कर्णो वैकर्तनो युद्धे राक्षसेन युयुत्सति । “तुम विशाल सेनासे घिरकर वहीं जाओ, जहाँ महाबली वैकर्तन कर्ण रणभूमिमें उस राक्षसके साथ युद्ध करना चाहता है,उद्यम्य न्यवधीद् भूमौ मयं विष्णुरिवाहवे । विशालकाय राक्षसराज अलम्बुषको दोनों हाथोंसे पकड़कर घटोत्कचने युद्धस्थलमें उसे उठाकर धरतीपर दे मारा, मानो भगवान् विष्णुने मयासुरको पछाड़ दिया हो ।। ततो घटोत्कच: खड्गमुद्धृत्याद्भुतदर्शनम् निचकर्त महाराज शत्रोरमितविक्रम: । महाराज! तब अमितपराक्रमी घटोत्कचने हि त दिखायी देनेवाली अपनी तलवार उठाकर समरांगणमें अत्यन्त भयंकर गर्जना करते और उछल-कूद मचाते हुए शत्रु अलम्बुषके भयंकर एवं विकराल मस्तकको उस भयानक राक्षसकी कायासे काटकर अलग कर दिया
karṇo vaikartano yuddhe rākṣasena yuyutsati |
Sañjaya said: In the thick of battle, Karṇa—son of the charioteer (Vaikartana)—was eager to engage a rākṣasa in combat. The line underscores the relentless escalation of the war: even the foremost human heroes are drawn into clashes with non-human, fearsome opponents, where prowess and resolve are tested beyond ordinary limits.
संजय उवाच