विव्याध कुपितो यज्ञ निर्भयस्तु भवस्तदा । धनुषा बाणमुत्यज्य सघोषं विननाद च,प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान् शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया
Then Bhava, angered yet fearless, pierced the sacrifice with his arrows. Casting a shaft from his bow, he made a thunderous, resounding roar.
वायुदेव उवाच