन्दन! तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। तुम युद्धमें विजय प्राप्त करो”
sañjaya uvāca | yuddhenārādhitaḥ sthāṇur devāś ca varadās tava | tasya pārtha prasādena devadevastha śūlinaḥ ||
Sañjaya said: By battle you have worshipped and won the favor of Sthāṇu (Śiva), and the gods too have granted you boons. Therefore, O Pārtha, by the grace of that God of gods, the trident-bearing Lord, strike down Karṇa—just as Indra, the slayer of Vṛtra, killed Namuci. May auspiciousness ever attend you; win victory in this war.
संजय उवाच