
आकाशमेघवर्णनम् / Description of the Sky Filled with Rain-Clouds
Upa-parva: Āstīka-Upākhyāna (Serpent-sacrifice cycle within Ādi Parva)
In this chapter, the narrator Sūta describes a sudden, total overcasting of the sky by dense, dark cloud-masses (nīla-jīmūta-saṃghāta). The clouds release abundant rain accompanied by continuous thunder and lightning, producing an auditory and visual field of intensity. The sky is portrayed as compacted by the rain-bearing clouds and as if dancing with repeated wave-like sheets of rainfall. The earth becomes filled on all sides with water. The passage functions as an atmospheric tableau: it heightens the ritual-cosmic ambience of the surrounding narrative cycle and signals a moment of heightened potency, where natural phenomena mirror the narrative’s charged moral-ritual environment.
Chapter Arc: उग्रश्रवा सौति सुनाते हैं कि कद्रू और विनता के बीच उच्चैःश्रवा के वर्ण-विवाद से उपजा दांव अब निर्णायक घड़ी की ओर बढ़ रहा है—और नागगण अपनी माता कद्रू को जिताने हेतु गुप्त युक्ति रचते हैं। → नाग परस्पर ‘कर्तव्यम्’ का निश्चय कर लेते हैं: वे घोड़े की पूँछ में काले बाल बनकर लिपटेंगे ताकि पूँछ काली प्रतीत हो और कद्रू का पक्ष सत्य लगे। इसी बीच दोनों बहनें—दाक्षायणी कद्रू और विनता—आकाशमार्ग से समुद्र-तट की ओर बढ़ती हैं, जहाँ शर्त का निर्णय होना है। → समुद्र-दर्शन का विराट क्षण: वे उस अथाह, गर्जनशील, वायु-वेग से क्षोभित, मकरों और तिमिंगिलों से भरे, रत्न-निधान, वरुण-आलय और नाग-आवास—सरिताओं के स्वामी महासागर—को प्रत्यक्ष देखती हैं; लहरें नृत्य करती-सी उठती हैं और पाताल-ज्वाला-सी दीप्ति गहराइयों में चमकती प्रतीत होती है। → नागों की छल-योजना सफल होने की दिशा में स्थापित हो जाती है—वे पूँछ में ‘वाला इव’ स्थित हो चुके हैं; और कद्रू-विनता समुद्र के ‘परं पारं’ तक पहुँचकर शर्त के निर्णयन हेतु उपस्थित हो जाती हैं। → अब जब स्थान और छल दोनों तैयार हैं, क्या विनता सत्य के बल पर जीत पाएगी—या नागों की कपट-रचना उसे दासी-भाव में बाँध देगी?
Verse 1
अड-#-#रू- दाविशोद्ध्याय: नागोंद्वारा य४22505%0 प्ूछको काली बनाना; कद्भू और विनताका देखते हुए आगे बढ़ना सौतिरुवाच नागाश्च संविदं कृत्वा कर्तव्यमिति तद्बच: । नि:स्नेहा वै दहेन्माता असम्प्राप्तमनोरथा,उग्रश्रवाजी कहते हैं--महर्षियो! इधर नागोंने परस्पर विचार करके यह निश्चय किया कि “हमें माताकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। यदि इसका मनोरथ पूरा न होगा तो वह स्नेहभाव छोड़कर रोषपूर्वक हमें जला देगी। यदि इच्छा पूर्ण हो जानेसे प्रसन्न हो गयी तो वह भामिनी हमें अपने शापसे मुक्त कर सकती है; इसलिये हम निश्चय ही उस घोड़ेकी पूँछको काली कर देंगे”
Sauti said: The Nāgas, having conferred among themselves, resolved, “That command must be carried out.” For if their mother’s desire were not fulfilled, she—bereft of affection—might in anger burn them. But if, her wish accomplished, that passionate lady were pleased, she might release them from her curse; therefore they would surely make the horse’s tail black.
Verse 2
प्रसन्ना मोक्षयेदस्मांस्तस्माच्छापाच्च भामिनी । कृष्णं पुच्छ॑ करिष्यामस्तुरगस्य न संशय:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--महर्षियो! इधर नागोंने परस्पर विचार करके यह निश्चय किया कि “हमें माताकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। यदि इसका मनोरथ पूरा न होगा तो वह स्नेहभाव छोड़कर रोषपूर्वक हमें जला देगी। यदि इच्छा पूर्ण हो जानेसे प्रसन्न हो गयी तो वह भामिनी हमें अपने शापसे मुक्त कर सकती है; इसलिये हम निश्चय ही उस घोड़ेकी पूँछको काली कर देंगे”
Śaunaka said: “If she becomes pleased, that passionate lady may release us from her curse. Therefore, to avert her wrath and fulfill her command, we shall surely make the horse’s tail black—there is no doubt.”
Verse 3
तथा हि गत्वा ते तस्य पुच्छे वाला इव स्थिता: । एतस्मिन्नन्तरे ते तु सपत्न्यौं पणिते तदा,ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी एूँछमें लिपट गये। द्विजश्रेष्ठी इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्रके दूसरे पार जा पहुँचीं। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशभमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विक्षुब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिंगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था
Śaunaka said: “Accordingly, they went there and settled upon his tail like hairs, clinging to it. Meanwhile, the two co-wives—having staked their wager—reaffirmed their agreed condition and, delighted, proceeded onward.”
Verse 4
ततस्ते पणितं कृत्वा भगिन्यौ द्विजसत्तम । जग्मतुः परया प्रीत्या परं पारं महोदधे:,ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी एूँछमें लिपट गये। द्विजश्रेष्ठी इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्रके दूसरे पार जा पहुँचीं। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशभमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विक्षुब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिंगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था
Śaunaka said: “Then, O best of the twice-born, having settled their wager, the two sisters set out with great delight and reached the farther shore of the mighty ocean.”
Verse 5
कद्रश्न विनता चैव दाक्षायण्यौ विहायसा । आलोकयन्त्यावक्षोभ्यं समुद्र निधिमम्भसाम्,ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी एूँछमें लिपट गये। द्विजश्रेष्ठी इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्रके दूसरे पार जा पहुँचीं। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशभमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विक्षुब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिंगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था
Śaunaka said: “Kadru and Vinatā—both daughters of Dakṣa—moved through the sky, gazing upon the ocean, the inexhaustible treasury of waters, whose depths are said to be unagitated.”
Verse 6
वायुनातीव सहसा क्षोभ्यमाणं महास्वनम् | तिमिंगिलसमाकीर्ण मकरैरावृतं तथा,ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी एूँछमें लिपट गये। द्विजश्रेष्ठी इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्रके दूसरे पार जा पहुँचीं। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशभमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विक्षुब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिंगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था
Śaunaka said: “The ocean, struck by exceedingly powerful winds, was suddenly churned into turmoil, roaring with a tremendous sound. It was crowded with timaṅgila sea-monsters and likewise covered all around with makaras, making it appear fearsome and hard to approach.”
Verse 7
संयुतं बहुसाहस्रै: सत्त्वै्नानाविधैरपि । घोरैर्घोरमनाधुष्यं गम्भीरमतिभैरवम्,ऐसा विचार करके वे वहाँ गये और काले रंगके बाल बनकर उसकी एूँछमें लिपट गये। द्विजश्रेष्ठी इसी बीचमें बाजी लगाकर आयी हुई दोनों सौतें और सगी बहनें पुनः अपनी शर्तको दुहराकर बड़ी प्रसन्नताके साथ समुद्रके दूसरे पार जा पहुँचीं। दक्षकुमारी कद्रू और विनता आकाशभमार्गसे अक्षोभ्य जलनिधि समुद्रको देखती हुई आगे बढ़ीं। वह महासागर अत्यन्त प्रबल वायुके थपेड़े खाकर सहसा विक्षुब्ध हो रहा था। उससे बड़े जोरकी गर्जना होती थी। तिमिंगिल और मगरमच्छ आदि जलजन्तु उसमें सब ओर व्याप्त थे। नाना प्रकारके भयंकर जन्तु सहस्रोंकी संख्यामें उसके भीतर निवास करते थे। इन सबके कारण वह अत्यन्त घोर और दुर्धर्ष जान पड़ता था तथा गहरा होनेके साथ ही अत्यन्त भयंकर था
Śaunaka said: “It was filled with many thousands of creatures of every kind—terrifying, fiercely dreadful, unassailable, deep, and exceedingly fearsome.”
Verse 8
आकर ं सर्वरत्नानामालयं वरुणस्यथ च । नागानामालयं चापि सुरम्यं सरितां पतिम्,नदियोंका वह स्वामी सब प्रकारके रत्नोंकी खान, वरुणका निवासस्थान तथा नागोंका सुरम्य गृह था
Śaunaka said: “It was a mine of every kind of jewel; it was also the abode of Varuṇa, and a delightful dwelling of the Nāgas—indeed, the lord and master of rivers.”
Verse 9
पातालज्वलनावासमसुराणां तथा55लयम् । भयंकराणां सत्त्वानां पपसो निधिमव्ययम्,वह पातालव्यापी बड़वानलका आश्रय, असुरोंके छिपनेका स्थान, भयंकर जन्तुओंका घर, अनन्त जलका भण्डार और अविनाशी था
Śaunaka said: “It was the abode of the blazing fire in the netherworld; likewise a refuge for the Asuras. It was the dwelling of terrifying beings, and an inexhaustible, imperishable reservoir of waters.”
Verse 10
शुभ्र॑ दिव्यममर्त्यानाममृतस्याकरं परम् । अप्रमेयमचिन्त्यं च सुपुण्यजलसम्मितम्,वह शुभ्र, दिव्य, अमरोंके अमृतका उत्तम उत्पत्ति-स्थान, अप्रमेय, अचिन्त्य तथा परम पवित्र जलसे परिपूर्ण था
Śaunaka said: “It was radiant and celestial—an unsurpassed source of nectar for the deathless ones. It was immeasurable and beyond thought, and it was filled with supremely holy waters.”
Verse 11
महानदीभिर्बलद्वीभिस्तत्र तत्र सहस्रश: । आपूर्यमाणमत्यर्थ नृत्यन्तमिव चोर्मिभि:,बहुत-सी बड़ी-बड़ी नदियाँ सहस्रोंकी संख्यामें आकर उसमें यत्र-तत्र मिलतीं और उसे अधिकाधिक भरती रहती थीं। वह भुजाओंके समान ऊँची लहरोंको ऊपर उठाये नृत्य-सा कर रहा था
Śaunaka describes a vast body of water being fed from every side: countless great rivers, along with powerful streams and channels, flowed in from place to place and kept filling it more and more. Swelling with force, it seemed to dance as its waves rose high like uplifted arms—an image of nature’s overwhelming energy and ceaseless motion within the ordered world.
Verse 12
इत्येवं तरलतरोरमिंसंकुलं त॑ गम्भीरं विकसितमम्बरप्रकाशम् | पातालज्वलनशिखाविदीपिताडूं गर्जन्तं द्रतमभिजग्मतुस्ततस्ते,इस प्रकार अत्यन्त तरल तरंगोंसे व्याप्त, आकाशके समान स्वच्छ, बड़वानलकी शिखाओंसे उद्धासित, गम्भीर, विकसित और निरन्तर गर्जन करनेवाले महासागरको देखती हुई वे दोनों बहनें तुरंत आगे बढ़ गयीं
Śaunaka said: “Thus, beholding the great ocean—crowded with exceedingly restless waves, clear and sky-bright, deep, wide-spread, lit up by the blazing tongues of the submarine fire, and continually roaring—those two sisters at once hastened forward toward it.”
Verse 22
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे समुद्रदर्शन॑ नाम द्वाविंशोडध्याय:
Thus ends the twenty-second chapter of the Ādi Parva of the Śrī Mahābhārata, within the Āstīka section, in the Sauparṇa episode, entitled “The Vision of the Ocean.”
No explicit dharma-sankat is argued in these verses; the chapter primarily provides a descriptive, atmospheric interlude that supports the surrounding ritual-ethical narrative by heightening a sense of portent and intensity.
The passage models the epic technique of reading nature as meaningful context: environmental magnitude can function as narrative pedagogy, preparing the audience to interpret subsequent human choices within a broader moral-cosmic frame.
No phalaśruti appears in this excerpt; its significance is structural—serving as a scene-setting unit that reinforces the epic’s linkage between ritual action, narrative momentum, and cosmic atmosphere.