Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas
५) “मैंने विविध प्रकारके लोकोंको उत्पन्न करनेकी इच्छासे जो सबसे पहले तप किया, उस मेरी अखण्डित तपस्यासे ही भगवान् स्वयं सनक, सननन््दन, सनातन और सनत्कुमार--इन चार “सन” नामवाले रूपोंमें प्रकट हुए और पूर्वकल्पमें प्रलयकालके समय जो आत्मतत्त्वके ज्ञानका प्रचार इस संसारमें नष्ट हो गया था, उसका इन्होंने भलीभाँति उपदेश किया, जिससे उन मुनियोंने अपने हृदयमें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार किया।' $. सप्तर्षियोंके लक्षण बतलाते हुए कहा गया है-- एतान् भावानधीयाना ये चैत ऋषयो मता: । सप्तैते सप्तभिश्नैव गुणै: सप्तर्षय: स्मृता: ।। दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरा दिव्यचक्षुष: । वृद्धा: प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्न ये ।। (वायुपुराण ६१।९३-९४) “तथा देवर्षियोंके इन (उपर्युक्त) भावोंका जो अध्ययन (स्मरण) करनेवाले हैं, वे ऋषि माने गये हैं; इन ऋषियोंमें जो दीर्घायु, मन्त्रकर्ता, ऐश्वर्यवान्, दिव्य-दृष्टियुक्त, गुण, विद्या और आयुमें वृद्ध, धर्मका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) करनेवाले और गोत्र चलानेवाले हैं--ऐसे सातों गुणोंसे युक्त सात ऋषियोंको ही सप्तर्षि कहते हैं।' इन्हींसे प्रजाका विस्तार होता है और धर्मकी व्यवस्था चलती है। यहाँ जिन सप्तर्षियोंका वर्णन है, उनको भगवानने “महर्षि! कहा है और उन्हें संकल्पसे उत्पन्न बतलाया है। इसलिये यहाँ उन्हींका लक्ष्य है, जो ऋषियोंसे भी उच्चस्तरके हैं। ऐसे सप्तर्षियोंका उल्लेख महाभारत-शान्तिपर्वमें मिलता है; इनके लिये साक्षात् परम पुरुष परमेश्वरने देवताओंसहित ब्रह्माजीसे कहा मरीचिरज्रिराश्षात्रि: पुलस्त्य: पुलह: क्रतुः | वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्व कल्पिता: । प्रवृत्तिधर्मिणश्रैव प्राजापत्ये च कल्पिता: ।। (महा०, शान्ति० ३४०।६९-७०) “मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ--ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं। ये सातों वेदके ज्ञाता हैं, इनको मैंने मुख्य वेदाचार्य बनाया है। ये प्रवृतिमार्गका संचालन करनेवाले हैं और (मेरे ही द्वारा) प्रजापतिके कर्ममें नियुक्त किये गये हैं।' इस कल्पके सर्वप्रथम स्वायम्भुव मन्वन्तरके सप्तर्षि यही हैं (हरिवंशण ७।८, ९)। अतएव यहाँ सप्तर्षियोंसे इन्हींका ग्रहण करना चाहिये। २. ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं, प्रत्येक मनुके अधिकारकालको “मन्वन्तर” कहते हैं। इकहत्तर चतुर्युगीसे कुछ अधिक कालका एक मन्वन्तर होता है। मानवी वर्षगणनाके हिसाबसे एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षसे और दिव्य-वर्षणणनाके हिसाबसे आठ लाख बावन हजार वर्षसे कुछ अधिक कालका होता है (विष्णुपुराण १।३)। सूर्यसिद्धान्तमें मन्वन्तर आदिका जो वर्णन है, उसके अनुसार इस प्रकार समझना चाहिये-- सौरमानसे ४३,२०,००० वर्षकी अथवा देवमानसे १२,००० वर्षकी एक चतुर्युगी होती है। इसीको महायुग कहते हैं। ऐसे इकहतर युगोंका एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरके अन्तमें सत्ययुगके मानकी अर्थात् १७,२८,००० वर्षकी संध्या होती है। मन्वन्तर बीतनेपर जब संध्या होती है, तब सारी पृथ्वी जलनमें डूब जाती है। प्रत्येक कल्पमें (ब्रह्माके एक दिनमें) चौदह मन्वन्तर अपनी-अपनी संध्याओंके मानके सहित होते हैं। इसके सिवा कल्पके आरम्भकालमें भी एक सत्ययुगके मानकालकी संध्या होती है। इस प्रकार एक कल्पके चौदह मनुओंमें ७१ चतुर्युगीके अतिरिक्त सत्ययुगके मानकी १५ संध्याएँ होती हैं। ७१ महायुगोंके मानसे १४ मनुओंमें ९९४ महायुग होते हैं और सत्ययुगके मानकी १५ संध्याओंका काल पूरा ६ महायुगोंके समान हो जाता है। दोनोंका योग मिलानेपर पूरे एक हजार महायुग या दिव्ययुग बीत जाते हैं। इस हिसाबसे निम्नलिखित अंकोंके द्वारा इसको समझिये-- सौरमान या मानव वर्ष देवमान या दिव्य वर्ष एक चतुर्युगी (महायुग या दिव्ययुग) ४३,२०,००० १२,००० इकहत्तर चतुर्युगी ३०,६७,२०,००० ८,५२,००० कल्पकी संधि १७,२८,००० ४,८०० मन्वन्तरकी चौदह संध्या २,४१,९२,००० ६७,२०० संधिसहित एक मन्वन्तर ३०,८४,४८,००० ८,५६,८०० चौदह संध्यासहित चौदह मन्वन्तर ४,३९,८२,७२,००० १,१९,९६,२०० कल्पकी संधिसहित चौदह मन्वन्तर या एक कल्प ४,३२,००,००,००० १,२०,००,००० ब्रह्माजीका दिन ही कल्प है, इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि है। इस अहोरात्रके मानसे ब्रह्माजीकी परमायु एक सौ वर्ष है। इसे “पर” कहते हैं। इस समय ब्रह्माजी अपनी आयुका आधा भाग अर्थात् एक परार्द्ध बिताकर दूसरे परार्द्धमें चल रहे हैं। यह उनके ५१ वें वर्षका प्रथम दिन या कल्प है। वर्तमान कल्पके आरम्भसे अबतक स्वायम्भुव आदि छ: मन्वन्तर अपनी-अपनी संध्याओंसहित बीत चुके हैं, कल्पकी संध्यासमेत सात संध्याएँ बीत चुकी हैं। वर्तमान सातवें वैवस्वत मन्वन्तरके २७चतुर्युग बीत चुके हैं। इस समय अठ्वराईसवें चतुर्युगके कलियुगका संध्याकाल चल रहा है (सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार, श्लोक १५ से २४ देखिये)। इस २०१३ वि० तक कलियुगके ५०५७ वर्ष बीते हैं। कलियुगके आरम्भमें ३६,००० वर्ष संध्याकालका मान होता है। इस हिसाबसे अभी कलियुगकी संध्याके ३०,९४३ सौर वर्ष बीतने बाकी हैं। प्रत्येक मन्वन्तरमें धर्मकी व्यवस्था और लोकरक्षणके लिये भिन्न-भिन्न सप्तर्षि होते हैं। एक मन्वन्तरके बीत जानेपर जब मनु बदल जाते हैं, तब उन्हींके साथ सप्तर्षि, देवता, इन्द्र और मनुपुत्र भी बदल जाते हैं। वर्तमान कल्पके मनुओंके नाम ये हैं--स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि। श्रीमद्भातावतके आठवें स्कन्दके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायोंमें इनका विस्तारसे वर्णन पढ़ना चाहिये। विभिन्न पुराणोंमें इनके नामभेद मिलते हैं। यहाँ ये नाम श्रीमद्भागवतके अनुसार दिये गये हैं। चौदह मनुओंका एक कल्प बीत जानेपर सब मनु भी बदल जाते हैं। ३. ये सभी भगवानमें श्रद्धा और प्रेम रखनेवाले हैं, यही भाव दिखलानेके लिये इनको मुझमें भाववाले बतलाया गया है तथा इनकी जो ब्रह्माजीसे उत्पत्ति होती है, वह वस्तुतः भगवानसे ही होती है; क्योंकि स्वयं भगवान् ही जगत्की रचनाके लिये ब्रह्माका रूप धारण करते हैं। अतएव ब्रह्माके मनसे उत्पन्न होनेवालोंको भगवान् “अपने मनसे उत्पन्न होनेवाले' कहें तो इसमें कोई विरोधकी बात नहीं है। २. भगवानकी जो अनन्यभक्ति है (गीता ११।५५), जिसे “अव्यभिचारिणी भक्ति” (गीता १३।१०) और “अव्यभिचारी भक्तियोग” (गीता १४।२६) भी कहते हैं; उस “अविचल भक्तियोग” का वाचक यहाँ “अविकम्पेन'” विशेषणके सहित 'योगेन” पद है और उसमें संलग्न रहना ही उससे युक्त हो जाना है। 3. इसी अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकोंमें भगवानने जिन बुद्धि आदि भावोंको और महर्षि आदिको अपनेसे उत्पन्न बतलाया है तथा गीताके सातवें अध्यायमें “जलमें मैं रस हूँ” (७।८) एवं नवें अध्यायमें “क्रतु मैं हूँ', यज्ञ मैं हूँ” (९५।१६) इत्यादि वाक्योंसे जिन-जिन पदार्थोंका, भावोंका और देवता आदिका वर्णन किया है--उन सबका वाचक “विभूति' शब्द है। ४. भगवान्की जो अलौकिक शक्ति है, जिसे देवता और महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जानते (गीता १०।२, ३); जिसके कारण स्वयं साच्चिक, राजस और तामस भावोंके अभिन्न-निमित्तोपादान कारण होनेपर भी भगवान् सदा उनसे न्यारे बने रहते हैं और यह कहा जाता है कि “न तो वे भाव भगवानमें हैं और न भगवान् ही उनमें हैं" (गीता ७१२); जिस शक्तिसे सम्पूर्ण जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार आदि समस्त कर्म करते हुए भगवान् सम्पूर्ण जगत्को नियममें चलाते हैं; जिसके कारण वे समस्त लोकोंके महान् ईश्वर, समस्त भूतोंके सुहृद, समस्त यज्ञादिके भोक्ता, सर्वाधार और सर्वशक्तिमान् हैं; जिस शक्तिसे भगवान् इस समस्त जगत्को अपने एक अंशमें धारण किये हुए हैं (गीता १०।४२) और युग-युगमें अपने इच्छानुसार विभिन्न कार्योंक लिये अनेक रूप धारण करते हैं तथा सब कुछ करते हुए भी समस्त कर्मोसे, सम्पूर्ण जगत्से एवं जन्मादि समस्त विकारोंसे सर्वथा निर्लेप रहते हैं और गीताके नवम अध्यायके पाँचवें श्लोकमें जिसको 'ऐश्वर्य योग” कहा गया है--उस अद्भुत शक्ति (प्रभाव)-का वाचक यहाँ 'योग' शब्द है। ५. इस प्रकार समस्त जगत् भगवान्की ही रचना है और सब उन्हींके एक अंशमें स्थित हैं। इसलिये जगत्में जो भी वस्तु शक्तिसम्पन्न प्रतीत हो, जहाँ भी कुछ विशेषता दिखलायी दे, उसे--अथवा समस्त जगत्को ही भगवानकी विभूति अर्थात् उन्हींका स्वरूप समझना एवं उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्को समस्त जगतके कर्ता-हर्ता, सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वर, सर्वाधार, परम दयालु, सबके सुहृद् और सर्वान्तर्यामी मानना --यही “भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जानना' है। ३. भगवान्के ही योगबलसे यह सृष्टिचक्र चल रहा है; उन्हींकी शासन-शक्तिसे सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और पृथ्वी आदि नियम-पूर्वक घूम रहे हैं; उन्हींके शासनसे समस्त प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार अच्छी- बुरी योनियोंमें जन्म धारण करके अपने-अपने कर्मोंका फल भोग रहे हैं--इस प्रकारसे भगवान्को सबका नियन्ता और प्रवर्तक समझना ही “सम्पूर्ण जगत् भगवानसे चेष्टा करता है” यह समझना है। २. उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्को सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, हर्ता और प्रवर्तक समझकर अगले श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे अतिशय श्रद्धा और प्रेमपूर्वक मन, बुद्धि और समस्त इन्द्रियोंद्वारा निरन्तर भगवान्का स्मरण और सेवन करना ही भगवानको निरन्तर भजना है। 3. भगवान्को ही अपना परम प्रेमी, परम सुहृद, परम आत्मीय, परम गति और परम प्रिय समझनेके कारण जिनका चित्त अनन्यभावसे भगवान्में लगा हुआ है (गीता ८।१४; ९।२२)। भगवानके सिवा किसी भी वस्तुमें जिनकी प्रीति, आसक्ति या रमणीय बुद्धि नहीं है; जो सदा-सर्वदा ही भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका चिन्तन करते रहते हैं और जो शास्त्रविधिके अनुसार कर्म करते हुए उठते- बैठते, सोते-जागते, चलते-फिरते, खाते-पीते, व्यवहारकालमें और ध्यानकालमें कभी क्षणमात्र भी भगवान्को नहीं भूलते, ऐसे नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले भक्तोंके लिये ही यहाँ भगवानने “मच्चित्ता:' विशेषणका प्रयोग किया है। ४. जिनका जीवन और इन्द्रियोंकी समस्त चेष्टाएँ केवल भगवानके ही लिये हैं; जिनको क्षणमात्रका भी भगवानका वियोग असहा है; जो भगवानके लिये ही प्राण धारण करते हैं; खाना-पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना आदि जितनी भी चेष्टाएँ हैं, उन सबमें जिनका अपना कुछ भी प्रयोजन नहीं रह गया है--जो सब कुछ भगवान्के लिये ही करते हैं, उनके लिये भगवानने “मद्गतप्राणा:” का प्रयोग किया है। ५. भगवानूमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले प्रेमी भक्तोंका जो अपने-अपने अनुभवके अनुसार भगवान्के गुण, प्रभाव, तत्त्व, लीला, माहात्म्य और रहस्यको परस्पर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे समझानेकी चेष्टा करना है --यही परस्पर भगवान्का बोध कराना है। ६. श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका कीर्तन और गायन करना तथा कथा-व्याख्यानादिद्वारा लोगोंमें प्रचार करना और उनकी स्तुति करना आदि सब भगवान्का कथन करना है। ७. प्रत्येक क्रिया करते हुए निरन्तर परम आनन्दका अनुभव करना ही “नित्य संतुष्ट रहना” है। इस प्रकार संतुष्ट रहनेवाले भक्तकी शान्ति, आनन्द और संतोषका कारण केवल भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूप आदिका श्रवण, मनन और कीर्तन तथा पठन-पाठन आदि ही होता है। सांसारिक वस्तुओंसे उसके आनन्द और संतोषका कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। ८. भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला, स्वरूप, तत्त्व और रहस्यका यथायोग्य श्रवण, मनन और कीर्तन करते हुए एवं उनकी रुचि, आज्ञा और संकेतके अनुसार केवल उनमें प्रेम होनेके लिये ही प्रत्येक क्रिया करते हुए, मनके द्वारा उनको सदा-सर्वदा प्रत्यक्षवत् अपने पास समझकर निरन्तर प्रेमपूर्वक उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप आदि क्रीड़ा करते रहना--यही भगवान्में निरन्तर रमण करना है। ३. इससे यह भाव दिखलाया है कि पूर्वश्लोकमें भगवानके जिन भक्तोंका वर्णन हुआ है, वे भोगोंकी कामनाके लिये भगवान्को भजनेवाले नहीं हैं, किंतु किसी प्रकारका भी फल न चाहकर केवल निष्काम अनन्य प्रेमभावपूर्वक ही भगवान्का, उस श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे, निरन्तर भजन करनेवाले हैं। २. भगवानका जो भक्तोंके अन्त:करणमें अपने प्रभाव और महत्त्वादिके रहस्यसहित निर्गुण-निराकार तत्त्वको तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण-निराकार और साकार तत्त्वको यथार्थरूपसे समझनेकी शक्ति प्रदान करना है--वही “बुद्धि (तत्त्वज्ञानरूप) योगका प्रदान करना” है। 3. पूर्वश्लोकमें जिसे बुद्धियोग कहा गया है; जिसके द्वारा प्रभाव और महिमा आदिके सहित निर्गुण- निराकारतत्त्वका तथा लीला, रहस्य, महत्त्व और प्रभाव आदिके सहित सगुण-निराकार और साकारतत्त्वका स्वरूप भलीभाँति जाना जाता है, ऐसे संशय, विपर्यय आदि दोषोंसे रहित “दिव्य बोध' का वाचक यहाँ 'भास्वता' विशेषणके सहित '“ज्ञानदीपेन” पद है। ४. अनादिसिद्ध अज्ञानसे उत्पन्न जो आवरणशक्ति है--जिसके कारण मनुष्य भगवानके गुण, प्रभाव और स्वरूपको यथार्थ नहीं जानता--उसको यहाँ “अज्ञानजनित अन्धकार' कहा है। “उसे मैं भक्तोंके अन्तःकरणमें स्थित हुआ नष्ट कर देता हूँ” भगवान्के इस कथनका अभिप्राय यह है कि मैं सबके हृदयदेशमें अन्तर्यामीरूपसे सदा-सर्वदा स्थित रहता हूँ, तो भी लोग मुझे अपनेमें स्थित नहीं मानते; इसी कारण मैं उनका अज्ञानजनित अन्धकार नाश नहीं कर सकता। परंतु मेरे प्रेमी भक्त मुझे अपना अन्तर्यामी समझते हुए पूर्वश्लोकोंमें कहे हुए प्रकारसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं, इस कारण उनके अज्ञानजनित अन्धकारका मैं सहज ही नाश कर देता हूँ। ५. ऋषीत्येष गतौ धातु: श्रुतौ सत्ये तपस्थथ । एतत् संनियतं यस्मिन् ब्रह्मणा स ऋषि: स्मृतः ।। गर्त्यर्थादृषतेर्धातोनमिनिर्वृत्तिरादित: । यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता स्मृता ।। (वायुपुराण ५९।७९, ८१) “ऋष” धातु गमन (ज्ञान), श्रवण, सत्य और तप--इन अर्थोमें प्रयुक्त होता है। ये सब बातें जिसके अंदर एक साथ निश्चित-रूपसे हों, उसीका नाम ब्रह्माने 'ऋषि” रखा है। गत्यर्थक “ऋष' धातुसे ही ('ऋषि' शब्दकी निष्पत्ति हुई है और आदिकालमें चूँकि यह ऋषिवर्ग स्वयं उत्पन्न होता है, इसीलिये इसकी “ऋषि” संज्ञा है।' ३. इस कथनसे अर्जुनने यह भाव दिखलाया है कि जिस निर्गुण परमात्माको “परम ब्रह्म' कहते हैं, वे आपके ही स्वरूप हैं तथा आपका जो नित्यधाम है, वह भी सच्चिदानन्दमय दिव्य और आपसे अभिन्न होनेके कारण आपका ही स्वरूप है तथा आपके नाम, गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपोंके श्रवण, मनन और कीर्तन आदि सबको सर्वथा परम पवित्र करनेवाले हैं; इसलिये आप “परम पवित्र” हैं। २. यहाँ “ऋषिगण' शब्दसे मार्कण्डेय, अंगिरा आदि समस्त ऋषियोंको समझना चाहिये। अपनी मान्यताके समर्थनमें अर्जुन उनके कथनका प्रमाण दे रहे हैं। अभिप्राय यह है कि वे लोग आपको सनातन -जनित्य एकरस रहनेवाले, क्षय-विनाशरहित, दिव्य--स्वत:प्रकाश और ज्ञानस्वरूप, सबके आदिदेव तथा अजन्मा--उत्पत्तिरूप विकारसे रहित और सर्वव्यापी बतलाते हैं। अतः आप “परम ब्रह्म', 'परम धाम' और “परम पवित्र' हैं--इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। परम सत्यवादी धर्ममूर्ति पितामह भीष्मजीने भी दुर्योधनको भगवान् श्रीकृष्णका प्रभाव बतलाते हुए कहा है--“भगवान् वासुदेव सब देवताओंके देवता और सबसे श्रेष्ठ हैं; ये ही धर्म हैं, धर्मज्ञ हैं, वरद हैं, सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं और ये ही कर्ता, कर्म और स्वयंप्रभु हैं। भूत, भविष्यत्, वर्तमान, संध्या, दिशाएँ, आकाश और सब नियमोंको इन्हीं जनार्दनने रचा है। इन महात्मा अविनाशी प्रभुने ऋषि, तप और जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतिको रचा। सब प्राणियोंके अग्रज संकर्षणको भी इन्होंने ही रचा। लोक जिनको “अनन्त” कहते हैं और जिन्होंने पहाड़ोसमेत सारी पृथ्वीको धारण कर रखा है, वे शेषनाग भी इन्हींसे उत्पन्न हैं; ये ही वाराह, नूसिंह और वामनका अवतार धारण करनेवाले हैं; ये ही सबके माता-पिता हैं, इनसे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है; ये ही केशव परम तेजरूप हैं और सब लोगोंके पितामह हैं, मुनिगण इन्हें हृषीकेश कहते हैं, ये ही आचार्य, पितर और गुरु हैं। ये श्रीकृष्ण जिसपर प्रसन्न होते हैं, उसे अक्षय लोककी प्राप्ति होती है। भय प्राप्त होनेपर जो इन भगवान् केशवके शरण जाता है और इनकी स्तुति करता है, वह मनुष्य परम सुखको प्राप्त होता है। जो लोग भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें चले जाते हैं, वे कभी मोहको नहीं प्राप्त होते। महान् भय (संकट)-में डूबे हुए लोगोंकी भी भगवान् जनार्दन नित्य रक्षा करते हैं।' (महा०, भीष्म० अ० ६७)। 3. देवर्षिके लक्षण ये हैं-- न मम आम न कम न | देवलोकप्रतिष्ठाश्न ज्ञेया देवर्षय: शुभा: ।। देवर्षयस्तथान्ये च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् | भूतभव्यभवज्ज्ञानं सत्याभिव्याहतं तथा ।। सम्बुद्धास्तु स्वयं ये तु सम्बद्धा ये च वै स््वयम् | तपसेह प्रसिद्धा ये गर्भ यैश्व प्रणोदितम् ।। मन्त्रव्याहारिणो ये च ऐश्वर्यात् सर्वगाश्च ये । इत्येते ऋषिभिर्युक्ता देवद्विजनृपास्तु ये ।। (वायुपुराण ६१।८८, ९०, ९१, ९२) “जिनका देवलोकमें निवास है, उन्हें शुभ देवर्षि समझना चाहिये। इनके सिवा वैसे ही जो दूसरे और भी देवर्षि हैं, उनके लक्षण कहता हूँ। भूत, भविष्यत् और वर्तमानका ज्ञान होना तथा सब प्रकारसे सत्य बोलना-देवर्षिका लक्षण है। जो स्वयं भलीभाँति ज्ञानको प्राप्त हैं तथा जो स्वयं अपनी इच्छासे ही संसारसे सम्बद्ध हैं, जो अपनी तपस्याके कारण इस संसारमें विख्यात हैं, जिन्होंने (प्रह्नमादादिको) गर्भमें ही उपदेश दिया है, जो मन्त्रोंके वक्ता हैं और ऐश्वर्य (सिद्धियों)-के बलसे सर्वत्र सब लोकोंमें बिना किसी बाधाके जा-आ सकते हैं और जो सदा ऋषियोंसे घिरे रहते हैं, वे देवता, ब्राह्मण और राजा--ये सभी देवर्षि हैं।' देवर्षि अनेकों हैं, जिनमेंसे कुछके नाम ये हैं-- देवर्षी धर्मपुत्रौ तु नरनारायणाचुभौ । बालखिल्या: क्रतो: पुत्रा: कर्दम: पुलहस्य तु ।। पर्वतो नारदश्चैव कश्यपस्यात्मजावुभौ । ऋषन्ति देवान् यस्मात्ते तस्माद् देवर्षय: स्मृता: ।। (वायुपुराण ६१।८३, ८४, ८५) “धर्मके दोनों पुत्र नर और नारायण, क्रतुके पुत्र बालखिल्य ऋषि, पुलहके कर्दम, पर्वत और नारद तथा कश्यपके दोनों ब्रह्मवादी पुत्र असित और वत्सल--ये चूँकि देवताओंको अधीन रख सकते हैं, इसलिये इन्हें 'देवर्षि' कहते हैं।' ३. देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास--ये चारों ही भगवानके यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले, उनके महान् प्रेमी भक्त और परम ज्ञानी महर्षि हैं। ये अपने कालके बहुत ही सम्मान्य तथा महान् सत्यवादी महापुरुष माने जाते हैं, इसीसे इनके नाम खास तौरपर गिनाये गये हैं और भगवानकी महिमा तो ये नित्य ही गाया करते हैं। इनके जीवनका प्रधान कार्य है भगवान्की महिमाका ही विस्तार करना। महाभारतमें भी इनके तथा अन्यान्य ऋषि-महर्षियोंके भगवान्की महिमा गानेके कई प्रसंग आये हैं। २. इस कथनसे अर्जुन यह भाव दिखलाते हैं कि केवल उपर्युक्त ऋषिलोग ही कहते हैं, यह बात नहीं है; स्वयं आप भी मुझसे अपने अतुलनीय प्रभावकी बातें इस समय भी कह रहे हैं (गीता ४॥६ से ९ तक; ५॥। २९; ७।७ से १२ तक; ९।४ से ११ और १६ से १९ तक; तथा १०।२, ३, ८)। अतः मैं जो आपको साक्षात् परमेश्वर समझता हूँ, यह ठीक ही है। 3. ब्रह्मा, विष्णु और महेश--इन तीनों शक्तियोंको क्रमश: “क', “अ” और 'ईश' (केश) कहते हैं और ये तीनों जिसके वपु यानी स्वरूप हों, उसे “केशव” कहते हैं। ४. गीताके चौथे अध्यायके आरम्भसे लेकर इस अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक भगवानने जो अपने गुण, प्रभाव, स्वरूप, महिमा, रहस्य और ऐश्वर्य आदिकी बातें कही हैं, जिनसे श्रीकृष्णका अपनेको साक्षात् परमेश्वर स्वीकार करना सिद्ध होता है--उन समस्त वचनोंका संकेत करनेवाले “एतत्” और “यत्र' पद हैं तथा भगवान् श्रीकृष्णको समस्त जगत्के हर्ता, कर्ता, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सबके आदि, सबके नियन्ता, सर्वान्तर्यामी, देवोंके भी देव, सच्चिदानन्दघन, साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा समझना और उनके उपदेशको सत्य मानना तथा उसमें किंचिन्मात्र भी संदेह न करना “उन सब वचनोंको सत्य मानना” है। ५. विष्णुपुराणमें कहा है-- ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्वैव षण्णां भग इतीरणा ।। (६,७४) सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैरण्य--इन छहोंका नाम “भग' है। ये सब जिसमें हों, उसे भगवान् कहते हैं।” वहीं यह भी कहा है-- उत्पत्ति प्रलयं चैवं भूतानामागतिं गतिम् ॥ वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ।। (६
mayā vividha-prakārān lokān utpādayituṁ kāmayamānena yaḥ prathamaṁ tapaḥ kṛtaḥ, tasya mama akhaṇḍita-tapasaiva bhagavān svayaṁ sanaka-sanandana-sanātana-sanatkumāra-iti caturṣu “san”-nāmaka-rūpeṣu prādurabhavat; pūrva-kalpe pralaya-kāle asmin saṁsāre naṣṭaḥ ya ātmātattva-jñāna-pracāraḥ, taṁ tair yathāvat upadiṣṭaṁ, yena te munayaḥ sva-hṛdaye ātmātattvasya sākṣātkāraṁ prāpuḥ.
He said: “When I first undertook austerity with the wish to bring forth the many kinds of worlds, the Lord Himself manifested from my unbroken penance as four forms bearing the name ‘San’—Sanaka, Sanandana, Sanātana, and Sanatkumāra. In a former cosmic cycle, at the time of dissolution, the teaching of knowledge of the Self had perished in this world; these sages properly taught it again, and through that instruction the seers realized the truth of the Self within their own hearts.”
अजुन उवाच
Spiritual knowledge can be lost across cosmic dissolutions, but it is restored through realized teachers; unwavering discipline (akhaṇḍita tapas) becomes the condition for divine manifestation and for the re-establishment of ātmātattva-jñāna, culminating in direct inner realization (sākṣātkāra).
A cosmogonic account is given: the speaker describes performing primal austerity to generate worlds, after which the Lord appears as the four ‘San’ sages (the Kumāras). They revive the lost teaching of Self-knowledge from a prior kalpa’s pralaya, enabling sages to realize the Self in their hearts.