
Śraddhā–Guṇa–Vibhāga Yoga (Faith and the Three Guṇas) — Mahābhārata Book 6, Chapter 39
Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-upākhyāna within Bhīṣma Parva)
Arjuna asks how to understand the faith (śraddhā) of those who engage in worship while setting aside scriptural procedure, and whether their orientation is sāttvika, rājasa, or tāmasa (1). Kṛṣṇa replies that embodied beings exhibit a threefold faith arising from disposition (svabhāva), and that a person is effectively constituted by faith (2–3). He then classifies worship-objects: sāttvika practitioners orient toward devas, rājasa toward yakṣa/rākṣasa-type powers, and tāmasa toward pretas and bhūta-groups (4). He critiques severe, non-scriptural austerities driven by ostentation, ego, desire, and coercive force, describing them as harmful to the embodied aggregate and as misconstruing the indwelling divine principle (5–6). The discourse then systematizes threefold typologies: foods (āhāra) that support vitality and clarity versus those that inflame distress or foster dullness (7–10); sacrifices (yajña) performed as duty without reward-seeking versus those motivated by display or lacking method and faith (11–13); austerities (tapas) of body, speech, and mind, and their sāttvika/rājasa/tāmasa variants by motivation and stability (14–19); and gifts (dāna) given appropriately without expectation versus transactional or contemptuous giving (20–22). Finally, Kṛṣṇa explains “oṃ tat sat” as a threefold designation connected with Brahman, used to frame disciplined acts (23–27), and concludes that actions done without faith are termed “asat” and yield no enduring benefit in this life or the next (28).
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-परिवेश में अर्जुन का प्रश्न भीतर की ओर मुड़ता है—‘क्षेत्र’ (देह-प्रकृति) और ‘क्षेत्रज्ञ’ (चेतना) का यथार्थ क्या है, और ज्ञानी पुरुष सुख-दुःख को कैसे देखता है। → भगवान् श्रीकृष्ण देह में रोग-पीड़ा के अनुभव और मन के शोक-हर्ष के भेद को स्पष्ट करते हैं; फिर लोक-जीवन के साधारण कर्मों (दूध दुहना, धान कूटना, दही बिलोना, आँगन लीपना, बच्चों को झुलाना/लोरी देना) के बीच भी ज्ञान की कसौटी रखकर दिखाते हैं कि बंधन कर्म से नहीं, आसक्ति-अविद्या से है। → ‘जानने वाला होकर भी इन्द्रियों से रहित, निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता; ज्योतियों का भी ज्योति, तमस से परे, सबके हृदय में स्थित’—इस परब्रह्म/परमात्मा का घोष अध्याय का शिखर बनता है, जहाँ ज्ञेय का स्वरूप एक साथ निराकार-व्यापक और अंतर्यामी रूप में प्रकट होता है। → क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में समाहार कर श्रीकृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि जो भक्त इस तत्त्व को जान लेता है, वह ‘मद्भाव’—भगवद्स्वरूप/परमगति—को प्राप्त होता है; क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का पूर्ण ज्ञान संसार-भ्रम का नाश करता है। → अगले प्रसंग के लिए संकेत रहता है कि अब ‘क्षेत्रज्ञ’ के व्यापकत्व, प्रकृति-पुरुष के संबंध और ज्ञान के फल की सूक्ष्म व्याख्या आगे और गहरी होगी।
Verse 1
१२), अर्थात् 'ज्ञानी पुरुष हर्ष-शोकोंको सर्वथा त्याग देता है।' प्रारब्ध-भोगके अनुसार शरीरमें रोग हो जानेपर उनको पीड़ारूप दुःखका बोध तो होता है और शरीर स्वस्थ रहनेसे उसमें पीड़ाके अभावका बोधरूप सुख भी होता है, किंतु राग-द्वेघका अभाव होनेके कारण हर्ष और शोक उन्हें नहीं होते। इसी तरह किसी भी अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थ या घटनाके संयोग-वियोगमें किसी प्रकारसे भी उनको हर्ष-शोक नहीं होते। यही उनका सुख-दुःखमें सम रहना है। 3. अपना अपकार करनेवालेको किसी प्रकारका दण्ड देनेकी इच्छा न रखकर उसे अभय देनेवालेको “क्षमावान् कहते हैं। भगवानके ज्ञानी भक्तोंमें क्षमाभाव भी असीम रहता है। क्षमाकी व्याख्या गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें विस्तारसे की गयी है। ४. भक्तियोगके द्वारा भगवानको प्राप्त हुए ज्ञानी भक्तको यहाँ “योगी” कहा गया है; ऐसा भक्त परमानन्दके अक्षय और अनन्त भण्डार श्रीभगवानको प्रत्यक्ष कर लेता है, इस कारण वह सदा ही संतुष्ट रहता है। उसे किसी समय, किसी भी अवस्थामें, किसी भी घटनामें संसारकी किसी भी वस्तुके अभावमें असंतोषका अनुभव नहीं होता; क्योंकि वह पूर्णकाम है, यही उसका निरन्तर संतुष्ट रहना है। ५. इससे यह भाव दिखलाया है कि भगवानके ज्ञानी भक्तोंका मन और इन्द्रियोंसहित शरीर सदा ही उनके वशमें रहता है। वे कभी मन और इन्द्रियोंके वशमें नहीं हो सकते, इसीसे उनमें किसी प्रकारके दुर्गुण और दुराचारकी सम्भावना नहीं होती। ६. जिसने बुद्धिके द्वारा परमेश्वरके स्वरूपका भलीभाँति निश्चय कर लिया है, जिसे सर्वत्र भगवानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा जिसकी बुद्धि गुण, कर्म और दुःख आदिके कारण परमात्माके स्वरूपसे कभी किसी प्रकार विचलित नहीं हो सकती, उसको “दृढनिश्चय” कहते हैं। ७. नित्य-निरन्तर मनसे भगवान्के स्वरूपका चिन्तन और बुद्धिसे उसका निश्चय करते-करते मन और बुद्धिका भगवानके स्वरूपमें सदाके लिये तन््मय हो जाना ही उनको “भगवानमें अर्पण करना' है। ८. जो उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न है; जिसका भगवान्में अहैतुक और अनन्य प्रेम है, जिसकी भगवानके स्वरूपमें अटल स्थिति है, जिसका कभी भगवानसे वियोग नहीं होता, जिसके मन-बुद्धि भगवानके अर्पित हैं, भगवान् ही जिसके जीवन, धन, प्राण एवं सर्वस्व हैं, जो भगवानके ही हाथकी कठपुतली है--ऐसे सिद्ध भक्तको भगवान् अपना प्रिय बतलाते हैं। ९. पूर्वाद्धमें केवल दूसरे प्राणीसे उसे उद्वेग नहीं होता, इतना ही कहा गया है। इससे परेच्छाजनित उद्वेगकी निवृत्ति तो हुई; किंतु अनिच्छा और स्वेच्छासे प्राप्त घटना और पदार्थमें भी तो मनुष्यको उद्वेग होता है, इसलिये उत्तरार्धमें पुनः उद्वेगसे मुक्त होनेकी बात कहकर भगवान् यह सिद्ध कर रहे हैं कि भक्तको कभी किसी प्रकार भी उद्वेग नहीं होता। ३०. सर्वत्र भगवद्बुद्धि होनेके कारण भक्त जान-बूझकर तो किसीको दुःख, संताप, भय और क्षोभ पहुँचा ही नहीं सकता, बल्कि उसके द्वारा तो स्वाभाविक ही सबकी सेवा और परम हित ही होते हैं। अतएव उसकी ओरसे किसीको कभी उद्वेग नहीं होना चाहिये। यदि भूलसे किसी व्यक्तिको उद्वेग होता है तो उसमें उस व्यक्तिके अपने अज्ञानजनित राग, द्वेष और ईर्ष्यादि दोष ही प्रधान कारण हैं, भगवद्धक्त नहीं; क्योंकि जो दया और प्रेमकी मूर्ति है एवं दूसरोंका हित करना ही जिसका स्वभाव है, वह परम दयालु प्रेमी भगवत्प्राप्त भक्त तो किसीके उद्वेगका कारण हो ही नहीं सकता। ३. ज्ञानी भक्तको भी प्रारब्धके अनुसार परेच्छासे दुःखके निमित्त तो प्राप्त हो सकते हैं, परंतु उसमें राग-द्वेषका सर्वथा अभाव हो जानेके कारण बड़े-से-बड़े दु:खकी प्राप्तिमें भी वह विचलित नहीं होता (गीता ६२२); इसीलिये ज्ञानी भक्तको किसी भी प्राणीसे उद्धेग नहीं होता। २. अभिप्राय यह है कि वास्तवमें मनुष्यको अपने अभिलषित मान, बड़ाई और धन आदि वस्तुओंकी प्राप्ति होनेपर जिस तरह हर्ष होता है, उसी तरह अपने ही समान या अपनेसे अधिक दूसरोंको भी उन वस्तुओंकी प्राप्ति होते देखकर प्रसन्नता होनी चाहिये; किंतु प्रायः ऐसा न होकर अज्ञानके कारण लोगोंको उलटा अमर्ष होता है और यह अमर्ष विवेकशील पुरुषोंके चित्तमें भी देखा जाता है। वैसे ही इच्छा, नीति और धर्मके विरुद्ध पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर उद्वेग तथा नीति और धर्मके अनुकूल भी दु:ःखप्रद पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर या उसकी आशंकासे भय होता देखा जाता है। दूसरोंकी तो बात ही क्या, मृत्युका भय तो विवेकियोंको भी होता है; किंतु भगवानके ज्ञानी भक्तकी सर्वत्र भगवदबुद्धि हो जाती है और वह सम्पूर्ण क्रियाओंको भगवान्की लीला समझता है; इस कारण ज्ञानी भक्तको न अमर्ष होता है, न उद्धेग होता है और न भय ही होता है--यह भाव दिखलानेके लिये ऐसा कहा गया है। ३. परमात्माको प्राप्त भक्तका किसी भी वस्तुसे किंचित् भी प्रयोजन नहीं रहता; अतएव उसे किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी इच्छा, स्पृहा अथवा वासना नहीं रहती। वह पूर्णकाम हो जाता है। यह भाव दिखलानेके लिये उसे आकांक्षासे रहित कहा है। ४. भगवानके भक्तमें पवित्रताकी पराकाष्ठा होती है। उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय, उसके आचरण और शरीर आदि इतने पवित्र हो जाते हैं कि उसके साथ वार्तालाप होनेपर तो कहना ही क्या है--उसके दर्शन और स्पर्शमात्रसे ही दूसरे लोग पवित्र हो जाते हैं। ऐसा भक्त जहाँ निवास करता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है और उसके संगसे वहाँका वायुमण्डल, जल, स्थल आदि सब पवित्र हो जाते हैं। ५. जिस उद्देश्यकी सफलताके लिये मनुष्यशरीरकी प्राप्ति हुई है, उस उद्देश्यको पूरा कर लेना ही यथार्थ चतुरता है। ६. शरीरमें रोग आदिका होना, स्त्री-पुत्र आदिका वियोग होना और धन-गृह आदिकी हानि होना--इत्यादि दुःखके हेतु तो प्रारब्धके अनुसार उसे प्राप्त होते हैं, परंतु इन सबके होते हुए भी उसके अन्त:करणमें किसी प्रकारका शोक नहीं होता। ७, संसारमें जो कुछ भी हो रहा है--सब भगवानकी लीला है, सब उनकी मायाशक्तिका खेल है; वे जिससे जब जैसा करवाना चाहते हैं, वैसा ही करवा लेते हैं। मनुष्य मिथ्या ही ऐसा अभिमान कर लेता है कि अमुक कर्म मैं करता हूँ, मेरी ऐसी सामर्थ्य है, इत्यादि। पर भगवान्का भक्त इस रहस्यको भलीभाँति समझ लेता है, इससे वह सदा भगवान्के हाथकी कठपुतली बना रहता है। भगवान् उसको जब जैसा नचाते हैं, वह प्रसन्नतापूर्वक वैसे ही नाचता है। अपना तनिक भी अभिमान नहीं रखता और अपनी ओरसे कुछ भी नहीं करता, इसलिये वह लोकदृष्टिमें सब कुछ करता हुआ भी वास्तवमें कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण 'सब आरम्भोंका त्यागी” ही है। ८. भक्तके लिये सर्वशक्तिमान्ू, सर्वाधार, परम दयालु भगवान् ही परम प्रिय वस्तु हैं और वह उन्हें सदाके लिये प्राप्त है। अतएव वह सदा-सर्वदा परमानन्दमें स्थित रहता है। संसारकी किसी वस्तुमें उसका किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष नहीं होता। इस कारण लोकदृष्टिसे होनेवाले किसी प्रिय वस्तुके संयोगसे या अप्रियके वियोगसे उसके अन्त:करणमें कभी किंचिन्मात्र भी हर्षका विकार नहीं होता। ९, भगवानका भक्त सम्पूर्ण जगत्को भगवानका स्वरूप समझता है, इसलिये उसका किसी भी वस्तु या प्राणीमें कभी किसी भी कारणसे द्वेष नहीं हो सकता। उसके अन्त:करणमें द्वेषभावका सदाके लिये सर्वथा अभाव हो जाता है। १०. अनिष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें और इष्टके वियोगमें प्राणियोंको शोक हुआ करता है। भगवद्धक्तको लीलामय परम दयालु परमेश्वरकी दयासे भरे हुए किसी भी विधानमें कभी प्रतिकूलता प्रतीत ही नहीं होती। अतः उसे शोक कैसे हो सकता है? ३. भक्तको साक्षात् भगवानकी प्राप्ति हो जानेके कारण वह सदाके लिये परमानन्द और परम शान्तिमें स्थित होकर पूर्णकाम हो जाता है, उसके मनमें कभी किसी वस्तुके अभावका अनुभव होता ही नहीं, इसलिये उसके अन्तःकरणमें सांसारिक वस्तुओंकी आकांक्षा होनेका कोई कारण ही नहीं रह जाता। २. यज्ञ, दान, तप और वर्णाश्रमके अनुसार जीविका तथा शरीर-निर्वाहके लिये किये जानेवाले शास्त्रविहित कर्मोंका वाचक यहाँ “शुभ” शब्द है और झूठ, कपट, चोरी, हिंसा, व्यभिचार आदि पापकर्मका वाचक “अशुभ” शब्द है। भगवानका ज्ञानी भक्त इन दोनों प्रकारके कर्मोंका त्यागी होता है; क्योंकि उसके शरीर, इन्द्रिय और मनके द्वारा किये जानेवाले समस्त शुभ कर्मोंको वह भगवान्के समर्पण कर देता है। उनमें उसकी किंचिन्मात्र भी ममता, आसक्ति या फलेच्छा नहीं रहती; इसीलिये ऐसे कर्म कर्म ही नहीं माने जाते (गीता ४।२०) और राग-द्वेषका अभाव हो जानेके कारण पापकर्म उसके द्वारा होते ही नहीं, इसलिये उसे 'शुभ और अशुभकर्मोंका त्यागी” कहा गया है। 3. संसारमें मनुष्यकी जो आसक्ति (स्नेह) है, वही समस्त अनर्थोंका मूल है; बाहरसे मनुष्य संसारका संसर्ग छोड़ भी दे, किंतु मनमें आसक्ति बनी रहे तो ऐसे त्यागसे विशेष लाभ नहीं हो सकता। पक्षान्तरमें मनकी आसक्ति नष्ट हो चुकनेपर बाहरसे राजा जनक आदिकी तरह सबसे ममता और आसक्तिरहित संसर्ग रहनेपर भी कोई हानि नहीं है। ऐसा आसक्तिका त्यागी ही वस्तुतः सच्चा 'संगविवर्जित' है। ४. यद्यपि भक्तकी दृष्टिमें उसका कोई शत्रु-मित्र नहीं होता, तो भी लोग अपनी-अपनी भावनाके अनुसार मूर्खतावश भक्तके द्वारा अपना अनिष्ट होता हुआ समझकर या उसका स्वभाव अपने अनुकूल न दीखनेके कारण अथवा ईर्ष्यावश उसमें शत्रुभावका भी आरोप कर लेते हैं, ऐसे ही दूसरे लोग अपनी भावनाके अनुसार उसमें मित्रभावका आरोप कर लेते हैं; परंतु सम्पूर्ण जगतमें सर्वत्र भगवानके दर्शन करनेवाले भक्तका सबमें समभाव ही रहता है। उसकी दृष्टिमें शत्रु-मित्रका किंचित् भी भेद नहीं रहता, वह तो सदा-सर्वदा सबके साथ परम प्रेमका ही व्यवहार करता रहता है। सबको भगवान्का स्वरूप समझकर समभावसे सबकी सेवा करना ही उसका स्वभाव बन जाता है। जैसे वृक्ष अपनेको काटनेवाले और जल सींचनेवाले दोनोंकी ही छाया, फल और फूल आदिके द्वारा सेवा करनेमें किसी प्रकारका भेद नहीं करता, वैसे ही भक्तमें भी किसी तरहका भेदभाव नहीं रहता। भक्तका समत्व वृक्षकी अपेक्षा भी अधिक महत्त्वका होता है। उसकी दृष्टिमें परमेश्वरसे भिन्न कुछ भी न रहनेके कारण उसमें भेदभावकी आशंका ही नहीं रहती। इसलिये उसे शत्रु-मित्रमें सम कहा गया है। ५. मान-अपमान, सरदी-गरमी, सुख-दुःख आदि अनुकूल और प्रतिकूल द्वद्धोंका मन, इन्द्रिय और शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे उनका अनुभव होते हुए भी भगवद्धक्तके अन्त:करणमें राग-द्वेष या हर्ष-शोक आदि किसी तरहका किंचिन्मात्र भी विकार नहीं होता। वह सदा सम रहता है। &. जो भक्त अपना सर्वस्व भगवान्के अर्पण कर चुके हैं, जिनके घर-द्वार, शरीर, विद्या-बुद्धि आदि सभी कुछ भगवानके हो चुके हैं--फिर वे चाहे ब्रह्मचारी हों या गृहस्थ, अथवा वानप्रस्थ हों, वे भी 'अनिकेत” ही हैं। जैसे शरीरमें अहंता, ममता और आसक्ति न होनेपर शरीर रहते हुए भी ज्ञानीको विदेह कहा जाता है--वैसे ही जिसकी घरमें ममता और आसक्ति नहीं है, वह घरमें रहते हुए भी बिना घरवाला--“अनिकेत' ही है। ७. भगवानके भक्तका अपने नाम और शरीरमें किंचिन्मात्र भी अभिमान या ममत्व नहीं रहता। इसलिये न तो उसको स्तुतिसे हर्ष होता है और न निन्दासे किसी प्रकारका शोक ही होता है। उसका दोनोंमें ही समभाव रहता है। सर्वत्र भगवदबुद्धि हो जानेके कारण स्तुति करनेवालों और निन्दा करनेवालोंमें भी उसकी जरा भी भेद-बुद्धि नहीं होती। यही उसका निन्दा-स्तुतिको समान समझना है। ८. मनुष्य केवल वाणीसे ही नहीं बोलता, मनसे भी बोलता रहता है। विषयोंका अनवरत चिन्तन ही मनका निरन्तर बोलना है। भक्तका चित्त भगवान्में इतना संलग्न हो जाता है कि उसमें भगवानके सिवा दूसरेकी स्मृति ही नहीं होती, वह सदा-सर्वदा भगवानके ही मननमें लगा रहता है; यही वास्तविक मौन है। बोलना बंद कर दिया जाय और मनसे विषयोंका चिन्तन होता रहे--ऐसा मौन बाह्य मौन है। मनको निर्विषय करने तथा वाणीको परिशुद्ध और संयत बनानेके उद्देश्यसे किया जानेवाला बाह्म मौन भी लाभदायक होता है; परंतु यहाँ भगवान्के प्रिय भक्तके लक्षणोंका वर्णन है, उसकी वाणी तो स्वाभाविक ही परिशुद्ध और संयत है। इससे ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसमें केवल वाणीका ही मौन है; बल्कि उस भक्तकी वाणीसे तो प्राय: निरन्तर भगवान्के नाम और गुणोंका कीर्तन ही हुआ करता है, जिससे जगत्का परम उपकार होता है। इसके सिवा भगवान् अपनी भक्तिका प्रचार भी भक्तोंद्वारा ही करवाया करते हैं। अतः वाणीसे मौन रहनेवाला भगवानका प्रिय भक्त होता है और बोलनेवाला नहीं होता, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। गीताके अठारहवें अध्यायके अड़सठवें और उनहत्तरवें श्लोकोंमें भगवानने गीताके प्रचार करनेवालेको अपना सबसे प्रिय कार्य करनेवाला कहा है, यह महत्कार्य वाणीके मौनीसे नहीं हो सकता। इसके सिवा गीताके सत्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें मानसिक तपके लक्षणोंमें भी 'मौन” शब्द आया है। यदि भगवान्को “मौन” शब्दका अर्थ वाणीका मौन अभीष्ट होता तो वे उसे वाणीके तपके प्रसंगमें कहते; परंतु ऐसा नहीं किया, इससे भी यही सिद्ध है कि मुनिभावका नाम ही मौन है और यह मुनिभाव जिसमें होता है, वह मौनी या मननशील है। वाणीका मौन मनुष्य हठसे भी कर सकता है, इसलिये यह कोई विशेष महत्त्वकी बात भी नहीं है। अतः यहाँ “मौन” शब्दका अर्थ वाणीका मौन न मानकर मनकी मननशीलता ही मानना उचित है। वाणीका संयम तो इसके अन्तर्गत आप ही आ जाता है। ३. भक्त अपने परम इष्ट भगवान्को पाकर सदा ही संतुष्ट रहता है। बाहरी वस्तुओंके आने-जानेसे उसकी तुष्टिमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं पड़ता। प्रारब्धानुसार सुख-दुःखादिके हेतुभूत जो कुछ भी पदार्थ उसे प्राप्त होते हैं, वह उन्हींमें संतुष्ट रहता है। २. भक्तको भगवानके प्रत्यक्ष दर्शन हो जानेके कारण उसके सम्पूर्ण संशय समूल नष्ट हो जाते हैं, उसका निश्चय अटल और निश्चल होता है। अत: वह साधारण मनुष्योंकी भाँति काम, क्रोध, लोभ, मोह या भय आदि विकारोंके वशमें होकर धर्मसे या भगवानके स्वरूपसे कभी विचलित नहीं होता। 3. उपर्युक्त सभी लक्षण भगवद्धक्तोंके हैं तथा सभी शास्त्रानुकूल और श्रेष्ठ हैं, परंतु स्वभाव आदिके भेदसे भक्तोंके भी गुण और आचरणोंमें थोड़ा-बहुत अन्तर रह जाना स्वाभाविक है। सबमें सभी लक्षण एक-से नहीं मिलते। इतना अवश्य है कि समता और शान्ति सभीमें होती हैं तथा राग-द्वेष और हर्ष-शोक आदि विकार किसीमें भी नहीं रहते। इसीलिये इन श्लोकोंमें पुनरक्ति पायी जाती है। विचार कर देखिये तो इन पाँचों विभागोंमें कहीं भावसे और कहीं शब्दोंसे राग-द्वेष और हर्ष'-शोकका अभाव सभीमें मिलता है। पहले विभागमें “अद्वेष्टा' से द्वेषका, “निर्मम: से रागका और 'समदुःखसुख:' से हर्ष'-शोकका अभाव बतलाया गया है। दूसरेमें हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगका अभाव बतलाया है; इससे राग-द्वेष और हर्ष-शोकका अभाव अपने-आप सिद्ध हो जाता है। तीसरेमें 'अनपेक्ष:” से रागका, “उदासीन:' से द्वेषका और “गतव्यथः' से हर्ष-शोकका अभाव बतलाया है। चौथेमें “न काड्क्षति” से रागका, “न द्वेष्टि' से द्वेषका, “न हृष्यति” तथा “न शोचति' से हर्ष'-शोकका अभाव बतलाया है। इसी प्रकार पाँचवें विभागमें “संगविवर्जित:” तथा “संतुष्ट: से राग-द्वेषका और 'शीतोष्णसुखदु:खेषु समः:” से हर्षशोकका अभाव दिखलाया है। “संतुष्ट: पद भी इस प्रकरणमें दो बार आया है। इससे सिद्ध है कि राग-द्वेष तथा हर्ष-शोकादि विकारोंका अभाव और समता तथा शान्ति तो सभीमें आवश्यक हैं। अन्यान्य लक्षणोंमें स्वभाव-भेदसे कुछ भेद भी रह सकता है। इसी भेदके कारण भगवानने भिन्न-भिन्न श्रेणियोंमें विभक्त करके भक्तोंके लक्षणोंकों यहाँ पाँच बार पृथक्ू-पृथक् बतलाया है; इनमेंसे किसी एक विभागके अनुसार भी सब लक्षण जिसमें पूर्ण हों, वही भगवानका प्रिय भक्त है। इसके सिवा कर्मयोग, भक्तियोग अथवा ज्ञानयोग आदि किसी भी मार्गसे परम सिद्धिको प्राप्त कर लेनेके पश्चात् भी उनकी वास्तविक स्थितिमें या प्राप्त किये हुए परम तत्त्वमें तो कोई अन्तर नहीं रहता; किंतु स्वभावकी भिन्नताके कारण आचरणोंमें कुछ भेद रह सकता है। “सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेज्ञानवानपि” (गीता ३।३३) इस कथनसे भी यही सिद्ध होता है कि सब ज्ञानवानोंके आचरण और स्वभावमें ज्ञानोत्तरकालमें भी भेद रहता है। अहंता, ममता और राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोध आदि अज्ञानजनित विकारोंका अभाव तथा समता और परम शान्ति--ये लक्षण तो सभीमें समानभावसे पाये जाते हैं; किंतु मैत्री और करुणा, ये भक्तिमार्गसे भगवान्को प्राप्त हुए महापुरुषमें विशेषरूपसे रहते हैं। संसार, शरीर और कर्मोंमें उपरामता--यह ज्ञानमार्गसे परम पदको प्राप्त महात्माओंमें विशेषरूपसे रहती है। इसी प्रकार मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए अनासक्तभावसे कर्मोमें तत्पर रहना, यह लक्षण विशेषरूपसे कर्मयोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषोंमें रहता है। गीताके दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे बहत्तरवें श"्लोकतक कितने ही श्लोकोंमें कर्मयोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके तथा चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक ज्ञानयोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त हुए गुणातीत पुरुषके लक्षण बतलाये गये हैं और यहाँ तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक भक्तियोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण हैं। ३. सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् भगवान्के अवतारोंमें, वचनोंमें एवं उनके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और चरित्रादिमें जो प्रत्यक्षेके सदृश सम्मानपूर्वक विश्वास रखता हो, वह श्रद्धावान् है। परम प्रेमी और परम दयालु भगवान्को ही परम गति, परम आश्रय एवं अपने प्राणोंके आधार, सर्वस्व मानकर उन्हींपर निर्भर और उनके किये हुए विधानमें प्रसन्न रहनेवालेको भगवत्परायण पुरुष कहते हैं। २. भगवद्धक्तोंके उपर्युक्त लक्षण ही वस्तुत: मानवधर्मका सच्चा स्वरूप है। इन्हींके पालनमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है, क्योंकि इनके पालनसे साधक सदाके लिये मृत्युके पंजेसे छूट जाता है और उसे अमृतस्वरूप भगवानकी प्राप्ति हो जाती है। इसी भावको स्पष्ट समझानेके लिये यहाँ इस लक्षण-समुदायका नाम “धर्ममय अमृत” रखा गया है। 3. जिन सिद्ध भक्तोंको भगवानकी प्राप्ति हो चुकी है, उनमें तो उपर्युक्त लक्षण स्वाभाविक ही रहते हैं; इसलिये उनमें इन गुणोंका होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है; परंतु जिन साधक भक्तोंको भगवानके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हुए हैं, तो भी वे भगवानपर विश्वास करके परम श्रद्धाके साथ तन, मन, धन, सर्वस्व भगवानके अर्पण करके उन्हींके परायण हो जाते हैं तथा भगवानके दर्शनोंके लिये निरन्तर उन्हींका निष्कामभावसे प्रेमपूर्वक चिन्तन करते रहते हैं और सतत चेष्टा करके उपर्युक्त लक्षणोंके अनुसार ही अपना जीवन बिताना चाहते हैं--बिना प्रत्यक्ष दर्शन हुए भी केवल विश्वासपर उनका इतना निर्भर हो जाना विशेष महत्त्वकी बात है। ऐसे प्रेमी भक्तोंको सिद्ध भक्तोंकी अपेक्षा भी 'अतिशय प्रिय” कहना उचित ही है। सप्तत्रिशोड्ध्याय: (श्रीमद्धगवद्गीतायां त्रयोदशो< ध्याय:) ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ष और प्रकृति-पुरुषका वर्णन सम्बन्ध--गीताके बारहवें अध्यायके आरम्भगें अजुनने सगुण और निर्गुणके उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें प्रश्न किया था; उसका उत्तर देते हुए भगवान्ने दूसरे *लोकमें संक्षेपमें सगुण उपासकोंकी श्रेष्ताका प्रतिपादन करके तीसरेसे पाँचवें श*लोकतक निर्गुण उपासनाका स्वरूप, उसका फल और देहाभिगानियोंके लिये उसके अनुष्ठानमें कठिनताका निरूपण किया। तदनन्तर छठेसे बीसवें *लोकतक सगुण उपासनाका गहत्त्व, फल; प्रकार और भगवद्धक्तोंके लक्षणोंका वर्णन करते-करते ही अध्यायकी समाप्ति हो गयी; निर्गुणका तत्व. महिमा और उसकी प्राप्तिके साधनोंको विस्तारपूर्वक नहीं समझाया गया। अतएव निर्गुण-नियाकारका तत्त्व अर्थात् ज्ञानयोगका विषय भलीभाँति समझानेके लिये तेरहवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले भगवान क्षेत्र (शरीर) तथा क्षेत्रज्ञ (आत्मा)- के लक्षण बतलाते हैं-- श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद् यो वेत्ति त॑ प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद:,श्रीभगवान् बोले--हे अर्जुन! यह शरीर “क्षेत्र'* इस नामसे कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको कक्षेत्रज्ञ* इस नामसे उनके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन कहते हैं
The Blessed Lord said: “O son of Kuntī, this body is called the ‘field’ (kṣetra). One who knows this field—the conscious knower within—is called the ‘knower of the field’ (kṣetrajña), say those who truly understand reality.”
Verse 2
१५) “जो गौओंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालनेमें झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें जल छिड़कते समय और झाड़ू देने आदि कर्मोंको करते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णका गान किया करती हैं--इस प्रकार सदा श्रीकृष्णमें ही चित्त लगाये रखनेवाली वे व्रजवासिनी गोपियाँ धन्य हैं।' ३. जिसका निर्देश नहीं किया जा सकता हो--किसी भी युक्ति या उपमासे जिसका स्वरूप समझाया या बतलाया नहीं जा सकता हो, उसे “अनिर्देश्य” कहते हैं। २. जो किसी भी इन्द्रियका विषय न हो अर्थात् जो इन्द्रियोंद्वारा जाननेमें न आ सके, जिसका कोई रूप या आकृति न हो, उसे “अव्यक्त' कहते हैं। 3. जो हलन-चलनकी क्रियासे सर्वथा रहित हो, उसे “अचल” कहते हैं। ४. जो नित्य और निश्चित हो--जिसकी सत्तामें किसी प्रकारका संशय न हो और जिसका कभी अभाव न हो, उसे “ध्रुव” कहते हैं। ५. इससे यह भाव दिखलाया है कि उपर्युक्त प्रकारसे निर्गुण-निराकार ब्रह्मकी उपासना करनेवालोंकी कहीं भेदबुद्धि नहीं रहती। समस्त जगतमें एक ब्रह्मसे भिन्न किसीकी सत्ता न रहनेके कारण उनकी सब जगह समबुद्धि हो जाती है। ६. जिस प्रकार अविवेकी मनुष्य अपने हितमें रत रहता है, उसी प्रकार उन निर्मुण-उपासकोंका सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मभाव हो जानेके कारण वे समानभावसे सबके हितमें रत रहते हैं। ७. इस कथनसे भगवानने ब्रह्मको अपनेसे अभिन्न बतलाते हुए यह कहा है कि उपर्युक्त उपासनाका फल जो निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति है, वह मेरी ही प्राप्ति है; क्योंकि ब्रह्म मुझसे भिन्न नहीं है और मैं ब्रह्मसे भिन्न नहीं हूँ। वह ब्रह्म मैं ही हूँ, यही भाव भगवानूने गीताके चौदहवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें “ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्' अर्थात् मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ---इस कथनसे दिखलाया है। ८. पूर्व श्लोकोंमें जिन निर्गुण-उपासकोंका वर्णन है, उन निर्गुण-निराकार सचिदानन्दघन ब्रह्ममें आसक्त चित्तवाले पुरुषोंको परिश्रम विशेष है, यह कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि निर्गुण ब्रह्मका तत्त्व बड़ा ही गहन है; जिसकी बुद्धि शुद्ध, स्थिर और सूक्ष्म होती है, जिसका शरीरमें अभिमान नहीं होता, वही उसे समझ सकता है; साधारण मनुष्योंकी समझमें यह नहीं आता। इसलिये निर्गमुण-उपासनाके साधनके आरम्भकालमें परिश्रम अधिक होता है। ९. उपर्युक्त कथनसे भगवानने पूर्वार्द्धमें बतलाये हुए परिश्रमका हेतु दिखलाया है। अभिप्राय यह है कि देहमें अभिमान रहते निर्गुण ब्रह्मका तत्त्व समझमें आना बहुत कठिन है। इसलिये जिनका शरीरमें अभिमान है, उनको वैसी स्थिति बड़े परिश्रमसे प्राप्त होती है। किंतु जो गीताके छठे अध्यायके चौबीसवेंसे सत्ताईसवें श्लोकतक निर्मुण-उपासनाका प्रकार बतलाकर अद्बाईसवें श्लोकमें उस प्रकारका साधन करते-करते सुखपूर्वक परमात्मप्राप्तिरूप अत्यन्तानन्दका लाभ होना बतलाया है, वह कथन जिसके समस्त पाप तथा रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गये हैं, जो 'ब्रह्मभूत” हो गया है अर्थात् जो ब्रह्ममें अभिन्न भावसे स्थित हो गया है--ऐसे पुरुषके लिये है, देहाभिमानियोंके लिये नहीं। ३०. भाँति-भाँतिके दु:खोंकी प्राप्ति होनेपर भी भक्त प्रह्नमादकी भाँति भगवानपर निर्भर और निर्विकार रहना, उन दुःखोंको भगवान्का भेजा हुआ पुरस्कार समझकर सुखरूप ही समझना तथा भगवान्को ही परम प्रेमी, परम गति, परम सुहृद् और सब प्रकारसे शरण लेनेयोग्य समझकर अपने-आपको भगवान्के समर्पण कर देना--यही भगवान्के परायण होना है। ३. कर्मोंके करनेमें अपनेको पराधीन समझकर भगवान्की आज्ञा और संकेतके अनुसार समस्त शास्त्रानुकूल कर्म करते रहना; उन कर्मोंमें न तो ममता और आसक्ति रखना और न उनके फलसे किसी प्रकारका सम्बन्ध रखना; प्रत्येक क्रियामें ऐसा ही भाव रखना कि मैं तो केवल निमित्तमात्र हूँ, मेरी कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं है, भगवान् ही अपने इच्छानुसार मुझसे कठपुतलीकी भाँति समस्त कर्म करवा रहे हैं--यही समस्त कर्मोंका भगवान्के समर्पण करना है। २. एक परमेश्वरके सिवा मेरा कोई नहीं है, वे ही मेरे सर्वस्व हैं--ऐसा समझकर जो भगवानूमें स्वार्थरहित तथा अत्यन्त श्रद्धासे युक्त अनन्यप्रेम करना है--जिस प्रेममें स्वार्थ, अभिमान और व्यभिचारका जरा भी दोष नहीं है; जो सर्वथा पूर्ण और अटल है; जिसका किंचित् अंश भी भगवानसे भिन्न वस्तुमें नहीं है और जिसके कारण क्षणमात्रकी भी भगवान्की विस्मृति असह्य हो जाती है--उस अनन्य प्रेमको “अनन्यभक्तियोग” कहते हैं और ऐसे भक्तियोगद्वारा निरन्तर भगवान्का चिन्तन करते हुए जो उनके गुण, प्रभाव और लीलाओंका श्रवण, कीर्तन, उनके नामोंका उच्चारण और जप आदि करना है--यही अनन्यभक्तियोगके द्वारा भगवान्का निरन्तर चिन्तन करते हुए उनको भजना है। ३. इस संसारमें सभी कुछ मृत्युमय है; इसमें पैदा होनेवाली एक भी चीज ऐसी नहीं है, जो कभी क्षणभरके लिये भी मृत्युके आक्रमणसे बचती हो। जैसे समुद्रमें असंख्य लहरें उठती रहती हैं, वैसे ही इस अपार संसार-सागरमें अनवरत जन्म-मृत्युरूपी तरंगे उठा करती हैं। समुद्रकी लहरोंकी गणना चाहे हो जाय; पर जबतक परमेश्वरकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक भविष्यमें जीवको कितनी बार जन्मना और मरना पड़ेगा--इसकी गणना नहीं हो सकती। इसीलिये इसको मृत्युरूप संसारसागर' कहते हैं। जो भक्त मन-बुद्धिको भगवानमें लगाकर निरन्तर भगवान्की उपासना करते हैं, उनको भगवान् तत्काल ही जन्म- मृत्युसे सदाके लिये छुड़ाकर अपनी प्राप्ति यहीं करा देते हैं अथवा मरनेके बाद अपने परमधाममें ले जाते हैं--अर्थात् जैसे केवट किसीको नौकामें बैठाकर नदीसे पार कर देता है, वैसे ही भक्तिरूपी नौकापर स्थित भक्तके लिये भगवान् स्वयं केवट बनकर, उसकी समस्त कठिनाइयों और विपत्तियोंकों दूर करके बहुत शीघ्र उसे भीषण संसार-समुद्रके उस पार अपने परमधाममें ले जाते हैं। यही भगवान्का अपने उपर्युक्त भक्तको मृत्युरूप संसारसे पार कर देना है। ४. जो सम्पूर्ण चराचर संसारको व्याप्त करके सबके हृदयमें स्थित हैं और जो दयालुता, सर्वज्ञता, सुशीलता तथा सुहृदता आदि अनन्त गुणोंके समुद्र हैं, उन परम दिव्य, प्रेममय और आनन्दमय, सर्वशक्तिमान्, सर्वोत्तम, शरण लेनेके योग्य परमेश्वरके गुण, प्रभाव और लीलाके तत्त्व तथा रहस्यको भलीभाँति समझकर उनका सदा-सर्वदा और सर्वत्र अटल निश्चय रखना--यही बुद्धिको भगवानमें लगाना है तथा इस प्रकार अपने परम प्रेमास्पद पुरुषोत्तम भगवान्के अतिरिक्त अन्य समस्त विषयोंसे आसक्तिको सर्वथा हटाकर मनको केवल उन्हींमें तन्मय कर देना और नित्य-निरन्तर उपर्युक्त प्रकारसे उनका चिन्तन करते रहना--यही मनको भगवान्में लगाना है। इस प्रकार जो अपने मन-बुद्धिको भगवान्में लगा देता है, वह शीघ्र ही भगवानको प्राप्त हो जाता है। इसलिये भगवानके गुण, प्रभाव और लीलाके तत्त्व और रहस्यको जाननेवाले महापुरुषोंका संग, उनके गुण और आचरणोंका अनुकरण तथा भोग, आलस्य और प्रमादको छोड़कर उनके बतलाये हुए मार्गका विश्वासपूर्वक तत्परताके साथ अनुसरण करना चाहिये। ३. भगवानकी प्राप्तिके लिये भगवानमें नाना प्रकारकी युक्तियोंसे चित्तको स्थापन करनेका जो बार-बार प्रयत्न किया जाता है, उसे 'अभ्यासयोग” कहते हैं। अत: भगवानके जिस नाम, रूप, गुण और लीला आदिमें साधककी श्रद्धा और प्रेम हो, उसीमें केवल भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे ही बार-बार मन लगानेके लिये प्रयत्न करना अभ्यासयोगके द्वारा भगवान्को प्राप्त करनेकी इच्छा करना है। भगवानमें मन लगानेके साधन शास्त्रोंमें अनेकों प्रकारके बतलाये गये हैं, उनमेंसे निम्नलिखित कतिपय साधन सर्वसाधारणके लिये विशेष उपयोगी प्रतीत होते हैं-- (१) सूर्यके सामने आँखें मूँदनेपर मनके द्वारा सर्वत्र समभावसे जो एक प्रकाशका पुंज प्रतीत होता है, उससे भी हजारों गुना अधिक प्रकाशका पुंज भगवत्स्वरूपमें है--इस प्रकार मनसे निश्चय करके परमात्माके उस तेजोमय ज्योतिःस्वरूपमें चित्त लगानेके लिये बार-बार चेष्टा करना। (२) जैसे दियासलाईमें अग्नि व्यापक है, वैसे ही भगवान् सर्वत्र व्यापक हैं--यह समझकर जहाँ-जहाँ मन जाय वहाँ- वहाँ ही गुण और प्रभावसहित सर्वशक्तिमान् परम प्रेमास्पद परमेश्वरके स्वरूपका प्रेमपूर्वक पुनः-पुनः चिन्तन करते रहना। (३) जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँसे उसे हटाकर भगवान् विष्णु, शिव, राम और कृष्ण आदि जो भी अपने इष्टदेव हों, उनकी मानसिक या धातु आदिसे निर्मित मूर्तिमें अथवा चित्रपटमें या उनके नाम-जपमें श्रद्धा और प्रेमके साथ पुनः- पुन: मन लगानेका प्रयत्न करना। (४) भ्रमरके गुंजारकी तरह एकतार ओंकारकी ध्वनि करते हुए उस ध्वनिमें परमेश्वरके स्वरूपका पुन:-पुन: चिन्तन करना। (५) स्वाभाविक श्वास-प्रश्नासके साथ-साथ भगवानके नामका जप नित्य-निरन्तर होता रहे--इसके लिये प्रयत्न करना। (६) परमात्माके नाम, रूप, गुण, चरित्र और प्रभावके रहस्यको जाननेके लिये तद्विषयक शास्त्रोंका पुन:-पुनः अभ्यास करना। (७) गीताके चौथे अध्यायके उनतीसवें श्लोकके अनुसार प्राणायामका अभ्यास करना। इनमेंसे कोई-सा भी अभ्यास यदि श्रद्धा और विश्वास तथा लगनके साथ किया जाय तो क्रमश: सम्पूर्ण पापों और विघ्नोंका नाश होकर अन्तमें भगवत्प्राप्ति हो जाती है। इसलिये बड़े उत्साह और तत्परताके साथ अभ्यास करना चाहिये। साधकोंकी स्थिति, अधिकार तथा साधनकी गतिके तारतम्यसे फलकी प्राप्तिमें देर-सबेर हो सकती है। अतएव शीघ्र फल न मिले तो कठिन समझकर, ऊबकर या आलस्यके वश होकर न तो अपने अभ्यासको छोड़ना ही चाहिये और न उसमें किसी प्रकार कमी ही आने देनी चाहिये; बल्कि उसे बढ़ाते रहना चाहिये। २. इस श्लोकमें कहे हुए “मत्कर्म” शब्दसे उन कर्मोंको समझना चाहिये जो केवल भगवानके लिये ही होते हैं या भगवत्सेवा-पूजाविषयक होते हैं तथा जिन कर्मोंमें अपना जरा भी स्वार्थ, ममत्व और आसक्ति आदिका सम्बन्ध नहीं होता। गीताके ग्यारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भी “मत्कर्मकृत्” पदमें “मत्कर्म' शब्द आया है, वहाँ भी इसकी व्याख्या की गयी है। एकमात्र भगवानको ही अपना परम आश्रय और परम गति मानना और केवल उन्हींकी प्रसन्नताके लिये परम श्रद्धा और अनन्य-प्रेमके साथ मन, वाणी और शरीरसे उनकी सेवा-पूजा आदि तथा यज्ञ, दान और तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंको अपना कर्तव्य समझकर निरन्तर करते रहना--यही उन कर्मोंके परायण होना है। 3. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस प्रकार कर्मोंका करना भी मेरी प्राप्तिका एक स्वतन्त्र और सुगम साधन है। जैसे भजन-ध्यानरूपी साधन करनेवालोंको मेरी प्राप्ति होती है, वैसे ही मेरे लिये कर्म करनेवालोंको भी मैं प्राप्त हो सकता हूँ। अतएव मेरे लिये कर्म करना पूर्वोक्त साधनोंकी अपेक्षा किसी अंशमें भी निम्न श्रेणीका साधन नहीं है। ३. इस अध्यायके नवें श्लोकमें 'अभ्यासयोग” बतलाया गया है और भगवानमें मन-बुद्धि लगानेके लिये जितने भी साधन हैं, सभी अभ्यासयोगके अन्तर्गत आ जाते हैं--इस कारण वहाँ “यतात्मवान” होनेके लिये अलग कहनेकी आवश्यकता नहीं है और दसवें श्लोकमें भक्तियुक्त कर्मयोगका वर्णन है, उसमें भगवान्का आश्रय है और साधकके समस्त कर्म भी भगवदर्थ ही होते हैं; अतएव उसमें भी “यतात्मवान्' होनेके लिये अलग कहना प्रयोजनीय नहीं है, परंतु इस श्लोकमें जो *सर्वकर्मफलत्याग” रूप कर्मयोगका साधन बतलाया गया है, इसमें मन-बुद्धिको वशमें रखे बिना काम नहीं चल सकता; क्योंकि वर्णाश्रमोचित समस्त व्यावहारिक कर्म करते हुए यदि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और शरीर आदि वशमें न हों तो उनकी भोगोंमें ममता, आसक्ति और कामना हो जाना बहुत ही सहज है और ऐसा होनेपर 'सर्वकर्मफलत्याग” रूप साधन बन नहीं सकता। इसीलिये यहाँ “यतात्मवान्” पदका प्रयोग करके मन-बुद्धि आदिको वशमें रखनेके लिये विशेष सावधान किया गया है। २. यज्ञ, दान, तप, सेवा और वर्णाश्रमानुसार जीविका तथा शरीरनिर्वाहके लिये किये जानेवाले शास्त्रसम्मत सभी कर्मोंको यथायोग्य करते हुए, इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिरूप जो उनका फल है, उसमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग कर देना ही 'सब कर्मोंका फलत्याग करना है। इस अध्यायके छठे श्लोकके कथनानुसार समस्त कर्मोंको भगवानमें अर्पण करना, दसवें श्लोकके कथनानुसार भगवान्के लिये भगवानके कर्मोंको करना तथा इस श्लोकके कथनानुसार समस्त कर्मोंके फलका त्याग करना--ये तीनों ही 'कर्मयोग' हैं और तीनोंका ही फल परमेश्वरकी प्राप्ति है, अतएव फलमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। केवल साधकोंकी प्रकृति, भावना और उनके साधनकी प्रणालीके भेदसे इनका भेद किया गया है। समस्त कर्मोंको भगवान्में अर्पण करना और भगवानके लिये समस्त कर्म करना--इन दोनोंमें तो भक्तिकी प्रधानता है; 'सर्वकर्मफलत्याग” में केवल फलत्यागकी प्रधानता है। यही इनका मुख्य भेद है। सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण कर देनेवाला पुरुष समझता है कि मैं भगवान्के हाथकी कठपुतली हूँ, मुझमें कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं है, मेरे मन, बुद्धि और इन्द्रियादि जो कुछ हैं--सब भगवानके हैं और भगवान् ही इनसे अपने इच्छानुसार समस्त कर्म करवाते हैं, उन कर्मोंसे और उनके फलसे मेरा कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकारके भावसे उस साधकका कर्मोंमें और उनके फलनमें किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष नहीं रहता; उसे प्रारब्धानुसार जो कुछ भी सुख-दु:खोंके भोग प्राप्त होते हैं, उन सबको वह भगवान्का प्रसाद समझकर सदा ही प्रसन्न रहता है। अतएव उसका सबमें समभाव होकर उसे शीघ्र ही भगवानकी प्राप्ति हो जाती है। भगवदर्थ कर्म करनेवाला मनुष्य पूर्वोक्त साधककी भाँति यह नहीं समझता कि “मैं कुछ नहीं करता हूँ और भगवान् ही मुझसे सब कुछ करवा लेते हैं।! वह यह समझता है कि भगवान् मेरे परम पूज्य, परम प्रेमी और परम सुहृद् हैं; उनकी सेवा करना और उनकी आज्ञाका पालन करना ही मेरा परम कर्तव्य है। अतएव वह भगवान्को समस्त जगत्में व्याप्त समझकर उनकी सेवाके उद्देश्यसे शास्त्रद्वारा प्राप्त उनकी आज्ञाके अनुसार यज्ञ, दान और तप, वर्णाश्रमके अनुकूल आजीविका और शरीरनिर्वाहके तथा भगवानकी पूजा-सेवादिके कर्मोंमें लगा रहता है। उसकी प्रत्येक क्रिया भगवान्के आज्ञानुसार और भगवान्की ही सेवाके उद्देश्यसे होती है (गीता ११।५५), अत: उन समस्त क्रियाओं और उनके फलोंमें उसकी आसक्ति और कामनाका अभाव होकर उसे शीघ्र ही भगवानकी प्राप्ति हो जाती है। केवल 'सब कर्मोंके फलका त्याग” करनेवाला पुरुष न तो यह समझता है कि मुझसे भगवान् कर्म करवाते हैं और न यही समझता है कि मैं भगवान्के लिये समस्त कर्म करता हूँ। वह यह समझता है कि कर्म करनेमें ही मनुष्यका अधिकार है, उसके फलमें नहीं (गीता २।४७ से ५१ तक), अतः किसी प्रकारका फल न चाहकर यज्ञ, दान, तप, सेवा तथा वर्णाश्रमके अनुसार जीविका और शरीरनिर्वाहके खान-पान आदि समस्त शास्त्रविहित कर्मोंको करना ही मेरा कर्तव्य है। अतएव वह समस्त कर्मोके फलरूप इस लोक और परलोकके भोगोंमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग कर देता है; इससे उसमें राग-द्वेषका सर्वथा अभाव होकर उसे शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार तीनोंके ही साधनका भगवत्प्राप्तिरूप एक फल होनेपर भी साधकोंकी मान्यता, स्वभाव और साधनप्रणालीमें भेद होनेके कारण तीन तरहके साधन अलग-अलग बतलाये गये हैं। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि झूठ, कपट, व्यभिचार, हिंसा और चोरी आदि निषिद्ध कर्म 'सर्वकर्म” में सम्मिलित नहीं हैं। भोगोंमें आसक्ति और उनकी कामना होनेके कारण ही ऐसे पापकर्म होते हैं और उनके फलस्वरूप मनुष्यका सब तरहसे पतन हो जाता है। इसीलिये उनका स्वरूपसे ही सर्वथा त्याग कर देना बतलाया गया है और जब वैसे कर्मोंका ही सर्वथा निषेध है, तब उनके फलत्यागका तो प्रसंग ही कैसे आ सकता है! भगवानने पहले मन-बुद्धिको अपनेमें लगानेके लिये कहा, फिर अभ्यासयोग बतलाया, तदनन्तर मदर्थ कर्मके लिये कहा और अन्तमें सर्वकर्मफलत्यागके लिये आज्ञा दी और एकमें असमर्थ होनेपर दूसरेका आचरण करनेके लिये कहा; भगवान्का इस प्रकारका यह कथन न तो फलभेदकी दृष्टिसे है, क्योंकि सभीका एक ही फल भगवत्प्राप्ति है और न एक की अपेक्षा दूसरेको सुगम ही बतलानेके लिये है, क्योंकि उपर्युक्त साधन एक-दूसरेकी अपेक्षा उत्तरोत्तर सुगम नहीं हैं। जो साधन एकके लिये सुगम है, वही दूसरेके लिये कठिन हो सकता है। इस विचारसे यह समझमें आता है कि इन चारों साधनोंका वर्णन केवल अधिकारिभेदसे ही किया गया है। जिस पुरुषमें सगुण भगवानके प्रेमकी प्रधानता है, जिसकी भगवानमें स्वाभाविक श्रद्धा है, उनके गुण, प्रभाव और रहस्यकी बातें तथा उनकी लीलाका वर्णन जिसको स्वभावसे ही प्रिय लगता है--ऐसे पुरुषके लिये इस अध्यायके आठवें श्लोकमें बतलाया हुआ साधन सुगम और उपयोगी है। जिस पुरुषका भगवानूमें स्वाभाविक प्रेम तो नहीं है, किंतु श्रद्धा होनेके कारण जो हठपूर्वक साधन करके भगवानमें मन लगाना चाहता है--ऐसी प्रकृतिवाले पुरुषके लिये इस अध्यायके नवें श्लोकमें बतलाया हुआ साधन सुगम और उपयोगी है। जिस पुरुषकी सगुण परमेश्वरमें श्रद्धा है तथा यज्ञ, दान, तप आदि कर्मोमें जिसका स्वाभाविक प्रेम है और भगवान्की प्रतिमादिकी सेवा-पूजा करनेमें जिसकी श्रद्धा है--ऐसे पुरुषके लिये इस अध्यायके दसवें श्लोकमें बतलाया हुआ साधन सुगम और उपयोगी है। जिस पुरुषका सगुण-साकार भगवानूमें स्वाभाविक प्रेम और श्रद्धा नहीं है, जो ईश्वरके स्वरूपको केवल सर्वव्यापी निराकार मानता है, व्यावहारिक और लोकहितके कर्म करनेमें ही जिसका स्वाभाविक प्रेम है--ऐसे पुरुषके लिये इस श्लोकमें बतलाया हुआ साधन सुगम और उपयोगी है। ३. यहाँ “अभ्यास” शब्द इसी अध्यायके नवें श्लोकमें बतलाये हुए अभ्यासयोगमेंसे केवल अभ्यासमात्रका वाचक है अर्थात् सकामभावसे प्राणायाम, मनोनिग्रह, स्तोत्र-पाठ, वेदाध्ययन, भगवन्नाम-जप आदिके लिये बार-बार की जानेवाली ऐसी चेष्टाओंका नाम यहाँ “अभ्यास' है, जिनमें न तो विवेकज्ञान है, न ध्यान है और न कर्म-फलका त्याग ही है। अभिप्राय यह है कि नवें श्लोकमें जो योग यानी निष्कामभाव और विवेकज्ञानका फल भगवत्प्राप्तिकी इच्छा है, वह इसमें नहीं है; क्योंकि ये दोनों जिसके अन्तर्गत हों, ऐसे अभ्यासके साथ ज्ञानकी तुलना करना और उसकी अपेक्षा अभ्यासरहित ज्ञानको श्रेष्ठ बतलाना नहीं बन सकता। इसी प्रकार यहाँ 'ज्ञान' शब्द भी सत्संग और शास्त्रसे उत्पन्न उस विवेकज्ञानका वाचक है, जिसके द्वारा मनुष्य आत्मा और परमात्माके स्वरूपको तथा भगवानके गुण, प्रभाव, लीला आदिको समझता है एवं संसार और भोगोंकी अनित्यता आदि अन्य आध्यात्मिक बातोंको ही समझता है; परंतु जिसके साथ न तो अभ्यास है, न ध्यान है और न कर्मफलकी इच्छाका त्याग ही है; क्योंकि ये सब जिसके अन्तर्गत हों, उस ज्ञानके साथ अभ्यास, ध्यान और कर्मफलके त्यागका तुलनात्मक विवेचन करना और उसकी अपेक्षा ध्यानको तथा कर्मफलके त्यागको श्रेष्ठ बतलाना नहीं बन सकता। उपर्युक्त अभ्यास और ज्ञान दोनों ही अपने-अपने स्थानपर भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं; श्रद्धा-भक्ति और निष्कामभावके सम्बन्धसे दोनोंके द्वारा ही मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकता है, तथापि दोनोंकी परस्पर तुलना की जानेपर अभ्यासकी अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है। विवेकहीन अभ्यास भगवत्प्राप्तिमें उतना सहायक नहीं हो सकता, जितना कि अभ्यासहीन विवेकज्ञान सहायक हो सकता है; क्योंकि वह भगवत्प्राप्तिकी इच्छाका हेतु है। यही बात दिखलानेके लिये यहाँ अभ्यासकी अपेक्षा ज्ञानको श्रेष्ठ बतलाया है। ३. यहाँ “ध्यान” शब्द भी छठेसे आठवें श्लोकतक बतलाये हुए ध्यानयोगमेंसे केवल ध्यानमात्रका वाचक है अर्थात् उपास्यदेव मानकर भगवान्के साकार या निराकार किसी भी स्वरूपमें सकामभावसे केवल मन-बुद्धिको स्थिर कर देनेको यहाँ 'ध्यान' कहा गया है। इसमें न तो पूर्वोक्त विवेकज्ञान है और न भोगोंकी कामनाका त्यागरूप निष्कामभाव ही है। अभिप्राय यह है कि उस ध्यानयोगमें जो समस्त कर्मोंका भगवान्के समर्पण कर देना, भगवान्को ही परम प्राप्पय समझना और अनन्य प्रेमसे भगवान्का ध्यान करना--ये सब भाव भी सम्मिलित हैं, वे इसमें नहीं हैं; क्योंकि भगवान्को सर्वश्रेष्ठ समझकर अनन्य प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे किया जानेवाला जो ध्यानयोग है, उसमें विवेकज्ञान और कर्मफलके त्यागका अन्तर्भाव है। अतः उसके साथ विवेकज्ञानकी तुलना करना और उसकी अपेक्षा कर्मफलके त्यागको श्रेष्ठ बतलाना नहीं बन सकता। उपर्युक्त विवेकज्ञान और ध्यान--दोनों ही श्रद्धा-प्रेम और निष्कामभावके सम्बन्धसे परमात्माकी प्राप्ति करा देनेवाले हैं, इसलिये दोनों ही भगवान्की प्राप्तिमें सहायक हैं; परंतु दोनोंकी परस्पर तुलना करनेपर ध्यान और अभ्याससे रहित ज्ञानकी अपेक्षा विवेकरहित ज्ञान ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है; क्योंकि बिना ध्यान और अभ्यासके केवल विवेकज्ञान भगवान्की प्राप्तिमें उतना सहायक नहीं हो सकता; जितना बिना विवेकज्ञानके केवल ध्यान हो सकता है। ध्यानद्वारा चित्त स्थिर होनेपर चित्तकी मलिनता और चंचलताका नाश होता है; परंतु केवल जानकारीसे वैसा नहीं होता। यही भाव दिखलानेके लिये ज्ञानसे ध्यानको श्रेष्ठ बतलाया गया है। २. ग्यारहवें श्लोकमें जो 'सर्वकर्मफलत्याग” का स्वरूप बतलाया गया है, उसीका वाचक “कर्मफलत्याग” है। ऊपर बतलाया हुआ ध्यान भी परमात्माकी प्राप्तिमें सहायक है; परंतु जबतक मनुष्यकी कामना और आसक्तिका नाश नहीं हो जाता, तबतक उसे परमात्माकी प्राप्ति सहज ही नहीं हो सकती। अत: फलासक्तिके त्यागसे रहित ध्यान परमात्माकी प्राप्तिमें उतना लाभप्रद नहीं हो सकता, जितना कि बिना ध्यानके भी समस्त कर्मोमें फल और आसक्तिका त्याग हो सकता है। ३. इस श्लोकमें अभ्यासयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और कर्मयोगका तुलनात्मक विवेचन नहीं है; क्योंकि उन सभी साधनोंमें कर्मफलरूप भोगोंकी आसक्तिका त्यागरूप निष्कामभाव अन्तर्गत है। अत: उनका तुलनात्मक विवेचन नहीं हो सकता। यहाँ तो कर्मफलके त्यागका महत्त्व दिखलानेके लिये अभ्यास, ज्ञान और ध्यानरूप साधन, जो संसारके झंझटोंसे अलग रहकर किये जाते हैं और क्रियाकी दृष्टिसे एककी अपेक्षा दूसरा क्रमसे साक््विक और निवृत्तिपरक होनेके नाते श्रेष्ठ भी हैं, उनकी अपेक्षा कर्मफलके त्यागको भावकी प्रधानताके कारण श्रेष्ठ बतलाया गया है। अभिप्राय यह है कि आध्यात्मिक उन्नतिमें क्रियाकी अपेक्षा भावका ही अधिक महत्त्व है। वर्ण-आश्रमके अनुसार यज्ञ, दान, युद्ध, वाणिज्य, सेवा आदि तथा शरीर-निर्वाहकी क्रिया; प्राणायाम, स्तोत्र-पाठ, वेद-पाठ, नाम-जप आदि अभ्यासकी क्रिया; सत्संग और शास्त्रोंके द्वारा आध्यात्मिक बातोंको जाननेके लिये ज्ञानविषयक क्रिया और मनको स्थिर करनेके लिये ध्यानविषयक क्रिया--ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होनेपर भी उनमेंसे वही श्रेष्ठ है, जिसके साथ कर्मफलका त्यागरूप निष्कामभाव है; क्योंकि निष्कामभावसे परमात्माकी प्राप्ति होती है, अत: कर्मफलका त्याग ही श्रेष्ठ है; फिर चाहे वह किसी भी शास्त्रसम्मत क्रियाके साथ क्यों न रहे, वही क्रिया दीखनेमें साधारण होनेपर भी सर्वश्रेष्ठ हो जाती है। १. भक्तिके साधकमें आरम्भसे ही मैत्री और दयाके भाव विशेषरूपसे रहते हैं, इसलिये सिद्धावस्थामें भी उसके स्वभाव और व्यवहारमें वे सहज ही पाये जाते हैं। जैसे भगवानमें हेतुरहित अपार दया और प्रेम आदि रहते हैं, वैसे ही उनके सिद्ध भक्तमें भी इनका रहना उचित ही है। २. यहाँ “सुख-दुःख' हर्ष-शोकके हेतुओंके वाचक हैं न कि हर्ष-शोकके; क्योंकि सुख-दुःखसे उत्पन्न होनेवाले विकारोंका नाम हर्ष-शोक है। अज्ञानी मनुष्योंकी सुखमें आसक्ति होती है, इस कारण सुखकी प्राप्तिमें उनको हर्ष होता है और दु:खमें उनका द्वेष होता है, इसलिये उसकी प्राप्तिमें उनको शोक होता है; पर ज्ञानी भक्तका सुख और दु:खमें समभाव हो जानेके कारण किसी भी अवस्थामें उसके अन्त:करणमें हर्ष, शोक आदि विकार नहीं होते। श्रुतिमें भी कहा है --हर्षशोकौ जहाति” (कठोपनिषद् १,क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरज्ञानं यत् तज्ज्ञानं मतं मम हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्र अर्थात् जीवात्मा भी भी मुझे ही जानः और क्षेत्र- क्षेत्रज्षका अर्थात् विकार-सहित प्रकृतिका और पुरुषका जो तत्त्वसे जानना है, वह ज्ञान है --ऐसा मेरा मत है
“And know this as well, O Bhārata: in every field, I Myself am the Knower of the Field (kṣetrajña). The clear discernment of the Field and the Knower of the Field—this is what I hold to be true knowledge.”
Verse 3
सम्बन्ध--क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर संसारभ्रमका नाश हो जाता है और परमात्माकी प्राप्ति होती है, अतएव क्षेत्र” और क्षेत्रज्' के स्वरूप आदिको भलीभाॉति विभागपूर्वक समझानेके लिये भगवान् कहते हैं-- तत् क्षेत्र यच्चर“ं यादूक्ु" च यद्धिकारि* यतश्न यत्* । स*च यो यत्प्रभावश्चः तत् समासेन मे शूणु,वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारोंवाला है और जिस कारणसे जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ष भी जो और जिस प्रभाववाला है--वह सब संक्षेपमें मुझसे सुन
Arjuna said: “Tell me, in brief, what the ‘field’ (kṣetra) is—what it is and what it is like; what transformations it undergoes; from what cause it arises; and also who the ‘knower of the field’ (kṣetrajña) is and what power or influence belongs to that knower.”
Verse 4
सम्बन्ध-- तीसरे शलोकमें क्षेत्र" और क#क्षेत्रज्ञ” के जिस तत्त्वको संक्षेपर्में सुननेके लिये भगवान्ने अर्जुनये कहा है--अब उसके विषयमें ऋषि, वेद और ब्रह्म-सूत्रकी उक्तिका प्रमाण देकर भगवान् ऋषि, वेद और ब्रह्मयूत्रको आदर देते हैं-- ऋषिभिर्बहुधा गीत॑ छन्दोभिवविविधै:: पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्नैवः हेतुमद्/धिर्विनिश्चितै:
Arjuna said: “This truth has been sung in many ways by the seers, set forth separately in diverse Vedic metres, and also established through the aphorisms of the Brahma-sūtras—reasoned and firmly concluded.”
Verse 5
यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ऋषियोंद्वाराः बहुत प्रकारसे कहा गया है और विविध वेदमन्त्रोंद्रारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किये हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी कहा गया है ।। महाभूतान्यहंकारो: बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणिद शैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा:,५ पाँच महाभूत, अहंकार-॑, बुद्धि३ और मूल प्रकृति+ भी; तथा दस इन्द्रियाँ-, एक मनः और पाँच इन्द्रियोंक विषय* अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--
Arjuna said: “The constituents of embodied existence are to be understood as follows: the five great elements; ego-sense (ahaṃkāra); intellect (buddhi); and the unmanifest source (avyakta, primordial nature). Along with these are the ten senses, the one mind (manas), and the five fields of sense-experience—sound, touch, form, taste, and smell.”
Verse 6
इच्छा द्वेष: सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृति: । एतत् क्षेत्र समासेन सविकारमुदाह्तम्,तथा इच्छा,” द्वेष,* सुख, दुःख,“ स्थूल देहका पिण्ड, चेतना” और धृति+*-इस प्रकार विकारोंके सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया
Arjuna said: “Desire and aversion, pleasure and pain, the composite body, consciousness (chetanā), and steadfastness (dhṛti)—this, in brief, is declared to be the ‘field’ (kṣetra), together with its modifications.”
Verse 7
सम्बन्ध-- इस प्रकार क्षेत्रके स्वरूप और उसके विकारोंका वर्णन करनेके बाद अब जो दूसरे श्लोकमें यह बात कही थी कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है --उस ज्ञानको प्राप्त करनेके याधनोंका ज्ञान के ही नामसे पाँच शलोकोंद्वारा वर्णन करते आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रह:,श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सतानाः, क्षमाभावः, मन-वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवारें, बाहर-भीतरकी शुद्धि", अन्तःकरणकी स्थिरता* और मन-इन्द्रियोंलहित शरीरका निग्रह?
Arjuna said: “Reverent service to the teacher (ācārya-upāsana), purity (outer and inner), steadiness of mind, and self-restraint—together with humility (freedom from self-importance), absence of pretence, non-violence toward any being, patience, and straightforwardness—these are the disciplines that lead to true knowledge.”
Verse 8
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार4“5 एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदु:ःखदोषानुदर्शनम्
Arjuna said: Detachment from the objects of the senses, and freedom from egoism; and a clear, steady contemplation of the faults inherent in suffering—birth, death, old age, and disease. These dispositions are presented as marks of true discernment, turning the mind away from fleeting gratification and toward what is enduring and ethically elevating.
Verse 9
इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहंकारका भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना5? |। असक्तिरनभिष्वड्ड:* 3 पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषुर,पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्तिका अभाव, ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना
Freedom from clinging and from possessive attachment toward one’s children, spouse, home, and the like; and a steady evenness of mind at all times when pleasant or unpleasant outcomes arise—this is held up as a mark of inner discipline. Ethically, it points to living in the world without being ruled by ownership, preference, or aversion, so that duty may be performed without inner disturbance.
Verse 10
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदिरें ५,मुझ परमेश्वरमें अनन्य योगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति* तथा एकान्त और शुद्ध देशमें रहनेका स्वभाव और विषयासक्त मनुष्योंके समुदायमें प्रेमका न होना
Arjuna said: “Unswerving devotion to me through exclusive yoga; a disposition to dwell in secluded and pure places; and a lack of fondness for the company and assemblies of people absorbed in worldly objects—these are the marks of a mind turned toward the Highest.”
Verse 11
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतऊउज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोडन्यथा,अध्यातज्ञानमें नित्य स्थितिः और तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना“--यह सब ज्ञान हैः और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान: है--ऐसा कहा है
Arjuna said: “Steadfast constancy in spiritual knowledge, and the vision that perceives the Supreme Reality as the very meaning and goal of true knowledge—this is declared to be ‘knowledge’. Whatever is contrary to this is called ‘ignorance’.”
Verse 12
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या और योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्, श्रीकृष्णाजुनसंवादमें भक्तियोग नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,सम्बन्ध-- इस प्रकार ज्ञानके साधनोंका ज्ञान के नामसे वर्णन युननेपर यह जिज्ञासा हो सकती है कि इन साधनोंद्वारा प्राप्त ज्ञान से जाननेयोग्य वस्तु क्या है और उसे जान लेनेसे क्या होता है। उसका उत्तर देनेके लिये भगवान् अब जाननेके योग्य वस्तुके स्वरूपका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हुए उसके जाननेका फल “अमगरत्वकी प्राप्ति बतलाकर छ: शलोकोंमें जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन करते हैं-- ज्ञेयंः यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्रुते । अनादिमत् परं ब्रह्म न सत् तन्नासदुच्यते जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परम ब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही?
Arjuna said: “I shall now clearly declare that which is to be known—knowing which a person attains immortality. It is the supreme Brahman, beginningless; it is described as neither ‘being’ (sat) nor ‘non-being’ (asat).”
Verse 13
सर्वतःपाणिपादं तत् सर्वतो$क्षिशिरोमुखम् । सर्वतः:श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति,5 वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है;* क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित हैः
Arjuna said: That Being has hands and feet on every side; eyes, heads, and faces on every side; and ears everywhere. Enveloping all within the world, it stands pervading everything.
Verse 14
सर्वेन्द्रियगुणा भासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त्ू च,वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंक विषयोंको जाननेवाला है, परंतु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है* तथा आसक्ति-रहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला और निर्गुण होनेपर भी गुणोंको भोगनेवाला है?
Arjuna said: He appears to possess the qualities of all the senses, yet in truth is devoid of all senses. Though unattached, He sustains and supports all beings; though beyond the guṇas, He is also the experiencer of the guṇas.
Verse 15
बहिरन्तश्न भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्,वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है? एवं वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है< तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही हैः
Arjuna said: He pervades all beings, outside and within; He is the unmoving and also the moving. Because He is exceedingly subtle, He is hard to grasp by ordinary perception; yet the same Reality stands as though far away and also as the nearest presence.
Verse 16
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्त च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च,वह परमात्मा विभागरहित एक रूपसे आकाशके सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतोंमें विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता हैः तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा विष्णुरूपसे भूतोंको धारण-पोषण करनेवाला और रुद्ररूपसे संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाला है
Arjuna said: That Reality is to be known as the one that is undivided, yet appears as though divided among all beings. It is the sustainer of creatures; and it is also the power that withdraws them back into itself and the power that brings them forth.
Verse 17
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस:* परमुच्यते । ज्ञान॑ ज्ञेयं? ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विछ्ठितम्,वह परब्रह्म ज्योतियोंका भी ज्योति एवं मायासे अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जाननेके योग्य एवं तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्यः है और सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित है?
Arjuna said: That Reality is called the Light even of all lights, and it is declared to be beyond darkness. It is knowledge itself, the object to be known, and that which is reached through true knowledge; it abides, in a special way, in the heart of every being.
Verse 18
इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्ते समासत: । मद्धभधक्त एतद् विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते,इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जाननेयोग्य परमात्मा-का स्वरूप संक्षेपसे कहा गया*। मेरा भक्त इसको तत्त्वसे जानकर मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है?
Thus, in brief, the field (the embodied condition), knowledge, and the Supreme Reality to be known have been explained. One who is devoted to me, truly discerning this teaching, attains my own state—union with my being.
Verse 19
सम्बन्ध--इस अध्यायके तीसरे शलोकमें भगवानने क्षेत्रके विषयमें चार बातें और क्षेत्रञके विषयमें दो बातें संक्षेपें सुननेके लिये अर्जुनसे कहा था, फिर विषय आरम्भ करते ही क्षेत्रके स््व्छपका और उसके विकारोंका वर्णन करनेके अनन्तर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके तत्वको भलीभाँति जाननेके उपायभूत साधनोंका और जाननेके योग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन प्रयसंगवश किया गया। इससे क्षेत्रके विषयमें उसके स्वभावका और किस कारणसे कौन कार्य उत्पन्न होता है; इस विषयका तथा प्रभावसहित क्षेत्रज्के स््वरूपका भी वर्णन नहीं हुआ। अतः: अब उन सबका वर्णन करनेके लिये भगवान् पुनः प्रकृति और पुरुषके नागसे प्रकरण आरम्भ करते हैं-- प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि । विकारांश्व गुणांश्वैव* विद्धि प्रकृतिसम्भवान्
Arjuna said: Know that both Prakriti (material nature) and Purusha (the conscious principle) are beginningless. And know also that all modifications and the three qualities (gunas) arise from Prakriti. In the ethical frame of the Gita’s teaching, this distinction clarifies what belongs to changing nature versus what pertains to the witnessing self—guiding one toward responsibility without confusion, and toward liberation without escapism.
Verse 36
भीष्मपर्वमें छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus ends the thirty-sixth chapter in the Bhīṣma Parva.
Verse 44
ऑपन--माजल बछ। अि--छकऋाझ ३. 'त्वाम” पद यद्यपि यहाँ भगवान् श्रीकृष्णका वाचक है, तथापि भिन्न-भिन्न अवतारोंमें भगवानने जितने सगुण रूप धारण किये हैं एवं दिव्य धाममें जो भगवान्का सगुण रूप विराजमान है--जिसे अपनी-अपनी मान्यताके अनुसार लोग अनेकों रूपों और नामोंसे बतलाते हैं--यहाँ “त्वाम' पदको उन सभीका वाचक मानना चाहिये; क्योंकि वे सभी भगवान् श्रीकृष्णसे अभिन्न हैं। उन सगुण भगवान्का निरन्तर चिन्तन करते हुए परम श्रद्धा और प्रेमपूर्वक निष्कामभावसे जो समस्त इन्द्रियोंको उनकी सेवामें लगा देना है, यही निरन्तर भजन-ध्यानमें लगे रहकर उनकी श्रेष्ठ उपासना करना है। २. “अक्षरम' विशेषणके सहित “अव्यक्तम” पद यहाँ निर्मुण-निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका वाचक है। यद्यपि जीवात्माको भी अक्षर और अव्यक्त कहा जा सकता है, पर अर्जुनके प्रश्नका अभिप्राय उसकी उपासनासे नहीं है; क्योंकि उसके उपासकका सगुण भगवानके उपासकसे उत्तम होना सम्भव नहीं है और पूर्वप्रसंगमें कहीं उसकी उपासनाका भगवानने विधान भी नहीं किया है। 3. भगवान्की सत्तामें, उनके अवतारोंमें, उनके वचनोंमें, उनकी शक्तिमें, उनके गुण, प्रभाव, लीला और ऐश्वर्य आदियमें अत्यन्त सम्मानपूर्वक जो प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास है--वही अतिशय श्रद्धा है और भक्त प्रह्नमादकी भाँति सब प्रकारसे भगवानूपर निर्भर हो जाना ही उपर्युक्त श्रद्धासे युक्त होना है। ४. गोपियोंकी भाँति समस्त कर्म करते समय परम प्रेमास्पद, सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, सम्पूर्ण गुणोंके समुद्र भगवान्में मनको तन््मय करके उनके गुण, प्रभाव और स्वरूपका सदा-सर्वदा प्रेमपूर्वक चिन्तन करते रहना ही मनको एकाग्र करके निरन्तर उनके ध्यानमें स्थित रहते हुए उनको भजना है। श्रीमद्भागवतमें बतलाया है-- या दोहने&वहनने मथनोपलेपप्रेड्खेड्खानार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियो<श्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना: ।। (१०
Arjuna said: But those who, dedicating all their actions to Me and holding Me as the supreme goal, worship Me—meditating on Me with single-minded yoga, without any other object—what is their standing?
He asks how to classify the commitment (niṣṭhā/śraddhā) of practitioners who worship with sincerity while disregarding prescribed scriptural method, and whether that commitment corresponds to sattva, rajas, or tamas.
Human practice is best evaluated by inner orientation shaped by the guṇas: disciplined action aligned with clarity and non-reward-seeking is distinguished from action driven by display, craving, or inertia, even when outwardly similar.
Yes: it states that offerings, gifts, austerities, and deeds performed without śraddhā are designated “asat” and are described as lacking enduring efficacy both in immediate terms and in posthumous valuation.