हतं कर्णस्तु त॑ दृष्टवा प्रियं पुत्रं दुरात्मवान् । स्मरतां द्रोणभीष्माभ्यां वच:ः क्षत्तुश्ष मानद,“माननीय पुरुषोंको मान देनेवाले पार्थ! यदि तुम सूतपुत्र कर्णके देखते-देखते अपनी प्रतिज्ञाकी पूर्तिके लिये उसके पुत्र वृषसेनको बाणोंद्वारा मार डालो तो अपने प्रिय पुत्रको मारा गया देख वह दुरात्मा कर्ण द्रोणाचार्य, भीष्म और विदुरजीकी कही हुई बातोंको याद करे
hataṁ karṇas tu taṁ dṛṣṭvā priyaṁ putraṁ durātmavān | smaratāṁ droṇabhīṣmābhyāṁ vacaḥ kṣattuś ca mānada ||
Sañjaya said: Seeing his beloved son slain, Karṇa—hard-hearted in that moment—recalled the words spoken by Droṇa and Bhīṣma, and also by Vidura, the giver of honor.
संजय उवाच