Adhyaya 36
Bhishma ParvaAdhyaya 367 Versesरण-स्थिति पृष्ठभूमि में स्थिर; अध्याय का केन्द्र युद्ध नहीं, अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद द्वारा आध्यात्मिक दृष्टि का विस्तार है।

Adhyaya 36

Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Embedded Discourse within Bhīṣma-parva)

Kṛṣṇa announces a superior knowledge leading to liberation and likeness to the divine standpoint (1–2). He frames cosmogenesis through prakṛti: the ‘great brahman’ as womb and himself as the seed-giving father, situating embodied beings within a causal matrix (3–4). He then defines the three guṇas—sattva (clarity), rajas (passion), tamas (inertia)—as binding forces for the imperishable embodied self within the body (5). Each guṇa is characterized by its binding mechanism: sattva by attachment to happiness and knowledge (6), rajas by craving and attachment to action (7), tamas by delusion expressed as negligence, laziness, and sleep (8). Their functional outcomes are mapped: sattva inclines to happiness, rajas to activity, tamas to heedlessness via obscuring knowledge (9–13). Post-mortem trajectories and fruits are described according to dominant guṇa at death and the moral-epistemic results of action (14–18). The chapter culminates in discernment: seeing no agent beyond guṇas and knowing the transcendent beyond them leads to ‘my state’ (19), and transcending the guṇas yields freedom from birth-death-aging-sorrow (20). Arjuna asks for the marks and conduct of one beyond guṇas (21). Kṛṣṇa answers: equanimity toward illumination/activity/delusion, unaffected witnessing, sameness in pleasure-pain and social valuation, and renunciation of compulsive undertakings (22–25). Steady bhakti is given as the practical means to surpass the guṇas and attain brahma-bhāva; Kṛṣṇa identifies himself as the foundation of brahman, the imperishable, and enduring dharma and ultimate happiness (26–27).

Chapter Arc: रणभूमि के बीच, अर्जुन ‘भगवन्’ कहकर श्रीकृष्ण की सत्ता का अर्थ खोलता है—जो उत्पत्ति-प्रलय, भूतों के आगमन-निर्गमन, विद्या-अविद्या को जानता है, वही ‘भगवान्’ कहलाता है। → अर्जुन की जिज्ञासा तीव्र होती है: यदि समस्त जगत् में ईश्वर की विभूतियाँ फैली हैं, तो उन्हें कैसे पहचाना जाए? श्रीकृष्ण प्रेम से (‘प्रीयमाणाय’) संकेत करते हैं कि अर्जुन का अनुराग ही इस ज्ञान का पात्र है, और वे देवताओं, मनुओं, सप्तर्षियों, इन्द्र आदि को अपनी ही विभूतियाँ बताकर दृष्टि को व्यापक करते हैं। → विभूतियों का विराट-मानचित्र खुलता है—देव, ऋषि, अधिपति, कल्याणस्वरूप शम्भु (शंकर) तक को श्रीकृष्ण अपने ही स्वरूप/प्रभा के रूप में रखते हैं; सृष्टि-प्रवृत्ति के आदितप और सनकादि ऋषियों की उत्पत्ति जैसे प्रसंगों से यह स्थापित होता है कि जगत् की श्रेष्ठता जहाँ-जहाँ दिखे, वहाँ- वहाँ उसी एक परम सत्ता की झलक है। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि अर्जुन को युद्ध-धर्म के बीच भी ईश्वर-दर्शन का व्यावहारिक उपाय मिल गया—श्रेष्ठ, तेजस्वी, कल्याणकारी, अधिष्ठाता रूपों में परमात्मा की पहचान; और यह कि यह वर्णन अनन्त का केवल संकेत-मात्र है। → अर्जुन के भीतर ‘और देखना’ की उत्कंठा जागती है—विभूतियों के संकेत अब विराट-रूप के प्रत्यक्ष दर्शन की ओर मन को धकेलते हैं।

Shlokas

Verse 1

७८) “उत्पत्ति और प्रलयको, भूतोंके आने और जानेको तथा विद्या और अविद्याको जो जानता है, उसे “भगवान्‌” कहना चाहिये।' अतएव यहाँ अर्जुन श्रीकृष्णको “भगवन्‌” सम्बोधन देकर यह भाव दिखलाते हैं कि आप सर्वश्वर्यसम्पन्न और सर्वज्ञ, साक्षात्‌ परमेश्वर हैं--इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। ६. जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेके लिये, धर्मकी स्थापना और भक्तोंको दर्शन देकर उनका उद्धार करनेके लिये, देवताओंका संरक्षण और राक्षसोंका संहार करनेके लिये एवं अन्यान्य कारणोंसे भगवान्‌ भिन्न-भिन्न लीलामय स्वरूप धारण किया करते हैं। उन सबको देवता और दानव नहीं जानते-- यह कहकर अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि मायासे नाना रूप धारण करनेकी शक्ति रखनेवाले दानवलोग तथा इन्द्रियातीत विषयोंका प्रत्यक्ष करनेवाले देववालोग भी आपके उन लीलामय रूपोंको, उनके धारण करनेकी दिव्य शक्ति और युक्तिको, उनके निमित्तको और उनकी लीलाओंके रहस्यको नहीं जान सकते; फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ७. यहाँ अर्जुनने इन पाँच सम्बोधनोंका प्रयोग करके यह भाव दिखलाया है कि आप समस्त जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले, सबके नियन्ता, सबके पूजनीय, सबका पालन-पोषण करनेवाले तथा “अपरा' और “परा” प्रकृति नामक जो क्षर और अक्षर पुरुष हैं, उनसे उत्तम साक्षात्‌ पुरुषोत्तम भगवान हैं। ८. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि आप समस्त जगत्‌के आदि हैं, आपके गुण, प्रभाव, लीला, माहात्म्य और रूप आदि अपरिमित हैं--इस कारण आपके गुण, प्रभाव, लीला, माहात्म्य, रहस्य और स्वरूप आदिको कोई भी दूसरा पुरुष पूर्णतया नहीं जान सकता, स्वयं आप ही अपने प्रभाव आदिको जानते हैं। १. किन-किन पदार्थोंमें किस प्रकारसे निरन्तर चिन्तन करके सहज ही भगवान्‌के गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको समझा जा सकता है--इसके सम्बन्धमें अर्जुन पूछ रहे हैं। २. सभी मनुष्य अपनी-अपनी इच्छित वस्तुओंके लिये जिससे याचना करें, उसे “जनार्दन” कहते हैं। 3. इससे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि आपके वचनोंमें ऐसी माधुरी भरी है, उनसे आनन्दकी वह सुधाधारा बह रही है, जिसका पान करते-करते मन कभी अघाता ही नहीं। इस दिव्य अमृतका जितना ही पान किया जाता है, उतनी ही उसकी प्यास बढ़ती जा रही है। मन करता है कि यह अमृतमय रस निरन्तर ही पीता रहूँ। ४. जब सारा जगत्‌ भगवान्‌का स्वरूप है, तब साधारणतया तो सभी वस्तुएँ उन्हींकी विभूति हैं; परंतु वे सब-के-सब दिव्य विभूति नहीं हैं। दिव्य विभूति उन्हीं वस्तुओं या प्राणियोंको समझना चाहिये, जिनमें भगवानके तेज, बल, विद्या, ऐश्वर्य, कान्ति और शक्ति आदिका विशेष विकास हो। भगवान्‌ यहाँ ऐसी ही विभूतियोंके लिये कहते हैं कि मेरी ऐसी विभूतियाँ अनन्त हैं, अतएव सबका तो पूरा वर्णन हो ही नहीं सकता; उनमेंसे जो प्रधान-प्रधान हैं, यहाँ मैं उन्‍्हींका वर्णन करूँगा। विश्वमें अनन्त पदार्थों, भावों और विभिन्नजातीय प्राणियोंका विस्तार है। इन सबका यथाविधि नियन्त्रण और संचालन करनेके लिये जगत्स्रष्टा भगवान्‌के अटल नियमके द्वारा विभिन्नजातीय पदार्थों, भावों और जीवोंके विभिन्न समष्टि-विभाग कर दिये गये हैं और उन सबका ठीक नियमानुसार सृजन, पालन तथा संहारका कार्य चलता रहे--इसके लिये प्रत्येक समष्टि-विभागके अधिकारी नियुक्त हैं। रुद्र, वसु आदित्य, इन्द्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत्‌, पितृदेव, मनु और सप्तर्षि आदि इन्हीं अधिकारियोंकी विभिन्न संज्ञाएँ हैं। इनके मूर्त और अमूर्त दोनों ही रूप माने गये हैं। ये सभी भगवानकी विभूतियाँ हैं। सर्वे च देवा मनवः समस्ता: सप्तर्षयो ये मनुसूनवश्च । इन्द्रश्न यो5यं त्रिदशेशभूतो विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ता: ।। (श्रीविष्णुपुराण ३

Arjuna said: “O Lord, how may I, as one seeking union with the Divine, constantly contemplate You? In what particular forms, qualities, and spheres of experience should I meditate upon You, O Bhagavan?”

Verse 3

४६) “सभी देवता, समस्त मनु, सप्तर्षि तथा जो मनुके पुत्र हैं और जो ये देवताओंके अधिपति इन्द्र हैं--ये सभी भगवान्‌ विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।' ५. “गुडाका' निद्राको कहते हैं। उसके स्वामीको “गुडाकेश” कहते हैं। भगवान्‌ अर्जुनको “गुडाकेश' नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम निद्रापर विजय प्राप्त कर चुके हो; अतएव मेरे उपदेशको धारण करके अज्ञाननिद्राको भी जीत सकते हो। ३. समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित जो “चेतन” है, जिसको परा “प्रकृति” और “क्षेत्रज्ञ' भी कहते हैं (गीता ७।५; १३।१), उसीको यहाँ “सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा" बतलाया है। वह भगवान्‌का ही अंश होनेके कारण (गीता १५।७) वस्तुतः भगवत्स्वरूप ही है (गीता १३।२)। इसीलिये भगवानने कहा है कि “वह आत्मा मैं हूँ।' २. यहाँ “भूत” शब्दसे चराचर समस्त देहधारी प्राणी समझने चाहिये। ये सब प्राणी भगवानसे ही उत्पन्न होते हैं, उन्हींमें स्थित हैं और प्रलयकालमें भी उन्हींमें लीन होते हैं; भगवान्‌ ही सबके मूल कारण और आधार हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उन सबका आदि, मध्य और अन्त बतलाया | 3. अदितिके धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वानू पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु नामक बारह पुत्रोंको द्वादश आदित्य कहते हैं-- धाता मित्रोडर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान्‌ पूषा च सविता दशमस्तथा ।। एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते | जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिक: ।। (महा०, आदि० ६५।१५-१६) इनमें जो विष्णु हैं, वे इन सबके राजा हैं और अन्य सबसे श्रेष्ठ हैं। इसीलिये भगवानने विष्णुकी अपना स्वरूप बतलाया है। ४. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, उन सबमें सूर्य प्रधान हैं; इसलिये भगवानने समस्त ज्योतियोंमें सूर्यकोी अपना स्वरूप बतलाया है। ५. उनचास मसरुतोंके नाम ये हैं--“सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्‌, हरित, ऋतजित्‌, सत्यजित्‌, सुषेण, सेनजित्‌, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्‌, अन्यादृक्‌, यादृक्‌, प्रतिकृतू, ऋक्‌, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, समिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मरुति, सरत, देव, दिश, यजु:, अनुदृक्‌, साम, मानुष और विश्‌ (वायुपुराण ६७।१२३ से १३०)। गरुडपुराण तथा अन्यान्य पुराणोंमें कुछ नामभेद पाये जाते हैं; परंतु मरीचि” नाम कहीं भी नहीं मिला है। इसीलिये “मरीचि” को मरुत्‌ न मानकर समस्त मरुद्गणोंका तेज या किरणें माना गया है।' दक्षकन्या मरुत्वतीसे उत्पन्न पुत्रोंकी भी मरुदगण कहते हैं (हरिवंश)। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें भिन्न- भिन्न नामोंसे तथा विभिन्न प्रकारसे इनकी उत्पत्तिके वर्णन पुराणोंमें मिलते हैं। दितिपुत्र उनचास मरुद्गण दिति देवीके भगवद्ध्यानरूप व्रतके तेजसे उत्पन्न हैं। उस तेजके ही कारण इनका गर्भमें विनाश नहीं हो सका था। इसलिये उनके इस तेजको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. अश्विनी, भरणी और कृतिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबके स्वामी और सम्पूर्ण तारा- मण्डलके राजा होनेसे चन्द्रमा भगवान्‌की प्रधान विभूति हैं। इसलिये यहाँ उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ७. ऋक्‌, यजु, साम और अथर्व--इन चारों वेदोंमें सामवेद अत्यन्त मधुर संगीतमय तथा परमेश्वरकी अत्यन्त रमणीय स्तुतियोंसे युक्त है; अतः वेदोंमें उसकी प्रधानता है। इसलिये भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. समस्त प्राणियोंकी जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा उनको दुःख-सुखका और समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है, जो अन्त:करणकी वृत्तिविशेष है, गीताके तेरहवें अध्यायके छठे श्लोकमें जिसकी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है, उस ज्ञान-शक्तिका नाम “चेतना” है। यह प्राणियोंके समस्त अनुभवोंकी हेतुभूता प्रधान शक्ति है, इसलिये इसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. हर, बहुरूप, >यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली--ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं-- हरश्न बहुरूपश्च त्रयम्बकश्नापराजित: । वृषाकपिश्च शम्भुश्न कपर्दी रैवतस्तथा ।। मृगव्याधश्न शर्वश्ष कपाली च विशाम्पते । एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवने श्वरा: ।। (हरिवंश० १

Arjuna said: (He begins his response to Kṛṣṇa’s revelation of divine manifestations, seeking clarity and confirmation about the Lord’s all-pervading presence and the way the One Reality appears as many powers in the world. In the ethical setting of the battlefield, Arjuna’s speech marks a turn from confusion toward reverent inquiry—wanting to understand how to recognize the Divine amid duty, conflict, and the multiplicity of beings.)

Verse 5

५) “मैंने विविध प्रकारके लोकोंको उत्पन्न करनेकी इच्छासे जो सबसे पहले तप किया, उस मेरी अखण्डित तपस्यासे ही भगवान्‌ स्वयं सनक, सननन्‍्दन, सनातन और सनत्कुमार--इन चार “सन” नामवाले रूपोंमें प्रकट हुए और पूर्वकल्पमें प्रलयकालके समय जो आत्मतत्त्वके ज्ञानका प्रचार इस संसारमें नष्ट हो गया था, उसका इन्होंने भलीभाँति उपदेश किया, जिससे उन मुनियोंने अपने हृदयमें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार किया।' $. सप्तर्षियोंके लक्षण बतलाते हुए कहा गया है-- एतान्‌ भावानधीयाना ये चैत ऋषयो मता: । सप्तैते सप्तभिश्नैव गुणै: सप्तर्षय: स्मृता: ।। दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुष: । वृद्धा: प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्न ये ।। (वायुपुराण ६१।९३-९४) “तथा देवर्षियोंके इन (उपर्युक्त) भावोंका जो अध्ययन (स्मरण) करनेवाले हैं, वे ऋषि माने गये हैं; इन ऋषियोंमें जो दीर्घायु, मन्त्रकर्ता, ऐश्वर्यवान्‌, दिव्य-दृष्टियुक्त, गुण, विद्या और आयुमें वृद्ध, धर्मका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करनेवाले और गोत्र चलानेवाले हैं--ऐसे सातों गुणोंसे युक्त सात ऋषियोंको ही सप्तर्षि कहते हैं।' इन्हींसे प्रजाका विस्तार होता है और धर्मकी व्यवस्था चलती है। यहाँ जिन सप्तर्षियोंका वर्णन है, उनको भगवानने “महर्षि! कहा है और उन्हें संकल्पसे उत्पन्न बतलाया है। इसलिये यहाँ उन्हींका लक्ष्य है, जो ऋषियोंसे भी उच्चस्तरके हैं। ऐसे सप्तर्षियोंका उल्लेख महाभारत-शान्तिपर्वमें मिलता है; इनके लिये साक्षात्‌ परम पुरुष परमेश्वरने देवताओंसहित ब्रह्माजीसे कहा मरीचिरज्रिराश्षात्रि: पुलस्त्य: पुलह: क्रतुः | वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्व कल्पिता: । प्रवृत्तिधर्मिणश्रैव प्राजापत्ये च कल्पिता: ।। (महा०, शान्ति० ३४०।६९-७०) “मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ--ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं। ये सातों वेदके ज्ञाता हैं, इनको मैंने मुख्य वेदाचार्य बनाया है। ये प्रवृतिमार्गका संचालन करनेवाले हैं और (मेरे ही द्वारा) प्रजापतिके कर्ममें नियुक्त किये गये हैं।' इस कल्पके सर्वप्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तरके सप्तर्षि यही हैं (हरिवंशण ७।८, ९)। अतएव यहाँ सप्तर्षियोंसे इन्हींका ग्रहण करना चाहिये। २. ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं, प्रत्येक मनुके अधिकारकालको “मन्वन्तर” कहते हैं। इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है। मानवी वर्षगणनाके हिसाबसे एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षसे और दिव्य-वर्षणणनाके हिसाबसे आठ लाख बावन हजार वर्षसे कुछ अधिक कालका होता है (विष्णुपुराण १।३)। सूर्यसिद्धान्तमें मन्वन्तर आदिका जो वर्णन है, उसके अनुसार इस प्रकार समझना चाहिये-- सौरमानसे ४३,२०,००० वर्षकी अथवा देवमानसे १२,००० वर्षकी एक चतुर्युगी होती है। इसीको महायुग कहते हैं। ऐसे इकहतर युगोंका एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरके अन्तमें सत्ययुगके मानकी अर्थात्‌ १७,२८,००० वर्षकी संध्या होती है। मन्वन्तर बीतनेपर जब संध्या होती है, तब सारी पृथ्वी जलनमें डूब जाती है। प्रत्येक कल्पमें (ब्रह्माके एक दिनमें) चौदह मन्वन्तर अपनी-अपनी संध्याओंके मानके सहित होते हैं। इसके सिवा कल्पके आरम्भकालमें भी एक सत्ययुगके मानकालकी संध्या होती है। इस प्रकार एक कल्पके चौदह मनुओंमें ७१ चतुर्युगीके अतिरिक्त सत्ययुगके मानकी १५ संध्याएँ होती हैं। ७१ महायुगोंके मानसे १४ मनुओंमें ९९४ महायुग होते हैं और सत्ययुगके मानकी १५ संध्याओंका काल पूरा ६ महायुगोंके समान हो जाता है। दोनोंका योग मिलानेपर पूरे एक हजार महायुग या दिव्ययुग बीत जाते हैं। इस हिसाबसे निम्नलिखित अंकोंके द्वारा इसको समझिये-- सौरमान या मानव वर्ष देवमान या दिव्य वर्ष एक चतुर्युगी (महायुग या दिव्ययुग) ४३,२०,००० १२,००० इकहत्तर चतुर्युगी ३०,६७,२०,००० ८,५२,००० कल्पकी संधि १७,२८,००० ४,८०० मन्वन्तरकी चौदह संध्या २,४१,९२,००० ६७,२०० संधिसहित एक मन्वन्तर ३०,८४,४८,००० ८,५६,८०० चौदह संध्यासहित चौदह मन्वन्तर ४,३९,८२,७२,००० १,१९,९६,२०० कल्पकी संधिसहित चौदह मन्वन्तर या एक कल्प ४,३२,००,००,००० १,२०,००,००० ब्रह्माजीका दिन ही कल्प है, इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि है। इस अहोरात्रके मानसे ब्रह्माजीकी परमायु एक सौ वर्ष है। इसे “पर” कहते हैं। इस समय ब्रह्माजी अपनी आयुका आधा भाग अर्थात्‌ एक परार्द्ध बिताकर दूसरे परार्द्धमें चल रहे हैं। यह उनके ५१ वें वर्षका प्रथम दिन या कल्प है। वर्तमान कल्पके आरम्भसे अबतक स्वायम्भुव आदि छ: मन्वन्तर अपनी-अपनी संध्याओंसहित बीत चुके हैं, कल्पकी संध्यासमेत सात संध्याएँ बीत चुकी हैं। वर्तमान सातवें वैवस्वत मन्वन्तरके २७चतुर्युग बीत चुके हैं। इस समय अठ्वराईसवें चतुर्युगके कलियुगका संध्याकाल चल रहा है (सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार, श्लोक १५ से २४ देखिये)। इस २०१३ वि० तक कलियुगके ५०५७ वर्ष बीते हैं। कलियुगके आरम्भमें ३६,००० वर्ष संध्याकालका मान होता है। इस हिसाबसे अभी कलियुगकी संध्याके ३०,९४३ सौर वर्ष बीतने बाकी हैं। प्रत्येक मन्वन्तरमें धर्मकी व्यवस्था और लोकरक्षणके लिये भिन्न-भिन्न सप्तर्षि होते हैं। एक मन्वन्तरके बीत जानेपर जब मनु बदल जाते हैं, तब उन्हींके साथ सप्तर्षि, देवता, इन्द्र और मनुपुत्र भी बदल जाते हैं। वर्तमान कल्पके मनुओंके नाम ये हैं--स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि। श्रीमद्भातावतके आठवें स्कन्दके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायोंमें इनका विस्तारसे वर्णन पढ़ना चाहिये। विभिन्न पुराणोंमें इनके नामभेद मिलते हैं। यहाँ ये नाम श्रीमद्भागवतके अनुसार दिये गये हैं। चौदह मनुओंका एक कल्प बीत जानेपर सब मनु भी बदल जाते हैं। ३. ये सभी भगवानमें श्रद्धा और प्रेम रखनेवाले हैं, यही भाव दिखलानेके लिये इनको मुझमें भाववाले बतलाया गया है तथा इनकी जो ब्रह्माजीसे उत्पत्ति होती है, वह वस्तुतः भगवानसे ही होती है; क्योंकि स्वयं भगवान्‌ ही जगत्‌की रचनाके लिये ब्रह्माका रूप धारण करते हैं। अतएव ब्रह्माके मनसे उत्पन्न होनेवालोंको भगवान्‌ “अपने मनसे उत्पन्न होनेवाले' कहें तो इसमें कोई विरोधकी बात नहीं है। २. भगवानकी जो अनन्यभक्ति है (गीता ११।५५), जिसे “अव्यभिचारिणी भक्ति” (गीता १३।१०) और “अव्यभिचारी भक्तियोग” (गीता १४।२६) भी कहते हैं; उस “अविचल भक्तियोग” का वाचक यहाँ “अविकम्पेन'” विशेषणके सहित 'योगेन” पद है और उसमें संलग्न रहना ही उससे युक्त हो जाना है। 3. इसी अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकोंमें भगवानने जिन बुद्धि आदि भावोंको और महर्षि आदिको अपनेसे उत्पन्न बतलाया है तथा गीताके सातवें अध्यायमें “जलमें मैं रस हूँ” (७।८) एवं नवें अध्यायमें “क्रतु मैं हूँ', यज्ञ मैं हूँ” (९५।१६) इत्यादि वाक्योंसे जिन-जिन पदार्थोंका, भावोंका और देवता आदिका वर्णन किया है--उन सबका वाचक “विभूति' शब्द है। ४. भगवान्‌की जो अलौकिक शक्ति है, जिसे देवता और महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जानते (गीता १०।२, ३); जिसके कारण स्वयं साच्चिक, राजस और तामस भावोंके अभिन्न-निमित्तोपादान कारण होनेपर भी भगवान्‌ सदा उनसे न्यारे बने रहते हैं और यह कहा जाता है कि “न तो वे भाव भगवानमें हैं और न भगवान्‌ ही उनमें हैं" (गीता ७१२); जिस शक्तिसे सम्पूर्ण जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार आदि समस्त कर्म करते हुए भगवान्‌ सम्पूर्ण जगत्‌को नियममें चलाते हैं; जिसके कारण वे समस्त लोकोंके महान्‌ ईश्वर, समस्त भूतोंके सुहृद, समस्त यज्ञादिके भोक्ता, सर्वाधार और सर्वशक्तिमान्‌ हैं; जिस शक्तिसे भगवान्‌ इस समस्त जगत्‌को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हैं (गीता १०।४२) और युग-युगमें अपने इच्छानुसार विभिन्न कार्योंक लिये अनेक रूप धारण करते हैं तथा सब कुछ करते हुए भी समस्त कर्मोसे, सम्पूर्ण जगत्से एवं जन्मादि समस्त विकारोंसे सर्वथा निर्लेप रहते हैं और गीताके नवम अध्यायके पाँचवें श्लोकमें जिसको 'ऐश्वर्य योग” कहा गया है--उस अद्भुत शक्ति (प्रभाव)-का वाचक यहाँ 'योग' शब्द है। ५. इस प्रकार समस्त जगत्‌ भगवान्‌की ही रचना है और सब उन्हींके एक अंशमें स्थित हैं। इसलिये जगत्‌में जो भी वस्तु शक्तिसम्पन्न प्रतीत हो, जहाँ भी कुछ विशेषता दिखलायी दे, उसे--अथवा समस्त जगत्‌को ही भगवानकी विभूति अर्थात्‌ उन्हींका स्वरूप समझना एवं उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌को समस्त जगतके कर्ता-हर्ता, सर्वशक्तिमान्‌ सर्वेश्वर, सर्वाधार, परम दयालु, सबके सुहृद्‌ और सर्वान्तर्यामी मानना --यही “भगवान्‌की विभूति और योगको तत्त्वसे जानना' है। ३. भगवान्‌के ही योगबलसे यह सृष्टिचक्र चल रहा है; उन्हींकी शासन-शक्तिसे सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और पृथ्वी आदि नियम-पूर्वक घूम रहे हैं; उन्हींके शासनसे समस्त प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार अच्छी- बुरी योनियोंमें जन्म धारण करके अपने-अपने कर्मोंका फल भोग रहे हैं--इस प्रकारसे भगवान्‌को सबका नियन्ता और प्रवर्तक समझना ही “सम्पूर्ण जगत्‌ भगवानसे चेष्टा करता है” यह समझना है। २. उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌को सम्पूर्ण जगत्‌का कर्ता, हर्ता और प्रवर्तक समझकर अगले श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे अतिशय श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मन, बुद्धि और समस्त इन्द्रियोंद्वारा निरन्तर भगवान्‌का स्मरण और सेवन करना ही भगवानको निरन्तर भजना है। 3. भगवान्‌को ही अपना परम प्रेमी, परम सुहृद, परम आत्मीय, परम गति और परम प्रिय समझनेके कारण जिनका चित्त अनन्यभावसे भगवान्‌में लगा हुआ है (गीता ८।१४; ९।२२)। भगवानके सिवा किसी भी वस्तुमें जिनकी प्रीति, आसक्ति या रमणीय बुद्धि नहीं है; जो सदा-सर्वदा ही भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका चिन्तन करते रहते हैं और जो शास्त्रविधिके अनुसार कर्म करते हुए उठते- बैठते, सोते-जागते, चलते-फिरते, खाते-पीते, व्यवहारकालमें और ध्यानकालमें कभी क्षणमात्र भी भगवान्‌को नहीं भूलते, ऐसे नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले भक्तोंके लिये ही यहाँ भगवानने “मच्चित्ता:' विशेषणका प्रयोग किया है। ४. जिनका जीवन और इन्द्रियोंकी समस्त चेष्टाएँ केवल भगवानके ही लिये हैं; जिनको क्षणमात्रका भी भगवानका वियोग असहा है; जो भगवानके लिये ही प्राण धारण करते हैं; खाना-पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना आदि जितनी भी चेष्टाएँ हैं, उन सबमें जिनका अपना कुछ भी प्रयोजन नहीं रह गया है--जो सब कुछ भगवान्‌के लिये ही करते हैं, उनके लिये भगवानने “मद्‌गतप्राणा:” का प्रयोग किया है। ५. भगवानूमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले प्रेमी भक्तोंका जो अपने-अपने अनुभवके अनुसार भगवान्‌के गुण, प्रभाव, तत्त्व, लीला, माहात्म्य और रहस्यको परस्पर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे समझानेकी चेष्टा करना है --यही परस्पर भगवान्‌का बोध कराना है। ६. श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका कीर्तन और गायन करना तथा कथा-व्याख्यानादिद्वारा लोगोंमें प्रचार करना और उनकी स्तुति करना आदि सब भगवान्‌का कथन करना है। ७. प्रत्येक क्रिया करते हुए निरन्तर परम आनन्दका अनुभव करना ही “नित्य संतुष्ट रहना” है। इस प्रकार संतुष्ट रहनेवाले भक्तकी शान्ति, आनन्द और संतोषका कारण केवल भगवान्‌के नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूप आदिका श्रवण, मनन और कीर्तन तथा पठन-पाठन आदि ही होता है। सांसारिक वस्तुओंसे उसके आनन्द और संतोषका कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। ८. भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला, स्वरूप, तत्त्व और रहस्यका यथायोग्य श्रवण, मनन और कीर्तन करते हुए एवं उनकी रुचि, आज्ञा और संकेतके अनुसार केवल उनमें प्रेम होनेके लिये ही प्रत्येक क्रिया करते हुए, मनके द्वारा उनको सदा-सर्वदा प्रत्यक्षवत्‌ अपने पास समझकर निरन्तर प्रेमपूर्वक उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप आदि क्रीड़ा करते रहना--यही भगवान्‌में निरन्तर रमण करना है। ३. इससे यह भाव दिखलाया है कि पूर्वश्लोकमें भगवानके जिन भक्तोंका वर्णन हुआ है, वे भोगोंकी कामनाके लिये भगवान्‌को भजनेवाले नहीं हैं, किंतु किसी प्रकारका भी फल न चाहकर केवल निष्काम अनन्य प्रेमभावपूर्वक ही भगवान्‌का, उस श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे, निरन्तर भजन करनेवाले हैं। २. भगवानका जो भक्तोंके अन्त:करणमें अपने प्रभाव और महत्त्वादिके रहस्यसहित निर्गुण-निराकार तत्त्वको तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण-निराकार और साकार तत्त्वको यथार्थरूपसे समझनेकी शक्ति प्रदान करना है--वही “बुद्धि (तत्त्वज्ञानरूप) योगका प्रदान करना” है। 3. पूर्वश्लोकमें जिसे बुद्धियोग कहा गया है; जिसके द्वारा प्रभाव और महिमा आदिके सहित निर्गुण- निराकारतत्त्वका तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण-निराकार और साकारतत्त्वका स्वरूप भलीभाँति जाना जाता है, ऐसे संशय, विपर्यय आदि दोषोंसे रहित “दिव्य बोध' का वाचक यहाँ 'भास्वता' विशेषणके सहित '“ज्ञानदीपेन” पद है। ४. अनादिसिद्ध अज्ञानसे उत्पन्न जो आवरणशक्ति है--जिसके कारण मनुष्य भगवानके गुण, प्रभाव और स्वरूपको यथार्थ नहीं जानता--उसको यहाँ “अज्ञानजनित अन्धकार' कहा है। “उसे मैं भक्तोंके अन्तःकरणमें स्थित हुआ नष्ट कर देता हूँ” भगवान्‌के इस कथनका अभिप्राय यह है कि मैं सबके हृदयदेशमें अन्तर्यामीरूपसे सदा-सर्वदा स्थित रहता हूँ, तो भी लोग मुझे अपनेमें स्थित नहीं मानते; इसी कारण मैं उनका अज्ञानजनित अन्धकार नाश नहीं कर सकता। परंतु मेरे प्रेमी भक्त मुझे अपना अन्तर्यामी समझते हुए पूर्वश्लोकोंमें कहे हुए प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं, इस कारण उनके अज्ञानजनित अन्धकारका मैं सहज ही नाश कर देता हूँ। ५. ऋषीत्येष गतौ धातु: श्रुतौ सत्ये तपस्थथ । एतत्‌ संनियतं यस्मिन्‌ ब्रह्मणा स ऋषि: स्मृतः ।। गर्त्यर्थादृषतेर्धातोनमिनिर्वृत्तिरादित: । यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता ।। (वायुपुराण ५९।७९, ८१) “ऋष” धातु गमन (ज्ञान), श्रवण, सत्य और तप--इन अर्थोमें प्रयुक्त होता है। ये सब बातें जिसके अंदर एक साथ निश्चित-रूपसे हों, उसीका नाम ब्रह्माने 'ऋषि” रखा है। गत्यर्थक “ऋष' धातुसे ही ('ऋषि' शब्दकी निष्पत्ति हुई है और आदिकालमें चूँकि यह ऋषिवर्ग स्वयं उत्पन्न होता है, इसीलिये इसकी “ऋषि” संज्ञा है।' ३. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जिस निर्गुण परमात्माको “परम ब्रह्म' कहते हैं, वे आपके ही स्वरूप हैं तथा आपका जो नित्यधाम है, वह भी सच्चिदानन्दमय दिव्य और आपसे अभिन्न होनेके कारण आपका ही स्वरूप है तथा आपके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपोंके श्रवण, मनन और कीर्तन आदि सबको सर्वथा परम पवित्र करनेवाले हैं; इसलिये आप “परम पवित्र” हैं। २. यहाँ “ऋषिगण' शब्दसे मार्कण्डेय, अंगिरा आदि समस्त ऋषियोंको समझना चाहिये। अपनी मान्यताके समर्थनमें अर्जुन उनके कथनका प्रमाण दे रहे हैं। अभिप्राय यह है कि वे लोग आपको सनातन -जनित्य एकरस रहनेवाले, क्षय-विनाशरहित, दिव्य--स्वत:प्रकाश और ज्ञानस्वरूप, सबके आदिदेव तथा अजन्मा--उत्पत्तिरूप विकारसे रहित और सर्वव्यापी बतलाते हैं। अतः आप “परम ब्रह्म', 'परम धाम' और “परम पवित्र' हैं--इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। परम सत्यवादी धर्ममूर्ति पितामह भीष्मजीने भी दुर्योधनको भगवान्‌ श्रीकृष्णका प्रभाव बतलाते हुए कहा है--“भगवान्‌ वासुदेव सब देवताओंके देवता और सबसे श्रेष्ठ हैं; ये ही धर्म हैं, धर्मज्ञ हैं, वरद हैं, सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं और ये ही कर्ता, कर्म और स्वयंप्रभु हैं। भूत, भविष्यत्‌, वर्तमान, संध्या, दिशाएँ, आकाश और सब नियमोंको इन्हीं जनार्दनने रचा है। इन महात्मा अविनाशी प्रभुने ऋषि, तप और जगत्‌की सृष्टि करनेवाले प्रजापतिको रचा। सब प्राणियोंके अग्रज संकर्षणको भी इन्होंने ही रचा। लोक जिनको “अनन्त” कहते हैं और जिन्होंने पहाड़ोसमेत सारी पृथ्वीको धारण कर रखा है, वे शेषनाग भी इन्हींसे उत्पन्न हैं; ये ही वाराह, नूसिंह और वामनका अवतार धारण करनेवाले हैं; ये ही सबके माता-पिता हैं, इनसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है; ये ही केशव परम तेजरूप हैं और सब लोगोंके पितामह हैं, मुनिगण इन्हें हृषीकेश कहते हैं, ये ही आचार्य, पितर और गुरु हैं। ये श्रीकृष्ण जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। भय प्राप्त होनेपर जो इन भगवान्‌ केशवके शरण जाता है और इनकी स्तुति करता है, वह मनुष्य परम सुखको प्राप्त होता है। जो लोग भगवान्‌ श्रीकृष्णकी शरणमें चले जाते हैं, वे कभी मोहको नहीं प्राप्त होते। महान्‌ भय (संकट)-में डूबे हुए लोगोंकी भी भगवान्‌ जनार्दन नित्य रक्षा करते हैं।' (महा०, भीष्म० अ० ६७)। 3. देवर्षिके लक्षण ये हैं-- न मम आम न कम न | देवलोकप्रतिष्ठाश्न ज्ञेया देवर्षय: शुभा: ।। देवर्षयस्तथान्ये च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम्‌ | भूतभव्यभवज्ज्ञानं सत्याभिव्याहतं तथा ।। सम्बुद्धास्तु स्वयं ये तु सम्बद्धा ये च वै स्‍्वयम्‌ | तपसेह प्रसिद्धा ये गर्भ यैश्व प्रणोदितम्‌ ।। मन्त्रव्याहारिणो ये च ऐश्वर्यात्‌ सर्वगाश्च ये । इत्येते ऋषिभिर्युक्ता देवद्विजनृपास्तु ये ।। (वायुपुराण ६१।८८, ९०, ९१, ९२) “जिनका देवलोकमें निवास है, उन्हें शुभ देवर्षि समझना चाहिये। इनके सिवा वैसे ही जो दूसरे और भी देवर्षि हैं, उनके लक्षण कहता हूँ। भूत, भविष्यत्‌ और वर्तमानका ज्ञान होना तथा सब प्रकारसे सत्य बोलना-देवर्षिका लक्षण है। जो स्वयं भलीभाँति ज्ञानको प्राप्त हैं तथा जो स्वयं अपनी इच्छासे ही संसारसे सम्बद्ध हैं, जो अपनी तपस्याके कारण इस संसारमें विख्यात हैं, जिन्होंने (प्रह्नमादादिको) गर्भमें ही उपदेश दिया है, जो मन्त्रोंके वक्ता हैं और ऐश्वर्य (सिद्धियों)-के बलसे सर्वत्र सब लोकोंमें बिना किसी बाधाके जा-आ सकते हैं और जो सदा ऋषियोंसे घिरे रहते हैं, वे देवता, ब्राह्मण और राजा--ये सभी देवर्षि हैं।' देवर्षि अनेकों हैं, जिनमेंसे कुछके नाम ये हैं-- देवर्षी धर्मपुत्रौ तु नरनारायणाचुभौ । बालखिल्या: क्रतो: पुत्रा: कर्दम: पुलहस्य तु ।। पर्वतो नारदश्चैव कश्यपस्यात्मजावुभौ । ऋषन्ति देवान्‌ यस्मात्ते तस्माद्‌ देवर्षय: स्मृता: ।। (वायुपुराण ६१।८३, ८४, ८५) “धर्मके दोनों पुत्र नर और नारायण, क्रतुके पुत्र बालखिल्य ऋषि, पुलहके कर्दम, पर्वत और नारद तथा कश्यपके दोनों ब्रह्मवादी पुत्र असित और वत्सल--ये चूँकि देवताओंको अधीन रख सकते हैं, इसलिये इन्हें 'देवर्षि' कहते हैं।' ३. देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास--ये चारों ही भगवानके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले, उनके महान्‌ प्रेमी भक्त और परम ज्ञानी महर्षि हैं। ये अपने कालके बहुत ही सम्मान्य तथा महान्‌ सत्यवादी महापुरुष माने जाते हैं, इसीसे इनके नाम खास तौरपर गिनाये गये हैं और भगवानकी महिमा तो ये नित्य ही गाया करते हैं। इनके जीवनका प्रधान कार्य है भगवान्‌की महिमाका ही विस्तार करना। महाभारतमें भी इनके तथा अन्यान्य ऋषि-महर्षियोंके भगवान्‌की महिमा गानेके कई प्रसंग आये हैं। २. इस कथनसे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि केवल उपर्युक्त ऋषिलोग ही कहते हैं, यह बात नहीं है; स्वयं आप भी मुझसे अपने अतुलनीय प्रभावकी बातें इस समय भी कह रहे हैं (गीता ४॥६ से ९ तक; ५॥। २९; ७।७ से १२ तक; ९।४ से ११ और १६ से १९ तक; तथा १०।२, ३, ८)। अतः मैं जो आपको साक्षात्‌ परमेश्वर समझता हूँ, यह ठीक ही है। 3. ब्रह्मा, विष्णु और महेश--इन तीनों शक्तियोंको क्रमश: “क', “अ” और 'ईश' (केश) कहते हैं और ये तीनों जिसके वपु यानी स्वरूप हों, उसे “केशव” कहते हैं। ४. गीताके चौथे अध्यायके आरम्भसे लेकर इस अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक भगवानने जो अपने गुण, प्रभाव, स्वरूप, महिमा, रहस्य और ऐश्वर्य आदिकी बातें कही हैं, जिनसे श्रीकृष्णका अपनेको साक्षात्‌ परमेश्वर स्वीकार करना सिद्ध होता है--उन समस्त वचनोंका संकेत करनेवाले “एतत्‌” और “यत्र' पद हैं तथा भगवान्‌ श्रीकृष्णको समस्त जगत्के हर्ता, कर्ता, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सबके आदि, सबके नियन्ता, सर्वान्तर्यामी, देवोंके भी देव, सच्चिदानन्दघन, साक्षात्‌ पूर्णब्रह्म परमात्मा समझना और उनके उपदेशको सत्य मानना तथा उसमें किंचिन्मात्र भी संदेह न करना “उन सब वचनोंको सत्य मानना” है। ५. विष्णुपुराणमें कहा है-- ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्वैव षण्णां भग इतीरणा ।। (६,७४) सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैरण्य--इन छहोंका नाम “भग' है। ये सब जिसमें हों, उसे भगवान्‌ कहते हैं।” वहीं यह भी कहा है-- उत्पत्ति प्रलयं चैवं भूतानामागतिं गतिम्‌ ॥ वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ।। (६

He said: “When I first undertook austerity with the wish to bring forth the many kinds of worlds, the Lord Himself manifested from my unbroken penance as four forms bearing the name ‘San’—Sanaka, Sanandana, Sanātana, and Sanatkumāra. In a former cosmic cycle, at the time of dissolution, the teaching of knowledge of the Self had perished in this world; these sages properly taught it again, and through that instruction the seers realized the truth of the Self within their own hearts.”

Verse 7

#फमा न () असडजतन- ६. 'प्रीयमाणाय” विशेषणका प्रयोग करके भगवानने यह दिखलाया है कि हे अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम है, मेरे वचनोंको तुम अमृततुल्य समझकर अत्यन्त श्रद्धा और प्रेमके साथ सुनते हो; इसीलिये मैं किसी प्रकारका संकोच न करके बिना पूछे भी तुम्हारे सामने अपने परम गोपनीय गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य बार-बार खोल रहा हूँ। इसमें तुम्हारा प्रेम ही कारण है। ३. इस अध्यायमें भगवानने अपने गुण, प्रभाव और तत्त्वका रहस्य समझानेके लिये जो उपदेश दिया है, वही “परम वचन' है और उसे फिरसे सुननेके लिये कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मेरी भक्तिका तत्त्व अत्यन्त ही गहन है; अतः उसे बार-बार सुनना परम आवश्यक समझकर बड़ी सावधानीके साथ श्रद्धा और प्रेमपूर्वक सुनना चाहिये। २. 'सुरगणा:” पद एकादश रुद्र, आठ वसु, बारह आदित्य, प्रजापति, उनचास मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्र आदि जितने भी शास्त्रीय देवताओंके समुदाय हैं--उन सबका वाचक है। ३. 'महर्षय:” पदसे यहाँ सप्त महर्षियोंको समझना चाहिये। ४. भगवान्‌का अपने अतुलनीय प्रभावसे जगत्‌का सृजन, पालन और संहार करनेके लिये ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रके रूपमें; दुष्टोके विनाश, धर्मके संस्थापन तथा नाना प्रकारकी लीलाओंके द्वारा जगत्‌के प्राणियोंके उद्धारके लिये श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य अवतारोंके रूपमें; भक्तोंको दर्शन देकर उन्हें कृतार्थ करनेके लिये उनके इच्छानुरूप नाना रूपोंमें तथा लीलावैचित्रयकी अनन्त धारा प्रवाहित करनेके लिये समस्त विश्वके रूपमें जो प्रकट होना है--उसीका वाचक यहाँ “प्रभव” शब्द है। उसे देवसमुदाय और महर्षिलोग नहीं जानते, इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मैं किस-किस समय किन-किन रूपोंमें किन-किन हेतुओंसे किस प्रकार प्रकट होता हूँ--इसके रहस्यको साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, अतीन्द्रिय विषयोंको समझनेमें समर्थ देवता और महर्षिलोग भी यथार्थरूपसे नहीं जानते। ५. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जिन देवता और महर्षियोंसे इस सारे जगत्‌की उत्पत्ति हुई है, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं; उनका निमित्त और उपादान कारण मैं ही हूँ और उनमें जो विद्या, बुद्धि, शक्ति, तेज आदि प्रभाव हैं--वे सब भी उन्हें मुझसे ही मिलते हैं। ६. भगवान्‌ अपनी योगमायासे नाना रूपोंमें प्रकट होते हुए भी अजन्मा हैं (गीता ४।६), अन्य जीवोंकी भाँति उनका जन्म नहीं होता, वे अपने भक्तोंको सुख देने और धर्मकी स्थापना करनेके लिये केवल जन्मधारणकी लीला किया करते हैं--इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक-ठीक समझ लेना तथा इसमें जरा भी संदेह न करना--यही “भगवान्‌को अजन्मा जानना” है तथा भगवान्‌ ही सबके आदि अर्थात्‌ महाकारण हैं, उनका आदि कोई नहीं है; वे नित्य हैं तथा सदासे हैं, अन्य पदार्थोकी भाँति उनका किसी कालविशेषसे आरम्भ नहीं हुआ है--इस बातको श्रद्धा और विश्वासके साथ ठीक-ठीक समझ लेना --“भगवान्‌को अनादि जानना' है। एवं जितने भी ईश्वरकोटिमें गिने जानेवाले इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति आदि लोकपाल हैं--भगवान्‌ उन सबके महान ईश्वर हैं; वे ही सबके नियन्ता, प्रेरक, कर्ता, हर्ता, सब प्रकारसे सबका भरण-पोषण और संरक्षण करनेवाले सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वर हैं--इस बातको श्रद्धापूर्वक संशयरहित ठीक-ठीक समझ लेना, “भगवान्‌को लोकोंका महान्‌ ईश्वर जानना” है। ७. कर्तव्य-अकर्तव्य, ग्राह्म-अग्राह्म और भले-बुरे आदिका निर्णय करके निश्चय करनेवाली जो वृत्ति है, उसे “बुद्धि कहते हैं। ८. किसी भी पदार्थको यथार्थ जान लेना 'ज्ञान' है; यहाँ 'ज्ञान' शब्द साधारण ज्ञानसे लेकर भगवानके स्वरूपज्ञानतक सभी प्रकारके ज्ञानका वाचक है। ९. भोगासक्त मनुष्योंको नित्य और सुखप्रद प्रतीत होनेवाले समस्त सांसारिक भोगोंको अनित्य, क्षणिक और दु:ःखमूलक समझकर उनमें मोहित न होना--यही “असम्मोह' है। १. किसी भी प्राणीको किसी भी समय किसी भी प्रकारसे मन, वाणी या शरीरके द्वारा जरा भी कष्ट न पहुँचानेके भावको अहिंसा" कहते हैं। २. सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, निन्दा-स्तुति, मान-अपमान, मित्र-शत्रु आदि जितने भी क्रिया, पदार्थ और घटना आदि विषमताके हेतु माने जाते हैं, उन सबमें निरन्तर राग-द्वेषरहित समबुद्धि रहनेके भावको “समता” कहते हैं। 3. जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसे प्रारब्धका भोग या भगवानका विधान समझकर सदा संतुष्ट रहनेके भावको "तुष्टि" कहते हैं। ४. बुरा चाहना, बुरा करना, धनादि हर लेना, अपमान करना, आघात पहुँचाना, कड़ी जबान कहना या गाली देना, निन्‍दा या चुगली करना, आग लगाना, विष देना, मार डालना और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षमें क्षति पहुँचाना आदि जितने भी अपराध हैं, इनमेंसे एक या अधिक किसी प्रकारका भी अपराध करनेवाला कोई भी प्राणी क्यों न हो, अपनेमें बदला लेनेका पूरा सामर्थ्य रहनेपर भी उससे उस अपराधका किसी प्रकार भी बदला लेनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर देना और उस अपराधके कारण उसे इस लोक या परलोकमें कोई भी दण्ड न मिले--ऐसा भाव होना “क्षमा' है। ५. इन्द्रिय और अन्त:करणद्वारा जो बात जिस रूपमें देखी, सुनी और अनुभव की गयी हो, ठीक उसी रूपमें दूसरेको समझानेके उद्देश्यसे हितकर प्रिय शब्दोंमें उसको प्रकट करना “सत्य' है। ६. 'सुख' शब्द यहाँ प्रिय (अनुकूल) वस्तुके संयोगसे और अप्रिय (प्रतिकूल)-के वियोगसे होनेवाले सब प्रकारके सुखोंका वाचक है। इसी प्रकार प्रियके वियोगसे और अप्रियके संयोगसे होनेवाले आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक--सब प्रकारके दु:खोंका वाचक यहाँ “दुःख” शब्द है। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि प्राणियोंके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले कष्टोंकी 'आधिभौतिक', अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूकम्प, वजपात और अकाल आदि दैवीप्रकोपसे होनेवाले कष्टोंको “आधिदैविक' और शरीर, इन्द्रिय तथा अन्त:करणमें किसी प्रकारके रोगसे होनेवाले कष्टोंको “आध्यात्मिक' दुःख कहते हैं। ७. सर्गकालमें समस्त चराचर जगतका उत्पन्न होना “भव” है, प्रलयकालमें उसका लीन हो जाना “अभाव' है। किसी प्रकारकी हानि या मृत्युके कारणको देखकर अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले भावका नाम “भय” है और सर्वत्र एक परमेश्वरको व्याप्त समझ लेनेसे अथवा अन्य किसी कारणसे भयका जो सर्वथा अभाव हो जाना है वह “अभय है। ८. स्वधर्म-पालनके लिये कष्ट सहन करना “तप है। ९. अपने स्वत्वको दूसरोंके हितके लिये वितरण करना “दान' है। १०. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि विभिन्न प्राणियोंके उनकी प्रकृतिके अनुसार उपर्युक्त प्रकारके जितने भी विभिन्न भाव होते हैं, वे सब मुझसे ही होते हैं, अर्थात्‌ वे सब मेरी ही सहायता, शक्ति और सत्तासे होते हैं। ३३. “चत्वार: पूर्वँ से सबसे पहले होनेवाले सनक, सननन्‍्दन, सनातन और सनत्कुमार--इन चारोंको लेना चाहिये। ये भी भगवानके ही स्वरूप हैं और ब्रह्माजीके तप करनेपर स्वेच्छासे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माजीने स्वयं कहा है-- तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे आदौ सनात्‌ स्वतपस: स चतुःसनो<भूत्‌ । प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं सम्यग्‌ जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन्‌ ।। (श्रीमद्भागवत २

Arjuna said: (This verse is a speaker-marker introducing Arjuna’s response in the dialogue.) In the ethical and narrative setting of the Bhīṣma Parva—on the brink of war—Arjuna’s words signal a shift from listening to questioning and moral reflection, as he engages Kṛṣṇa’s teaching to resolve doubt about duty, right action, and the path that leads to inner steadiness amid conflict.

Verse 10

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णाजुनसंवादमें विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, within the Mahabharata’s Bhishma Parva—specifically in the section known as the Bhagavad Gita Parva—the Upanishadic teaching called the Bhagavad Gita, which is Brahma-knowledge and a discipline of yoga, concludes here: the tenth chapter, titled “Vibhuti Yoga,” in the dialogue between Sri Krishna and Arjuna, is complete.

Verse 11

५१, ५२) इनमें शम्भु अर्थात्‌ शंकर सबके अधीश्वर (राजा) हैं तथा कल्याणप्रदाता और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये उन्हें भगवान्‌ने अपना स्वरूप कहा है। २. धर, ध्रुव, सोम, अह:, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास--इन आठोंको वसु कहते हैं-- धरो ध्रुवश्च सोमश्न अहश्वैवानिलोडनल: । प्रत्यूषश्न प्रभासश्न॒ वसवोषूष्टौ प्रकीर्तिता: ।। (महा०, आदि० ६६।१८) इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा हैं और देवताओंको हवि पहुँचानेवाले हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवानके मुख भी माने जाते हैं। इसीलिये अग्नि (पावक)-को भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. समस्त नक्षत्र सुमेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और सुमेरु पर्वत नक्षत्र और द्वीपोंका केन्द्र तथा सुवर्ण और रत्नोंका भण्डार माना जाता है तथा उसके शिखर अन्य पर्वतोंकी अपेक्षा ऊँचे हैं। इस प्रकार शिखरवाले पर्वतोंमें प्रधान होनेसे सुमेरको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. बृहस्पति देवराज इन्द्रके गुरु, देवताओंके कुलपुरोहित और विद्या-बुद्धिमें सर्वश्रेष्ठ हैं तथा संसारके समस्त पुरोहितोंमें मुख्य और अंगिरसोंके राजा माने गये हैं। इसलिये भगवान्‌ने उनको अपना स्वरूप कहा है। ५. स्कन्दका दूसरा नाम कार्तिकेय है। इनके छः: मुख और बारह हाथ हैं। ये महादेवजीके पुत्र और देवताओंके सेनापति हैं। कहीं-कहीं इन्हें अग्निके तेजसे तथा दक्षकन्या स्वाहाके द्वारा उत्पन्न माना गया है (महाभारत, वनपर्व २२३)। इनके सम्बन्धमें महाभारत और पुराणोंमें बड़ी ही विचित्र-विचित्र कथाएँ मिलती हैं। संसारके समस्त सेनापतियोंमें ये प्रधान हैं, इसीलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ६. महर्षि बहुत-से हैं, उनके लक्षण और उनमेंसे प्रधान दसके नाम ये हैं-- ईश्वरा: स्वयमुद्धूता मानसा ब्रह्मण: सुता: । यस्मान्न हन्यते मानैर्महान्‌ परिगत: पुर: ।। यस्मादृषन्ति ये धीरा महान्तं सर्वतो गुणै: । तस्मान्महर्षय: प्रोक्ता बुद्धेः परमदर्शिन: ।। भृगुर्मरीचिरत्रिश्व अंगिरा: पुलह: क्रतुः । मनुर्दक्षो वसिष्ठश्न॒ पुलस्त्यश्वेति ते दश ।। ब्रह्मणो मानसा होत उद्धूता: स्वयमी श्वरा: । प्रवर्तत ऋषेर्यस्मान्महांस्तस्मान्महर्षय: ।। (वायुपुराण ५९।८२-८३, ८९-९०) “ब्रह्माके ये मानस पुत्र ऐश्वर्यवान्‌ (सिद्धियोंसे सम्पन्न) एवं स्वयं उत्पन्न हैं। परिमाणसे जिसका हनन न हो (अर्थात्‌ जो अपरिमेय हो) और जो सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामने (प्रत्यक्ष) हो, वही महान्‌ है। जो बुद्धिके पार पहुँचे हुए (भगवत्प्राप्त) विज्ञजन गुणोंके द्वारा उस महान्‌ (परमेश्वर)-का सब ओरसे अवलम्बन करते हैं, वे इसी कारण (“महान्तम्‌ ऋषन्ति इति महर्षय:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार) महर्षि कहलाते हैं। भूगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य--ये दस महर्षि हैं। ये सब ब्रह्माके मनसे स्वयं उत्पन्न हुए हैं और ऐश्वर्यवान्‌ हैं। चूँकि ऋषि (ब्रह्माजी)-से इन ऋषियोंके रूपमें स्वयं महान्‌ (परमेश्वर) ही प्रकट हुए, इसलिये ये महर्षि कहलाये।” महर्षियोंमें भूगुजी मुख्य हैं। ये भगवानके भक्त, ज्ञानी और बड़े तेजस्वी हैं; इसीलिये इनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. किसी अर्थका बोध करानेवाले शब्दको 'गी:” (वाणी) कहते हैं और ओंकार (प्रणव)-को “एक अक्षर कहते हैं (गीता ८।१३)। जितने भी अर्थबोधक शब्द हैं, उन सबमें प्रणवकी प्रधानता है; क्योंकि “प्रणव" भगवानका नाम है (गीता १७।२३)। प्रणवके जपसे भगवानकी प्राप्ति होती है। नाम और नामीमें अभेद माना गया है। इसलिये भगवानने “प्रणव” को अपना स्वरूप बतलाया है। २. जपयज्ञमें हिंसाका सर्वधा अभाव है और जपयज्ञ भगवानका प्रत्यक्ष करानेवाला है। मनुस्मृतिमें भी जपयज्ञकी बहुत प्रशंसा की गयी है-- विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिग्गुणै: | उपांशु: स्पाच्छतगुण: साहस्रो मानस: स्मृत: ।। (२।८५) “विधियज्ञसे जपयज्ञ दसगुना, उपांशुजप सौगुना और मानसजप हजारगुना श्रेष्ठ कहा गया है।' इसलिये समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञकी प्रधानता है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवानने जपयज्ञको अपना स्वरूप बतलाया है। ३. स्थिर रहनेवालोंको स्थावर कहते हैं। जितने भी पहाड़ हैं, सब अचल होनेके कारण स्थावर हैं। उनमें हिमालय सर्वोत्तम है। वह परम पवित्र तपोभूमि है और मुक्तिमें सहायक है। भगवान्‌ नर और नारायण वहीं तपस्या कर चुके हैं। साथ ही, हिमालय सब पर्वतोंका राजा भी है। इसीलिये उसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. पीपलका वृक्ष समस्त वनस्पतियोंमें राजा और पूजनीय माना गया है। पुराणोंमें अश्वत्थका बड़ा माहात्म्य मिलता है। स्कन्दपुराणमें कहा है-- स एव विष्णुर्द्रम एव मूर्तो महात्मभि: सेवितपुण्यमूल: । यस्याश्रय: पापसहख्रहन्ता भवेन्नणां कामदुघो गुणाढ्य: ।। (नागर० २४७।४४) “यह वृक्ष मूर्तिमान्‌ श्रीविष्णुस्वरूप है; महात्मा पुरुष इस वृक्षके पुण्यमय मूलकी सेवा करते हैं। इसका गुणोंसे युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्योंके हजारों पापोंका नाश करनेवाला है।” इसलिये भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. देवर्षिके लक्षण इसी अध्यायके बारहवें, तेरहवें श्लोकोंकी टिप्पणीमें दिये गये हैं, उन्हें वहाँ पढ़ना चाहिये। ऐसे देवर्षियोंमें नारदजी सबसे श्रेष्ठ हैं। साथ ही वे भगवानके परम अनन्य भक्त, महान्‌ ज्ञानी और निपुण मन्त्रद्रष्टा हैं। इसीलिये नारदजीको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. गन्धर्व एक देवयोनिविशेष है; ये देवलोकमें गान, वाद्य और नाट्याभिनय किया करते हैं। स्वर्गमें ये सबसे सुन्दर और अत्यन्त रूपवान्‌ माने जाते हैं। “गुह्मक-लोक” से ऊपर और “विद्याधर-लोक' से नीचे इनका “गन्धर्व-लोक' है। देवता और पितरोंकी भाँति गन्धर्व भी दो प्रकारके होते हैं--मर्त्य और दिव्य। जो मनुष्य मरकर पुण्यबलसे गन्धर्वलोकको प्राप्त होते हैं, वे 'मर्त्य” हैं और जो कल्पके आरम्भसे ही गन्धर्व हैं, उन्हें “दिव्य” कहते हैं। दिव्य गन्धरवोंकी दो श्रेणियाँ हैं--'मौनेय” और “प्राधेय”। महर्षि कश्यपकी दो पत्नियोंके नाम थे--मुनि और प्राधा। इन्हींसे अधिकांश अप्सराओं और गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई। चित्ररथ दिव्य संगीतविद्याके पारदर्शी और अत्यन्त ही निपुण हैं। इसीसे भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. जो सर्व प्रकारकी स्थूल और सूक्ष्म जगत्‌की सिद्धियोंको प्राप्त हों तथा धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य आदि श्रेष्ठ गुणोंसे पूर्णतया सम्पन्न हों, उनको सिद्ध कहते हैं। ऐसे हजारों सिद्ध हैं, जिनमें भगवान्‌ कपिल सर्वप्रधान हैं। भगवान्‌ कपिल साक्षात्‌ ईश्वरके अवतार हैं। इसीलिये भगवानने समस्त सिद्धोंमें कपिल मुनिको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. बहुत-से हाथियोंमें जो श्रेष्ठ हो, उसे गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी ऐरावत हाथी, जो इन्द्रका वाहन है, सर्वश्रेष्ठ और “गज” जातिका राजा माना गया है। इसकी उत्पत्ति भी उच्चै:श्रवा घोड़ेंकी भाँति समुद्रमन्थनसे ही हुई थी। इसलिये इसको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. शास्त्रोक्त लक्षणोंसे युक्त धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाको पापोंसे हटाकर धर्ममें प्रवृत्त करता है और सबकी रक्षा करता है, इस कारण अन्य मनुष्योंसे राजा श्रेष्ठ माना गया है। ऐसे राजामें भगवान्‌की शक्ति साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा अधिक रहती है। इसीलिये भगवानने राजाको अपना स्वरूप कहा है। २. जितने भी शस्त्र हैं, उन सबमें वज्र अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वजमें दधीचि ऋषिके तपका तथा साक्षात्‌ भगवान्‌का तेज विराजमान है और उसे अमोघ माना गया है (श्रीमद्धागवत ६

This passage is an explanatory note on the ‘vibhūti’ teaching: the Lord points to the most eminent and beneficial representatives within each class—Śambhu (Śiva) among rulers and benefactors, Agni among the Vasus, Sumeru among mountains, Bṛhaspati among priests and teachers, Skanda among commanders, Bhṛgu among great seers, Praṇava (Oṁ) among words, japa among sacrifices, Himālaya among immovable beings, Aśvattha among trees, Nārada among divine sages, Citraratha among Gandharvas, Kapila among perfected beings, Airāvata among elephants, the righteous king among humans, and the thunderbolt among weapons. Ethically, the point is that excellence is not random: what most protects, uplifts, teaches, and leads others toward dharma is to be recognized as a manifestation of the divine presence in the world.

Verse 34

भीष्मपर्वणि तु चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय:,भीष्मपर्वमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

In the Bhīṣma Parva, the thirty-fourth chapter concludes here. (This is a colophon-style closing line marking the end of the chapter in the Gītā Press edition, rather than a spoken verse advancing the dialogue or moral teaching.)

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to live and act without becoming ethically and psychologically bound by pleasure-seeking (sattva), compulsive striving (rajas), or negligent inertia (tamas), especially under high-stakes duty contexts.

Recognize guṇas as operative conditions of prakṛti, cultivate discerning witnessing and equanimity, and use steady devotion and disciplined conduct to move beyond guṇic compulsion toward liberation.

A direct phalaśruti formula is not foregrounded; instead, the chapter states results: transcending guṇas frees one from birth-death-aging-sorrow and leads to brahma-bhāva, with Kṛṣṇa positioned as the foundation of brahman and enduring dharma.