
Book 10, Adhyāya 12: Aśvatthāmā’s Request for the Cakra and the Brahmaśiras Context
Upa-parva: Aśvatthāmā–Kṛṣṇa Saṃvāda (Divine Weapon Request Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that after a key departure, Kṛṣṇa addresses Yudhiṣṭhira regarding Bhīma’s distressed state and the need for vigilance. The narration then turns to the Brahmaśiras astra: Droṇa’s instruction to his son emphasizes non-deployment among humans even in extreme danger, alongside an appraisal of the son’s instability. The account shifts to Dvārakā, where Aśvatthāmā—honored among the Vṛṣṇis—approaches Kṛṣṇa privately and claims parity in receiving the Brahmaśiras lineage, requesting in exchange Kṛṣṇa’s cakra as a war-winning instrument. Kṛṣṇa offers alternative weapons but sets a practical test: Aśvatthāmā attempts to lift or move the cakra with both hands and full effort, fails, and withdraws dejected. Kṛṣṇa then articulates the unique standing of Arjuna (Gāṇḍīva-bearer, Śiva’s approver) and notes that even close kin (e.g., Pradyumna, Balarāma) never requested such an incomparable weapon. The chapter closes by characterizing Aśvatthāmā as volatile and knowledgeable of Brahmaśiras, motivating protective vigilance toward Bhīma.
Chapter Arc: रात्रि के संहार के बाद भी शोक शांत नहीं होता—पाण्डवों में विशेषतः भीमसेन पुत्र-शोक से उन्मत्त होकर अकेले ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामा का पीछा करते हैं, और श्रीकृष्ण उसकी चपलता व क्रूरता को देखकर सावधान करते हैं। → भीम का आवेग बढ़ता जाता है; वह अश्वत्थामा को पकड़ने/उठाने/हिलाने तक का प्रयत्न करता है, पर द्रोणपुत्र अपनी दुष्ट बुद्धि और अस्त्र-ज्ञान के बल पर बच निकलने की चेष्टा करता है। कृष्ण संकेत करते हैं कि यह साधारण शत्रु नहीं—इसके पास ब्रह्मशिर (ब्रह्मास्त्र-सम) विद्या है, अतः वृकोदर को ‘रक्ष्य’ रहना चाहिए। → अश्वत्थामा, पराजय-आशंका और उन्माद में, अपने अंतिम आश्रय—अत्यन्त भयावह दिव्यास्त्र—की ओर झुकता है; उसके भीतर की क्रूरता और चपलता निर्णायक रूप से प्रकट होती है, और पाण्डव-पक्ष पर महाविनाश का खतरा छा जाता है। → भीम का प्रत्यक्ष बल-प्रयास निष्फल पड़ता है; अश्वत्थामा अवसर पाकर रथ, घोड़े और विविध रत्नादि समेटकर हटता/भागता है—पर उसका हटना शांति नहीं, बल्कि और बड़े अनर्थ की भूमिका बनता है। → कृष्ण की चेतावनी के साथ अध्याय का अंत इस आशंका पर टिकता है कि क्रूर, चपल और ब्रह्मशिर-विद्या-धारी अश्वत्थामा अब कौन-सा विनाशकारी उपाय करेगा।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ई “लोक मिलाकर कुल ३१ ह “लोक हैं।) भी हा +ज (2) आमने द्वादशोड् ध्याय: श्रीकृष्णका अश्वत्थामाकी चपलता एवं क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्र माँगनेकी बात सुनाते हुए उससे भीमसेनकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना वैशम्पायन उवाच तस्मिन् प्रयाते दुर्धर्षे यदूनामृषभस्तत: । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्ष: कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! दुर्धर्ष वीर भीमसेनके चले जानेपर यदुकुलतिलक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिस्से कहा--
Vaiśampāyana sprach: Als der unbezwingbare Bhīmasena fortgegangen war, wandte sich Kṛṣṇa—der Vornehmste unter den Yādavas, lotusäugig—an Yudhiṣṭhira, den Sohn Kuntīs. Die Erzählung wechselt vom Getriebe des Schlachtfeldes zur verantwortlichen Mahnung: Kṛṣṇa bereitet sich darauf vor, den König zu schützender Tat und zu Selbstzucht zu führen, mitten im moralischen Chaos nach dem nächtlichen Gemetzel.
Verse 2
एष पाण्डव ते भ्राता पुत्रशोकपरायण: । जिघांसुद्रौणिमाक्रन्दे एक एवाभिधावति,'पाण्डुनन्दन! ये आपके भाई भीमसेन पुत्रशोकमें मग्न होकर युद्धमें द्रोणकुमारके वधकी इच्छासे अकेले ही उसपर धावा कर रहे हैं
Vaiśampāyana sagte: „Dieser Bruder von dir, o Pāṇḍava, ganz vom Schmerz um seinen Sohn überwältigt, stürzt allein in rasender Wut voran—schreiend, während er läuft—entschlossen, Drauṇi (Aśvatthāmā) zu töten.“ Der Vers zeigt, wie persönlicher Verlust selbst einen gerechten Krieger zu einsamer, rachsüchtiger Tat treiben kann.
Verse 3
भीम: प्रियस्ते सर्वेभ्यो भ्रातृभ्यो भरतर्षभ । त॑ कृच्छुगतमद्य त्वं कस्मान्नाभ्युपपद्यसे
Vaiśampāyana sagte: „O Stier unter den Bhāratas, Bhīma ist dir lieber als alle deine Brüder. Da er nun in Not geraten ist, warum eilst du ihm nicht zu Hilfe?“
Verse 4
“भरतश्रेष्ठ) भीमसेन आपको समस्त भाइयोंसे अधिक प्रिय हैं; किंतु आज वे संकटमें पड़ गये हैं। फिर आप उनकी सहायताके लिये जाते क्यों नहीं हैं? ।। यत् तदाचष्ट पुत्राय द्रोण: परपुरञ्जय: । अस्त्रं ब्रहद्मशिरो नाम दहेत पृथिवीमपि,'शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले द्रोणाचार्यने अपने पुत्रको जिस ब्रह्मशिर नामक अस्त्रका उपदेश दिया है, वह समस्त भूमण्डलको भी दग्ध कर सकता है
Vaiśampāyana sagte: „O Bester der Bhāratas! Bhīmasena ist dir lieber als alle deine Brüder, und doch ist er heute in Gefahr geraten. Warum gehst du ihm nicht zu Hilfe? Jene Waffe, die Droṇa—Bezwinger feindlicher Festungen—seinem Sohn lehrte, das Geschoss namens Brahmaśiras, vermag sogar die Erde selbst zu verbrennen.“
Verse 5
तन्महात्मा महा भाग: केतु: सर्वधनुष्मताम् । प्रत्यपादयदाचार्य: प्रीयमाणो धनंजयम्,“सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सिरमौर महाभाग महात्मा द्रोणाचार्यने प्रसन्न होकर वह अस्त्र पहले अर्जुनको दिया था
Vaiśampāyana sagte: Jener großherzige, hochbegnadete Lehrer—berühmt als der Erste unter allen Bogenschützen—übertrug, zufrieden gestimmt, diese Waffe feierlich an Dhanañjaya (Arjuna). Der Augenblick betont das ethische Gewicht der Gunst des Meisters: Meisterschaft ist nicht bloß Können, sondern ein anvertrautes Gut, verliehen durch Disziplin, Würdigkeit und die Zustimmung des Guru.
Verse 6
त॑ पुत्रो5प्पेक एवैनमन्वयाचदमर्षण: । ततः प्रोवाच पुत्राय नातिदहृष्टमना इव,“अश्वत्थामा इसे सहन न कर सका। वह उनका एकलौता पुत्र था; अतः उसने भी अपने पितासे उसी अस्त्रके लिये प्रार्थना की। तब आचार्यने अपने पुत्रको उस अस्त्रका उपदेश कर दिया; किंतु इससे उनका मन अधिक प्रसन्न नहीं था
Vaiśampāyana sprach: Da bat auch sein einziger Sohn, der es nicht ertragen konnte, um eben jene Waffe. Daraufhin unterwies der Lehrer seinen Sohn in diesem Geschoss; doch sein Herz schien darüber nicht sehr erfreut—als deutete er auf die moralische Last und die Gefahr hin, eine so zerstörerische Macht weiterzugeben, selbst an das eigene Kind.
Verse 7
विदितं चापल॑ं ह्यासीदात्मजस्य दुरात्मन: । सर्वधर्मविदाचार्य: सोडन्वशात् स्वसुतं ततः,उन्हें अपने दुरात्मा पुत्रकी चपलता ज्ञात थी; अतः सब धर्मोके ज्ञाता आचार्यने अपने पुत्रको इस प्रकार शिक्षा दी--
Vaiśampāyana sprach: Der Lehrer kannte bereits die Unbeständigkeit und das verirrte Wesen seines eigenen, bös gesinnten Sohnes. Darum unterwies der Präzeptor, der alle Dharma kannte, seinen Sohn entsprechend—um ihn durch rechten Rat und Zucht zu zügeln.
Verse 8
परमापदगतेनापि न सम तात त्वया रणे । इदमस्त्रं प्रयोक्तव्यं मानुषेषु विशेषत:,“बेटा! बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी तुम्हें रणभूमिमें विशेषतः मनुष्योंपर इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये”
Vaiśampāyana sprach: „Mein Sohn! Selbst wenn du in die äußerste Not getrieben wirst, darfst du diese Waffe im Kampf nicht einsetzen. Vor allem ist sie nicht gegen Menschen zu gebrauchen.“
Verse 9
इत्युक्तवान् गुरु: पुत्र द्रोण: पश्चादथोक्तवान् । न त्वं जातु सतां मार्गे स्थातेति पुरुषर्षभ,“नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर गुरु द्रोण पुनः: उससे बोले--“बेटा! मुझे संदेह है कि तुम कभी सत्पुरुषोंके मार्गपर स्थिर नहीं रहोगे”
Vaiśampāyana sprach: Nachdem der Lehrer Droṇa dies zu seinem Sohn gesagt hatte, sprach er weiter: „O Stier unter den Menschen, ich glaube nicht, dass du jemals fest auf dem Weg der Guten stehen wirst.“
Verse 10
स तदाज्ञाय दुष्टात्मा पितुर्वचनमप्रियम् । निराश: सर्वकल्याणै: शोकात् पर्यचरन्महीम्,'पिताके इस अप्रिय वचनको सुन और समझकर दृष्टात्मा द्रोणपुत्र सब प्रकारके कल्याणकी आशा छोड़ बैठा और बड़े शोकसे पृथ्वीपर विचरने लगा
Als er das unerfreuliche Wort seines Vaters begriffen hatte, gab der bösseelige Sohn Droṇas jede Hoffnung auf Heil und Glück preis und wanderte, von Kummer überwältigt, über die Erde.
Verse 11
ततस्तदा कुरुश्रेष्ठ वनस्थे त्वयि भारत । अवसद् द्वारकामेत्य वृष्णिश्रि: परमार्चित:
Vaiśampāyana sprach: „Dann, o Bester der Kurus, während du, o Bhārata, im Wald verweiltest, kam der hochgeehrte Glanz der Vṛṣṇis nach Dvārakā und geriet in Verfall.“
Verse 12
“'भरतनन्दन! कुरुश्रेष्ठी] तदनन्तर जब तुम वनमें रहते थे, उन्हीं दिनों अश्वत्थामा द्वारकामें आकर रहने लगा। वहाँ वृष्णिवंशियोंने उसका बड़ा सत्कार किया ।। स कदाचित् समुद्रान्ते वसन् द्वारवतीमनु । एक एक॑ समागम्य मामुवाच हसन्निव,“एक दिन द्वारकामें समुद्रके तटपर रहते समय उसने अकेले ही मुझ अकेलेके पास आकर हँसते हुए-से कहा-- इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्िरकृष्णसंवादे द्वादशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वनें युधिष्ठिर और श्रीकृष्णका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
Vaiśampāyana sprach: „O Freude der Bhāratas, Bester unter den Kurus—danach, in der Zeit, da du im Wald lebtest, kam Aśvatthāmā nach Dvārakā und nahm dort Wohnung. Die Vṛṣṇis empfingen ihn mit großen Ehren. Einst, als er am Meeresufer nahe Dvāravatī weilte, trat er allein zu mir und sprach, als lächle er…“
Verse 13
यत् तदुग्रं तप: कृष्ण चरन् सत्यपराक्रम: । अगस्त्याद् भारताचार्य: प्रत्यपद्यत मे पिता,“दशार्हनन्दन! श्रीकृष्ण! भरतवंशके आचार्य मेरे सत्यपराक्रमी पिताने उग्र तपस्या करके महर्षि अगस्त्यसे जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह देवताओं और गन्धर्वोद्वारा सम्मानित अस्त्र इस समय जैसा मेरे पिताके पास है, वैसा ही मेरे पास भी है; अतः यदुश्रेष्ठ! आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये”
Vaiśampāyana sprach: „O Kṛṣṇa! Mein Vater—ein Ācārya aus dem Geschlecht der Bhāratas, standhaft in der Wahrheit und mächtig an Tapferkeit—übte furchtbare Askese und erlangte vom Weisen Agastya das göttliche Brahmāstra. Diese Waffe, von Göttern und Gandharvas verehrt, ist heute bei mir, wie sie einst bei meinem Vater war. Darum, o Bester der Yadus, nimm von mir dieses himmlische Geschoss an und gewähre mir dafür deine Waffe—den Diskus Cakra, der die Feinde auf dem Schlachtfeld vernichtet.“
Verse 14
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम देवगन्धर्वपूजितम् । तदद्य मयि दाशार्ह यथा पितरि मे तथा,“दशार्हनन्दन! श्रीकृष्ण! भरतवंशके आचार्य मेरे सत्यपराक्रमी पिताने उग्र तपस्या करके महर्षि अगस्त्यसे जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह देवताओं और गन्धर्वोद्वारा सम्मानित अस्त्र इस समय जैसा मेरे पिताके पास है, वैसा ही मेरे पास भी है; अतः यदुश्रेष्ठ! आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये”
Vaiśampāyana sprach: „O Dāśārha, die Waffe namens Brahmaśiras, von Göttern und Gandharvas verehrt, ist heute bei mir, wie sie bei meinem Vater war. Darum, o Bester der Yadus, nimm von mir dieses göttliche Geschoss und gewähre mir dafür deinen Diskus, den Cakra, der die Feinde in der Schlacht vernichtet.“
Verse 15
अस्मत्तस्तदुपादाय दिव्यमस्त्रं यदूत्तम | ममात्यस्त्रं प्रयच्छ त्वं चक्रं रिपुहणं रणे,“दशार्हनन्दन! श्रीकृष्ण! भरतवंशके आचार्य मेरे सत्यपराक्रमी पिताने उग्र तपस्या करके महर्षि अगस्त्यसे जो ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया था, वह देवताओं और गन्धर्वोद्वारा सम्मानित अस्त्र इस समय जैसा मेरे पिताके पास है, वैसा ही मेरे पास भी है; अतः यदुश्रेष्ठ! आप मुझसे वह दिव्य अस्त्र लेकर रणभूमिमें शत्रुओंका नाश करनेवाला अपना चक्र नामक अस्त्र मुझे दे दीजिये”
Vaiśampāyana sprach: „Nimm von mir jene höchste göttliche Waffe, o Bester der Yadus; und gib mir dafür deine vornehmste Waffe—den Diskus, der die Feinde in der Schlacht erschlägt.“
Verse 16
स राजन् प्रीयमाणेन मयाप्युक्त: कृताज्जलिः । याचमान: प्रयत्नेन मत्तो<5स्त्रं भरतर्षभ,“भरतश्रेष्ठ) वह हाथ जोड़कर बड़े प्रयत्नके द्वारा मुझसे अस्त्रकी याचना कर रहा था, तब मैंने भी प्रसन्नतापूर्वक ही उससे कहा--
Vaiśaṃpāyana sprach: „O König, jener Mann stand mit ehrfürchtig gefalteten Händen da und bat mich mit allem Ernst um eine Waffe. Von seiner Haltung und seinem Vorsatz angetan, redete auch ich ihm wohlwollend zu.“
Verse 17
देवदानवगन्धर्वमनुष्यपतगोरगा: । न समा मम वीर्यस्य शतांशेनापि पिण्डिता:,“ब्रह्मन! देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, पक्षी और नाग--ये सब मिलकर मेरे पराक्रमके सौवें अंशकी भी समानता नहीं कर सकते
Vaiśaṃpāyana sprach: „O Brahmane, selbst wenn Götter, Dämonen, Gandharvas, Menschen, Vögel und Schlangen sich alle zu einem Ganzen vereinten, reichten sie nicht einmal an den hundertsten Teil meiner Kraft heran.“
Verse 18
इदं धनुरियं शक्तिरिदं चक्रमियं गदा | यद्यदिच्छसि चेदस्त्र॑ मत्तस्तत् तद् ददामि ते,“यह मेरा धनुष है, यह शक्ति है, यह चक्र है और यह गदा है। तुम जो-जो अस्त्र मुझसे लेना चाहते हो, वही वह तुम्हें दिये देता हूँ
Vaiśaṃpāyana sprach: „Hier ist mein Bogen; hier ist der Speer; hier ist der Diskus; und hier ist die Keule. Welche Waffe du auch von mir nehmen willst — jede einzelne gewähre ich dir.“
Verse 19
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपरवनें अश्वत्थामाके वधके लिये भीमसेनका प्रस्थानविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,यच्छकनोषि समुद्यन्तुं प्रयोक्तुमपि वा रणे । तद् गृहाण विनास्त्रेण यन्मे दातुमभीप्ससि “तुम मुझे जो अस्त्र देना चाहते हो, उसे दिये बिना ही रणभूमिमें मेरे जिस आयुधको उठा अथवा चला सको, उसे ही ले लो'
„Welche Waffe du zu heben vermagst, ja selbst im Kampf zu führen, die nimm — ohne dass ich sie dir förmlich als Wurfwaffe zu verleihen brauche. Nimm aus eigener Kraft die Rüstung und Waffen, die du vorgibst, von mir empfangen zu wollen.“
Verse 20
स सुनाभं सहस्रारं वजनाभमयस्मयम् । वत्रे चक्रं महाभागो मत्त: स्पर्धन्मया सह,“तब उस महाभागने मेरे साथ स्पर्धा रखते हुए मुझसे मेरा वह लोहमय चक्र माँगा, जिसकी सुन्दर नाभिमें वज्र लगा हुआ है तथा जो एक सहसखत्र अरोंसे सुशोभित होता है!
Vaiśaṃpāyana sprach: „Da verlangte jener erhabene Mann, im Geist des Wettstreits mit mir, von mir meinen eisernen Diskus — schön an der Nabe, mit einem Vajra im Zentrum und geschmückt mit tausend Speichen.“
Verse 21
“मैंने भी कह दिया--'ले लो चक्र," मेरे इतना कहते ही उसने सहसा उछलकर बायें हाथसे चक्रको पकड़ लिया
Vaiśampāyana sprach: „Auch ich sagte: ‚Nimm den Diskus.‘ Kaum hatte ich diese Worte ausgesprochen, sprang er sogleich auf und ergriff den Diskus mit der linken Hand.“
Verse 22
न चैनमशकत् स्थानात् संचालयितुमप्युत । अथैनं दक्षिणेनापि गृहीतुमुपचक्रमे,“परंतु वह उसे अपनी जगहसे हिला भी न सका। तब उसने उसे दाहिने हाथसे उठानेका प्रयत्न आरम्भ किया
Doch er vermochte es nicht, auch nur im Geringsten von seinem Platz zu bewegen. Da begann er, es auch mit der rechten Hand zu fassen und emporzuheben zu versuchen.
Verse 23
गृहाण चक्रमित्युक्तो मया तु तदनन्तरम् | जग्राहोत्पत्य सहसा चक्रं सवब्येन पाणिना,सर्वयत्नबलेनापि गृह्नन्नेवमिदं तत: । ततः सर्वबलेनापि यदैनं॑ न शशाक ह 'सारा प्रयत्त और सारी शक्ति लगाकर भी जब उसे पकड़कर उठा अथवा हिला न सका, तब द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। भारत! यत्न करके थक जानेपर वह उसे लेनेकी चेष्टासे निवृत्त हो गया
Vaiśampāyana sprach: Als ich zu ihm sagte: „Nimm den Diskus“, sprang er sogleich auf und ergriff das Rad mit der linken Hand. Doch selbst bei größter Anstrengung und mit all seiner Kraft vermochte er es weder zu heben noch zu bewegen. Als er, trotz Aufbietung seiner ganzen Stärke, es dennoch nicht an sich nehmen konnte, wurde Droṇas Sohn innerlich von Kummer ergriffen; und, von seinen Versuchen erschöpft, ließ er ab von dem Vorhaben, es fortzutragen.
Verse 24
उद्यन्तुं वा चालयितु द्रौणि: परमदुर्मना: । कृत्वा यत्नं परिश्रान्त: स न्यवर्तत भारत,'सारा प्रयत्त और सारी शक्ति लगाकर भी जब उसे पकड़कर उठा अथवा हिला न सका, तब द्रोणकुमार मन-ही-मन बहुत दुःखी हो गया। भारत! यत्न करके थक जानेपर वह उसे लेनेकी चेष्टासे निवृत्त हो गया
Droṇi, von tiefem Missmut erfüllt, mühte sich, es zu heben oder zu bewegen; doch, von der Anstrengung erschöpft, o Bhārata, trat er zurück.
Verse 25
निवृत्तमनसं तस्मादभिप्रायाद् विचेतसम् | अहमामन्त्र्य संविग्नमश्व॒त्थामानमन्रुवम्,“जब उस संकल्पसे उसका मन हट गया और वह दु:ःखसे अचेत एवं उद्विग्न हो गया, तब मैंने अश्वत्थामाको बुलाकर पूछा--
Als sein Sinn sich von jenem Vorhaben abwandte und er verstört wurde — von Kummer und Unruhe überwältigt —, ließ ich den erschütterten Aśvatthāmā rufen und fragte ihn —
Verse 26
य: सदैव मनुष्येषु प्रमाणं परमं गत: । गाण्डीवधन्वा श्वेताश्व: कपिप्रवरकेतन:
Der, der unter den Menschen stets den höchsten Maßstab an Autorität und Vortrefflichkeit erreicht hatte—Arjuna, Träger des Gāṇḍīva-Bogens, Lenker der weißen Rosse, und der, dessen Banner den erhabensten der Affen trug—wurde so in Erinnerung gerufen und als das höchste Vorbild in der Menschenwelt erkannt.
Verse 27
यः साक्षाद् देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् । बन्द्धयुद्धे पराजिष्णुस्तोषयामास शड्करम्
Vaiśampāyana sprach: Der, der, obgleich er in einem gebundenen und geregelten Zweikampf (bound and regulated combat) unterliegen konnte, Śaṅkara—Śiva, den Herrn der Götter, den Blaukehligen, den Gemahl Umās—unmittelbar zu erfreuen vermochte. Der Vers betont, dass selbst in der harten Arena des Krieges Ehrfurcht und Hingabe an das Göttliche eine Gnade gewinnen können, die bloßen Waffenerfolg übersteigt.
Verse 28
यस्मात् प्रियतरो नास्ति ममान्य: पुरुषो भुवि । नादेयं यस्य मे किज्चिदपि दारा: सुतास्तथा
Vaiśampāyana sprach: „Für mich gibt es auf dieser Erde keinen Mann, der mir lieber wäre als er. Es gibt nichts von dem, was mir gehört, das ich ihm nicht gäbe—meinen Besitz, ja selbst meine Frau und meine Söhne dazu.“
Verse 29
तेनापि सुह्दा ब्रह्मन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा । नोक्तपूर्वमिदं वाक््यं यत् त्वं मामभिभाषसे
Nicht einmal jener teure Freund—Pārtha, dessen Taten von keiner Niedrigkeit befleckt waren—hatte je zuvor solche Worte gesprochen. Und doch redest du mich nun so an, o Brāhmaṇa, als wäre eine derartige Beschuldigung angemessen.
Verse 30
“ब्रह्म! जो मनुष्य समाजमें सदा ही परम प्रामाणिक समझे जाते हैं, जिनके पास गाण्डीव धनुष और श्वेत घोड़े हैं, जिनकी ध्वजापर श्रेष्ठ वानर विराजमान होता है, जिन्होंने बन्द्रयुद्धमें साक्षात् देवदेवेश्वर नीलकण्ठ उमा-वल्लभ भगवान् शंकरको पराजित करनेका साहस करके उन्हें संतुष्ट किया था, इस भूमण्डलमें मुझे जिनसे बढ़कर परम प्रिय दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जिनके लिये मेरे पास स्त्री, पुत्र आदि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो देने योग्य न हो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले मेरे उस प्रिय सुहृद् कुन्तीकुमार अर्जुनने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही थी, जो आज तुम मुझसे कह रहे हो ।। ब्रह्मचर्य महद् घोरें तीर्त्वा द्वादशवार्षिकम् | हिमवत्पाश्वमास्थाय यो मया तपसार्जित:
«O Brāhmaṇa! Jener, der unter den Menschen stets als höchster Maßstab der Autorität gilt—der Träger des Gāṇḍīva-Bogens und der weißen Rosse, dessen Banner den erhabensten der Affen zeigt; jener, der in einem gebundenen Kampf (bound combat) es wagte, Śaṅkara selbst—Śiva mit der blauen Kehle, Gemahl Umās—herauszufordern und ihn zu befriedigen; jener, dem für mich auf dieser Erde keiner an Liebwert gleichkommt, und um dessentwillen es nichts gibt—nicht einmal Frau und Söhne—was ich nicht zu geben bereit wäre; selbst mein teurer Freund Arjuna, Kuntīs Sohn, der große Taten mühelos vollbringt, hat niemals zuvor so gesprochen, wie du heute zu mir sprichst. Und nachdem ich ein großes und strenges Gelübde des Brahmacarya (brahmacarya) zwölf Jahre lang vollendet und am Hang des Himālaya Wohnung genommen hatte, erlangte ich durch meine Tapas (tapas, Askese) den, von dem hier die Rede ist.»
Verse 31
समानव्रतचारिण्यां रुक्मिण्यां योडन्वजायत । सनत्कुमारस्तेजस्वी प्रद्युम्नो नाम मे सुत:
Vaiśampāyana sprach: „Von Rukmiṇī, die dieselben Gelübde und dieselbe Zucht übte, wurde ein strahlender Sohn geboren — Sanatkumāra (in Menschengestalt) — mit Namen Pradyumna, mein Sohn.“
Verse 32
तेनाप्येतन््महद् दिव्यं चक्रमप्रतिमं रणे । न प्रार्थितमभून्मूढ यदिदं प्रार्थितं त्वया
Selbst er hat jenes große, göttliche Wurfrad, im Kampf ohnegleichen, niemals erbeten. Du Tor — und doch ist es genau das, wonach du verlangst.
Verse 33
“मूढ ब्राह्मण! मैंने बारह वर्षोंतक अत्यन्त घोर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके हिमालयकी घाटीमें रहकर बड़ी भारी तपस्याके द्वारा जिसे प्राप्त किया था, मेरे समान व्रतका पालन करनेवाली रुक्मिणीदेवीके गर्भसे जिसका जन्म हुआ है, जिसके रूपमें साक्षात् तेजस्वी सनत्कुमारने ही मेरे यहाँ अवतार लिया है, वह प्रद्युम्न मेरा प्रिय पुत्र है। परंतु रणभूमिमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, मेरे इस परम दिव्य चक्रको कभी उस प्रद्युम्नने भी नहीं माँगा था, जिसकी आज तुमने माँग की है ।। रामेणातिबलेनैतन्नोक्तपूर्व कदाचन । न गदेन न साम्बेन यदिदं प्रार्थितं त्वया,“अत्यन्त बलशाली बलरामजीने भी पहले कभी ऐसी बात नहीं कही है। जिसे तुमने माँगा है, उसे गद और साम्बने भी कभी लेनेकी इच्छा नहीं की
„Du törichter Brahmane! Nachdem ich zwölf Jahre lang ein überaus strenges Gelübde des Brahmacarya gehalten und in den Tälern des Himalaya geweilt hatte, erlangte ich durch große Askese den Sohn, der aus dem Schoß der Königin Rukmiṇī geboren wurde — sie selbst in den Gelübden so standhaft wie ich —, in dessen Gestalt der strahlende Sanatkumāra gleichsam in mein Haus herabgestiegen ist. Dieser Pradyumna ist mein geliebter Sohn. Und doch hat selbst er — auf dem Schlachtfeld ohnegleichen — mich niemals um dieses höchst göttliche Wurfrad gebeten, um das du heute bittest. Selbst der überaus starke Balarāma hat niemals zuvor eine solche Bitte ausgesprochen; auch Gada und Sāmba haben nie begehrt, wonach du verlangst.“
Verse 34
द्वारकावासिभिश्नान्यर्वष्ण्यन्धकमहारथै: । नोक्तपूर्वमिदं जातु यदिदं प्रार्थितं त्वया,“द्वारकामें निवास करनेवाले जो अन्य वृष्णि तथा अन्धकवंशके महारथी हैं, उन्होंने भी कभी मेरे सामने ऐसा प्रस्ताव नहीं किया था, जैसा कि तुमने इस चक्रको माँगते हुए किया है
„Selbst die anderen Mahārathas aus den Geschlechtern der Vṛṣṇis und Andhakas, die in Dvārakā wohnen, haben mir niemals eine solche Bitte vorgetragen — wie du, indem du dieses Wurfrad verlangst.“
Verse 35
भारताचार्यपुत्रस्त्वं मानित: सर्वयादवै: । चक्रेण रथिनां श्रेष्ठ क॑ नु तात युयुत्ससे,“तात! रथियोंमें श्रेष्ठ! तुम तो भरतकुलके आचार्यके पुत्र हो। सम्पूर्ण यादवोंने तुम्हारा बड़ा सम्मान किया है। फिर बताओ तो सही, इस चक्रके द्वारा तुम किसके साथ युद्ध करना चाहते हो?”
Vaiśampāyana sprach: „Mein Sohn! Du bist der Sohn des Lehrmeisters des Bharata-Geschlechts, und alle Yādavas haben dich geehrt. O Bester der Wagenkämpfer, sage mir: Gegen wen willst du nun mit diesem Wurfrad kämpfen?“
Verse 36
एवमुक्तो मया द्रौणिमामिदं प्रत्युवाच ह । प्रयुज्य भवते पूजां योत्स्ये कृष्ण त्ववा सह
So von mir angesprochen, erwiderte Drauṇi: „Nachdem ich dir die gebührende Ehre erwiesen habe, o Kṛṣṇa, werde ich an deiner Seite kämpfen.“
Verse 37
प्रार्थितं ते मया चक्रं देवदानवपूजितम् । अजेय: स्यामिति विभो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
Vaiśampāyana sprach: „Ich flehte dich um jenen Diskus an, den Götter wie Dānavas verehren, in dem Gedanken: ‚O Herr, möge ich unbezwingbar werden.‘ Dies sage ich dir in Wahrheit.“
Verse 38
“जब मैंने इस तरह पूछा, तब द्रोणकुमारने मुझे इस प्रकार उत्तर दिया--'श्रीकृष्ण! मैं आपकी पूजा करके फिर आपके ही साथ युद्ध करूँगा। प्रभो! मैं यह सच कहता हूँ कि मैंने इस देव-दानवपूजित चक्रको आपसे इसीलिये माँगा था कि इसे पाकर अजेय हो जाऊँ ।। त्वत्तो5हं दुर्लभ॑ काममनवाप्यैव केशव । प्रतियास्यामि गोविन्द शिवेनाभिवदस्व माम्,किंतु केशव! अब मैं अपनी इस दुर्लभ कामनाको आपसे प्राप्त किये बिना ही लौट जाऊँगा। गोविन्द! आप मुझसे केवल इतना कह दें कि “तेरा कल्याण हो”
Vaiśampāyana sprach: „Als ich ihn so befragte, antwortete mir der Sohn Droṇas: ‚O Keśava, ohne von dir jene seltene Gabe zu erlangen, nach der ich verlange, werde ich dennoch zurückkehren. Govinda, gewähre mir wenigstens dies: sprich mich mit den Worten an: „Heil und Gedeihen sei dir.“‘“
Verse 39
एतत् सुभीम॑ भीमानामृषभेण त्वया धृतम् | चक्रमप्रतिचक्रेण भुवि नान्योडभिपद्यते,“यह चक्र अत्यन्त भयंकर है और आप भी भयानक वीरोंके शिरोमणि हैं। आपके किसी विरोधीके पास ऐसा चक्र नहीं है। आपने ही इसे धारण कर रखा है। इस भूतलपर दूसरा कोई पुरुष इसे नहीं उठा सकता”
„Dieser Diskus ist überaus furchterregend, und du bist der Vornehmste unter den furchtbaren Helden. Keiner deiner Gegner besitzt einen solchen Diskus; du allein trägst ihn. Auf dieser Erde gibt es keinen zweiten Mann, der ihn zu heben vermöchte.“
Verse 40
एतावदुक््त्वा द्रौणिर्मा युग्यानश्वान् धनानि च । आदायोपययोौ काले रत्नानि विविधानि च,“मुझसे इतना ही कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा रथमें जोतने योग्य घोड़े, धन तथा नाना प्रकारके रत्न लेकर वहाँसे यथासमय लौट गया
Vaiśampāyana sprach: „Nachdem er nur dies gesagt hatte, brach Drauṇi, Aśvatthāman, zur rechten Zeit auf und nahm Pferde mit, die sich zum Anschirren an den Wagen eigneten, dazu Reichtümer und mancherlei Edelsteine.“
Verse 41
स संरम्भी दुरात्मा च चपल: क्रूर एव च । वेद चास्त्रं ब्रह्मशिरस्तस्माद् रक्ष्यो वृकोदर:,“वह क्रोधी, दुष्टात्मा, चपल और क्रूर है। साथ ही उसे ब्रह्मास्त्रका भी ज्ञान है; अतः उससे भीमसेनकी रक्षा करनी चाहिये”
Vaiśampāyana sprach: „Er ist jäh im Zorn, im Herzen verderbt, wankelmütig und wahrlich grausam. Zudem kennt er die Waffe namens Brahmaśiras; darum muss Vṛkodara (Bhīma) sorgfältig vor ihm geschützt werden.“
The dilemma is whether grief and strategic insecurity justify seeking or deploying catastrophic weapons; the text frames such pursuit as requiring discipline and ethical eligibility rather than emotional impulse.
Power is not merely possessed but governed: divine instruments and knowledge demand restraint, and inability (practical and moral) functions as a safeguard against destabilizing escalation.
No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary is implicit in the narrative design—demonstrating that the epic’s moral economy constrains weapon access through qualification, lineage, and demonstrated capability.