
Adhyāya 168: Arjuna’s counters to māyā-rains and the onset of darkness (Nivātakavaca engagement)
Upa-parva: Nivātakavaca-yuddha (Arjuna’s engagement with the Nivātakavacas)
Arjuna reports a sequence of escalating, environment-based assaults: a massive stone-rain (aśmavarṣa) that presses in from all sides, which he pulverizes with Indra-empowered arrows. As the stone fragments fall like sparks, the encounter shifts to an intense water-rain of thick torrents that obscure space and orientation; Arjuna then deploys a drying/absorbing divine weapon (viśoṣaṇa-astra) taught by Indra to neutralize the deluge. The Dānavas answer by projecting further māyā—fire and wind—which Arjuna counters with the water-weapon (salilāstra) and a mountain/rock-weapon (śaila-mahāstra) to check the gale. A compounded, fear-inducing ‘rain’ of dreadful astras follows, culminating in dense darkness that disorients horses and causes Mātali to lose control and drop his golden goad. Mātali, frightened and cognitively overwhelmed, recalls having witnessed earlier cosmic battles (including Vṛtra and Śambara conflicts) yet claims never to have experienced such a condition, interpreting it as an exceptional, near-apocalyptic scenario. Arjuna steadies himself, reassures Mātali, and releases a delusive counter-māyā (mohanī astra-māyā) for the benefit of the gods. Despite momentary restoration of light, the Dānavas repeatedly reassert concealment; Arjuna notes that enemies vanish under māyā, and he targets openings when they present themselves, continuing the engagement amid intermittent visibility.
Chapter Arc: अर्जुन अपनी तपस्या-यात्रा और स्वर्ग-प्रवास से लौटकर युधिष्ठिर के सम्मुख आता है; प्रणाम करते ही धर्मराज का हर्ष गद्गद हो उठता है और वे पूछ बैठते हैं—स्वर्ग में समय कैसे बीता, इन्द्र को कैसे तुष्ट किया, और दिव्यास्त्र कैसे प्राप्त हुए? → अर्जुन क्रमशः अपने अनुभवों का वृत्तांत सुनाता है—किरात-वेषधारी शंकर का रहस्योद्घाटन, फिर दिव्य-स्वरूप में महेश्वर का प्रकट होना, और वह क्षण जब देवाधिदेव स्वयं सामने खड़े होकर कहते हैं: ‘तुष्टोऽस्मि… जो मनोगत हो, मांगो।’ साथ ही अस्त्र-विद्या की भयावह मर्यादा भी उद्घाटित होती है—अल्प-शक्ति वाले पर प्रयोग करने से यह समस्त जगत को दग्ध कर सकती है। → भगवान् वृषभध्वज (उमा सहित) अर्जुन को प्रत्यक्ष वर देते हैं—पाशुपत (रौद्र) महास्त्र का प्रदान, तथा धनुष और अक्षय बाणों से भरे तरकस आदि दिव्य आयुधों का सौंपा जाना; साथ ही कठोर चेतावनी कि इसका प्रयोग केवल प्रतिघात/निवारण और परम-आवश्यकता में ही हो। → अर्जुन का तप, शौर्य और संयम देव-स्वीकृति पाता है; युधिष्ठिर को यह आश्वासन मिलता है कि पाण्डवों के पास अब ऐसे अस्त्र हैं जो महाविपत्ति में भी रक्षा कर सकते हैं—पर उनकी शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा है। → पाशुपतास्त्र का प्राप्त होना भविष्य के महासंघर्ष की छाया डालता है—अब प्रश्न यह रह जाता है कि धर्म की मर्यादा में रहते हुए, कब और किस सीमा तक इन अस्त्रों का उपयोग होगा।
Verse 1
/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं) हि >> [हुक माप आप८ सप्तषष्ट्यांधेकशततमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! শক্র (ইন্দ্র) যেমন এসেছিলেন তেমনই চলে গেলে, ভ্রাতৃগণের সঙ্গে এবং কৃষ্ণা দ্রৌপদীর সঙ্গে মিলিত হয়ে বীভৎসু অর্জুন ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরকে প্রণাম করে সম্মান জানাল।
Verse 2
अभिवादयमान त॑ मूर्ध्न्युपाप्राय पाण्डवम् । हर्षगद्गदया वाचा प्रद्ृष्टो$र्जुनमब्रवीत्
বৈশম্পায়ন বললেন— পাণ্ডুনন্দন অর্জুনকে প্রণাম করতে দেখে যুধিষ্ঠির আনন্দে আপ্লুত হলেন। তিনি তাকে কাছে টেনে নিয়ে স্নেহভরে তার মস্তক শুঁকে, হর্ষে গদ্গদ কণ্ঠে অর্জুনকে বললেন।
Verse 3
कथमर्जुन कालो<यं स्वर्गे व्यतिगतस्तव । कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्न तोषित:
বৈশম্পায়ন বললেন— “অর্জুন! স্বর্গে তোমার এই সময় কীভাবে কেটেছে? তুমি কীভাবে দিব্যাস্ত্র লাভ করলে, আর দেবরাজ ইন্দ্রকে কোন উপায়ে সন্তুষ্ট করলে?”
Verse 4
सम्यग वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव । कच्चित् सुराधिप: प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात् तव
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে পাণ্ডব! তুমি কি প্রাপ্ত অস্ত্রসমূহ যথার্থভাবে আয়ত্ত করেছ? আর দেবাধিপ ইন্দ্র অথবা রুদ্র কি প্রসন্ন হয়ে তোমাকে দিব্যাস্ত্র দান করেছেন?”
Verse 5
यथा दृष्टश्न॒ ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक् । यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्ष ते
বৈশম্পায়ন বললেন— “শত্রুদমন! তুমি যেমন করে শক্র (ইন্দ্র)-কে দর্শন করেছ, অথবা পিনাকধারী ভগবান শিবকে দেখেছ; যেমন করে দিব্যাস্ত্র লাভ করেছ; এবং যেমন করে তোমার দেবারাধনা সফল হয়েছে— সবই যথাযথ বলো। আর ইন্দ্র যে বললেন, ‘অর্জুন আমার অতি প্রিয় কাজ সম্পন্ন করেছে’, সেই প্রিয় কাজটি কী, যা তুমি করেছ?”
Verse 6
यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम । कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते कि प्रियं कृतम्
বৈশম্পায়ন বললেন— “অরিন্দম! ভগবান শতক্রতু (ইন্দ্র) তোমাকে যেমন বলেছিলেন এবং বলেছিলেন, ‘তুমি আমার প্রিয় কাজ সম্পন্ন করেছ’— তবে বলো, তুমি তাঁর কোন প্রিয় কাজটি করেছ?”
Verse 7
एतदिच्छाम्यहं श्रीतुं विस्तरेण महाद्युते । यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ
বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহাদ্যুতি বীর! আমি বিস্তারে শুনতে চাই—কীভাবে মহাদেব এবং তদ্রূপ দেবরাজ ইন্দ্র তোমার প্রতি প্রসন্ন হলেন, হে নিষ্পাপ শত্রুদমনকারী!
Verse 8
यच्चापि वज्पाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम । एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय
আর হে অরিন্দম ধনঞ্জয়! বজ্রধারী ইন্দ্রের জন্য তুমি যে প্রিয় কর্ম সম্পন্ন করেছ, তা-ও সম্পূর্ণভাবে আমাকে বলো; আমি সমগ্র বৃত্তান্ত বিস্তারে শুনতে চাই।
Verse 9
अजुन उवाच शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् | शतक्रतुमहं देव॑ं भगवन्तं च शड्करम्
অর্জুন বললেন—মহারাজ, শুনুন; যে বিধানে আমি শতক্রতু দেবরাজ ইন্দ্র এবং ভগবান শঙ্করের দর্শন লাভ করেছিলাম, তা আমি বলছি।
Verse 10
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन । भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम्
হে অরিমর্দন রাজন! আপনার বলা সেই বিদ্যা অধ্যয়ন করে এবং আপনারই আদেশে আমি তপস্যার জন্য বনের দিকে যাত্রা করলাম।
Verse 11
भगुतुड़्मथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तप: । एकरात्रोषित: कज्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि
কাম্যক বন থেকে যাত্রা করে তপস্যায় স্থিরপ্রতিজ্ঞ হয়ে আমি ভৃগুতুঙ্গ পর্বতে পৌঁছালাম। সেখানে এক রাত্রি বাস করে এগিয়ে গেলে পথে আমি এক ব্রাহ্মণকে দেখলাম।
Verse 12
स मामपृच्छत् कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे । तस्मा अवितथं सर्वमन्रुवं कुरुनन्दन,उन्होंने मुझसे कहा--“कुन्तीनन्दन! कहाँ जाते हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।” तब मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बता दिया
তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন—“কুন্তীপুত্র, তুমি কোথায় যাচ্ছ? স্পষ্ট করে বলো।” তখন, কুরু-নন্দন, আমি কোনো বিকৃতি না করে সত্যসত্যই সব কথা তাঁকে জানালাম।
Verse 13
स तथ्यं मम तच्छुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम | अपूजयत मां राजन प्रीतिमांश्वाभवन्न्मयि,नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणदेवताने मेरी यथार्थ बातें सुनकर मेरी प्रशंसा की और मुझपर बड़े प्रसन्न हुए
নৃপশ্রেষ্ঠ! আমার সত্য কথা শুনে সেই ব্রাহ্মণদেব আমাকে সম্মান করলেন; হে রাজন, তিনি আমার প্রতি প্রীতিতে পরিপূর্ণ হলেন।
Verse 14
ततो मामब्रवीत् प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत । तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्स्से विबुधाधिपम्
তারপর তিনি প্রসন্ন হয়ে আমাকে বললেন—“হে ভারত, তপস্যার আশ্রয় গ্রহণ করো। তপস্বী হয়ে অচিরেই তুমি দেবরাজ ইন্দ্রকে দর্শন করবে।”
Verse 15
ततो<हं वचनात् तस्य गिरिमारुह्मु शैशिरम् । तपो5तप्यं महाराज मासं मूलूफलाशन:,महाराज! उनके इस आदेशको मानकर मैं हिमालय पर्वतपर आरूढ़ हो तपस्यामें संलग्न हो गया और एक मासतक केवल फल-फूल खाकर रहा
মহারাজ! তাঁর আদেশ মান্য করে আমি শীতল হিমালয় পর্বতে আরোহণ করলাম এবং তপস্যায় প্রবৃত্ত হলাম; এক মাস ধরে আমি কেবল মূল ও ফল আহার করলাম।
Verse 16
द्वितीयश्षापि मे मासो जल॑ भक्षयतो गत: । निराहारस्तृतीये5थ मासे पाण्डवनन्दन
এইভাবে আমার দ্বিতীয় মাসও কেবল জল পান করে কেটে গেল। হে পাণ্ডবনন্দন, তৃতীয় মাসে আমি সম্পূর্ণ নিরাহার রইলাম।
Verse 17
ऊर्ध्वबाहुश्नतुर्थ तु मासमस्मि स्थितस्तदा । नच मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत्
চতুর্থ মাসে আমি ঊর্ধ্ববাহু হয়ে দাঁড়িয়ে রইলাম; তবু আমার প্রাণশক্তি ক্ষয় পেল না—এ যেন এক আশ্চর্যই মনে হল।
Verse 18
पज्चमे त्वथ सम्प्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत्,पाँचवाँ महीना प्रारम्भ होनेपर जब एक दिन बीत गया तब दूसरे दिन एक शूकररूपधारी जीव मेरे निकट आया
পঞ্চম মাস এলে, প্রথম দিনটি কেটে যাওয়ার পর, দ্বিতীয় দিনে বরাহরূপ ধারণ করা এক সত্তা আমার নিকটে এসে উপস্থিত হল।
Verse 19
निघ्नन् प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्ररणैरपि । सम्मार्जञ्जठरेणोर्वी विवर्तश्न मुहुर्मुहु:
সে থুতনি দিয়ে মাটিতে আঘাত করত এবং শিং দিয়েও খুঁড়ে তুলত; পা দিয়ে ভূমি খনন করত। আবার বারবার শুয়ে পড়ে পেট দিয়ে মাটি এমনভাবে ঘষে পরিষ্কার করত, যেন সেখানে ঝাঁট দেওয়া হয়েছে।
Verse 20
अनु तस्यापरं भूतं महत् कैरातसंस्थितम् । भधनुर्बाणासिमत् प्राप्तं सत्रीगणानुगतं तदा
তার পেছনে কিরাতরূপে এক মহান পুরুষ আবির্ভূত হল। তার হাতে ধনুক-বাণ ও খড়্গ ছিল, আর তখন তার সঙ্গে নারীদের এক দলও ছিল।
Verse 21
ततो<हं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद् भूतं लोमहर्षणम्
তখন আমি ধনুক তুলে নিলাম এবং আমার দুই অক্ষয় মহাতূণীরও ধারণ করলাম; তারপর সেই রোমাঞ্চকর সত্তাটিকে একটি বাণ দিয়ে আঘাত করলাম।
Verse 22
तब मैंने धनुष तथा अक्षय तरकस लेकर एक बाणके द्वारा उस रोमांचकारी सूकरपर आघात किया ।।
তখন আমি ধনুক ও অক্ষয় তূণীর নিয়ে একটিমাত্র বাণে সেই রোমাঞ্চকর বরাহকে আঘাত করলাম। ঠিক সেই মুহূর্তে কিরাতও তার শক্তিশালী ধনুক পূর্ণ টেনে আরও দৃঢ় আঘাত করল—যাতে আমার হৃদয় যেন কেঁপে উঠল।
Verse 23
स तु मामब्रवीद् राजन् मम पूर्वपरिग्रह: । मृगयाधर्ममुत्स॒ज्य किमर्थ ताडितस्त्वया
তখন সে কিরাত আমাকে বলল—“রাজন! এই বরাহটি আগে থেকেই আমার শিকার ছিল। শিকারের ধর্ম ত্যাগ করে তুমি কেন একে আঘাত করলে?”
Verse 24
एष ते निशितैर्बाणैर्दर्प हन्मि स्थिरो भव । स धनुष्मान् महाकायस्ततो मामभ्यभाषत
আমি বললাম—“স্থির থাকো; এই তীক্ষ্ণ বাণে আমি তোমার দম্ভ চূর্ণ করব।” তখন সেই মহাকায় ধনুর্ধর কিরাতও আমাকে পাল্টা কথা বলল।
Verse 25
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरै: । तं॑ चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम्
তারপর সে কিরাত মহাবাণের ঝড়ে আমাকে এমনভাবে ঢেকে দিল, যেন পর্বতকে প্রবল বর্ষা আচ্ছন্ন করেছে। তখন আমিও মহা বাণবৃষ্টিতে তাকে চারদিক থেকে আচ্ছাদিত করলাম।
Verse 26
ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनुमन्त्रितै: । प्रत्यविध्यमहं तं॑ तु वजैरिव शिलोच्चयम्
তারপর আমি দীপ্ত অগ্রভাগযুক্ত, পূর্ণ টানে ছোড়া ও মন্ত্রবলে সংবলিত বাণে তাকে বারবার বিদ্ধ করলাম—যেন বজ্রাঘাতে শিলাপর্বত বিদীর্ণ হচ্ছে।
Verse 27
तस्य तच्छतथा रूपमभवच्च सहस्रधा । तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम्,उस समय उसके सैकड़ों और सहस्रों रूप प्रकट हुए और मैंने उसके सभी शरीरोंपर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी
তখন তার রূপ শত-সহস্র প্রকারে প্রকাশ পেল; আর আমি আমার শর দিয়ে তার সেই সকল দেহকে বিদ্ধ করে গভীরভাবে আহত করলাম।
Verse 28
पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत । अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुन:,भारत! फिर उसके वे सारे शरीर एकरूप दिखायी दिये। महाराज! उस एकरूपमें भी मैंने उसे पुन: अच्छी तरह घायल किया
তারপর, হে ভারত, সেই সকল দেহ আবার একত্র হয়ে এক রূপে দেখা দিল। হে মহারাজ, সেই একীভূত রূপেও আমি তাকে পুনরায় বিদ্ধ করে ভালোভাবে আহত করলাম।
Verse 29
अर्णुर्ब॑हच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिरा: पुन: । एकीभूतस्तदा राजन् सो<भ्यवर्तत मां युधि
হে রাজন, কখনও সে অতি ক্ষুদ্র দেহ ধারণ করত, কিন্তু তার মস্তক হতো বিরাট; আবার কখনও সে বিশাল দেহ নিত, আর মস্তক হতো ক্ষুদ্র। শেষে সে একীভূত হয়ে এক রূপে এসে যুদ্ধে আমার সম্মুখে অগ্রসর হলো।
Verse 30
यदाभिभवितु बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे । ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যখন তীরের প্রবল বর্ষণ করেও আমি রণে তাকে দমন করতে পারলাম না, তখন আমি মহাস্ত্র—বায়ব্যাস্ত্র—প্রয়োগ করলাম।
Verse 31
न चैनमशकं हन्तुं हल 0 खा भवत् | तस्मिन् प्रतिहते चास्त्रे मे महानभूत्,किंतु उससे भी उसका वध न कर सका। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई। वायव्यास्त्रके निष्फल हो जानेपर मुझे महान् आश्चर्य हुआ
হে ভারত, বায়ব্যাস্ত্র দিয়েও আমি তাকে বধ করতে পারলাম না। আর সেই অস্ত্রও যখন প্রতিহত হয়ে নিষ্ফল হলো, তখন আমার মধ্যে মহা বিস্ময় জাগল।
Verse 32
भूय एव महाराज सविशेषमहं ततः । अस्त्रपूगेन महता रणे भूतमवाकिरम्,महाराज! तब मैंने पुनः विशेष प्रयत्न करके रणभूमिमें किरातरूपधारी उस अद्भुत पुरुषपर महान् अस्त्रसमूहकी वर्षा की
অর্জুন বললেন—মহারাজ! তারপর আমি বিশেষ প্রচেষ্টা করে রণক্ষেত্রে কিরাত-রূপধারী সেই আশ্চর্য পুরুষের উপর মহা অস্ত্রসমূহের প্রবল বর্ষণ করলাম।
Verse 33
स्थूणाकर्णमथो जालं शरवर्षमथोल्बणम् | शलभास्त्रमश्मवर्ष समास्थायाहमभ्ययाम्,स्थूणाकर्ण5, वारुणास्त्र-, भयंकर शरवर्षास्त्रर, शलभास्त्र5<४ तथा अभ्मवर्ष४ इन अस्त्रोंका सहारा ले मैं उस किरातपर टूट पड़ा
অর্জুন বললেন—স্থূণাকর্ণ, জাল, ভয়ংকর শরবর্ষ, শলভাস্ত্র ও অশ্মবর্ষ—এই অস্ত্রগুলির আশ্রয় নিয়ে আমি সেই কিরাতের দিকে সোজা ধেয়ে গেলাম।
Verse 34
जग्रास प्रसभं तानि सर्वाण्यस्त्राणि मे नृप । तेषु सर्वेषु जग्धेषु ब्रह्मास्त्र महदादिशम्
অর্জুন বললেন—হে নৃপ! সে আমার সব অস্ত্রই বলপূর্বক গ্রাস করে নিল। যখন সবই গ্রাসিত হল, তখন আমি মহৎ ব্রহ্মাস্ত্র প্রয়োগ করলাম।
Verse 35
ततः प्रज्वलितैर्बाणै: सर्वतः सोपचीयते । उपचीयमानश्न मया महास्त्रेण व्यवर्धत
তখন জ্বলন্ত বাণে সেই অস্ত্র চারদিকে প্রসারিত হতে লাগল; আর আমার মহাস্ত্রের প্রেরণায় সেই ব্রহ্মাস্ত্র আরও অধিক বেগে বৃদ্ধি পেতে লাগল।
Verse 36
ततः: संतापिता लोका मत्प्रसूतेन तेजसा । क्षणेन हि दिश: खं च सर्वतो हि विदीपितम्
অর্জুন বললেন—তারপর আমার থেকে নির্গত সেই তেজে সেখানে সকলেই দগ্ধবোধ করল। এক মুহূর্তেই দিকসমূহ ও আকাশ সর্বত্র অগ্নিশিখায় উদ্দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 37
तदप्यस्त्रं महातेजा: क्षणेनैव व्यशातयत् । ब्रह्मास्त्रे तु हते राजन् भयं मां महदाविशत्
অর্জুন বললেন—সেই মহাতেজস্বী মুহূর্তেই সেই অস্ত্রটিকেও নিষ্ক্রিয় করে দিলেন। কিন্তু, রাজন, ব্রহ্মাস্ত্র বিনষ্ট হতেই আমাকে মহাভয় আচ্ছন্ন করল।
Verse 38
परंतु उस महान् तेजस्वी वीरने क्षणभरमें ही मेरे उस ब्रह्मास्त्रको भी शान्त कर दिया। राजन! उस ब्रह्मास्त्रके नष्ट होनेपर मेरे मनमें महान् भय समा गया ।।
তখন আমি ধনুক তুলে, মহাবাণে পূর্ণ আমার দুই অক্ষয় তূণীরসহ, সেই আশ্চর্য সত্তার দিকে ঝাঁপিয়ে পড়ে দ্রুত আঘাত করতে লাগলাম; কিন্তু সে সেসব অস্ত্রকেও যেন খাদ্যের মতো গ্রাস করে নিল। ব্রহ্মাস্ত্র নিষ্ফল হতেই, রাজন, আমার মনে প্রবল ভয় জেগে উঠল।
Verse 39
हतेष्वस्त्रेषु सर्वेषु भक्षितेष्वायुधेषु च । मम तस्य च भूतस्य बाहुयुद्धमवर्तत,जब मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट होकर उसके आहार बन गये, तब मेरा उस अलौकिक प्राणीके साथ मल्लयुद्ध प्रारम्भ हो गया
যখন আমার সব অস্ত্র নিঃশেষ হল এবং আমার অস্ত্রশস্ত্রও তার দ্বারা ভক্ষিত হল, তখন সেই অলৌকিক সত্তা ও আমার মধ্যে বাহুযুদ্ধ শুরু হল।
Verse 40
व्यायामं मुष्टिभि: कृत्वा तलैरपि समागतै: । अपाययंश्व तद् भूत॑ निश्रचेष्टमगमं महीम्
আমি তার সঙ্গে জড়িয়ে মুষ্টি ও খোলা তালুর আঘাত করলাম; কিন্তু তাকে বশ করতে পারলাম না। পরাভূত হয়ে আমি নিস্তেজ হয়ে মাটিতে লুটিয়ে পড়লাম।
Verse 41
ततः प्रहस्य तद् भूतं तत्रैवान्तरधीयत । सह स्त्रीभिर्महाराज पश्यतो मे<द्भधुतोपमम्
তখন সেই অলৌকিক সত্তা হেসে উঠল এবং, মহারাজ, আমার চোখের সামনেই সেই স্থানে নারীদেরসহ অন্তর্ধান করল—অদ্ভুতের মতো।
Verse 42
एवं कृत्वा स भगवांस्ततो<न्यद् रूपमास्थित: । दिव्यमेव महाराज वसानो<द्धभुतमम्बरम्
এভাবে করে সেই ভগবান পরে অন্য এক রূপ ধারণ করলেন। হে মহারাজ! কিরাত-রূপ ত্যাগ করে দেবাধিদেব মহেশ্বর স্বীয় দিব্য স্বরূপে প্রকাশিত হলেন এবং আশ্চর্য, অলৌকিক বসন পরিধান করে সেখানেই দাঁড়ালেন।
Verse 43
हित्वा किरातरूपं च भगवांस्त्रिदशे श्वर: । स्वरूपं दिव्यमास्थाय तस्थौ तत्र महेश्वर:
কিরাত-রূপ ত্যাগ করে ত্রিদশেশ্বর ভগবান মহেশ্বর স্বীয় দিব্য স্বরূপ ধারণ করে সেখানেই স্থির হয়ে দাঁড়ালেন।
Verse 44
अदृश्यत तत: साक्षाद् भगवान् गोवृषध्वज: । उमासहायो व्यालधृग् बहुरूप: पिनाकधृकू
তারপর বৃষধ্বজ ভগবান স্বয়ং প্রত্যক্ষ হলেন—উমাসহ, অঙ্গে সাপ ধারণ করে, বহুরূপী, এবং হাতে পিনাক ধনু ধারণ করে।
Verse 45
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम् । शूलपाणिरथोवाच तुष्टोउस्मीति परंतप
রণক্ষেত্রে শূলপাণি আমার কাছে এসে, পূর্বের মতোই আমার সম্মুখে দাঁড়ালেন। তারপর বললেন—“হে পরন্তপ! আমি তোমার প্রতি সন্তুষ্ট।”
Verse 46
ततस्तदू धनुरादाय तूणौ चाक्षय्यसायकौ । प्रादान्ममैव भगवान् धारयस्वेति चाब्रवीत्
তখন ভগবান সেই ধনু ও অক্ষয় বাণে পূর্ণ দুই তূণীর তুলে আমাকে দিলেন এবং বললেন—“এগুলো ধারণ কর।” তারপর বললেন—“হে পরন্তপ! আমি তোমার প্রতি সন্তুষ্ট। বলো—তোমার কোন কাজ সিদ্ধ করব? বীর! অমরত্ব ব্যতীত, মনে যে ইচ্ছা আছে বলো—আমি তা পূর্ণ করব।”
Verse 47
तुष्टोडस्मि तव कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते । यत् ते मनोगतं वीर तद् ब्रूहि वितराम्पहम्
হে কৌন্তেয়! আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন। বলো, তোমার জন্য আমি কী করব? হে বীর! তোমার হৃদয়ে যে কামনা আছে তা প্রকাশ করো; আমি তা দান করব।
Verse 48
ततः प्राञज्जलिरेवाहमस्त्रेषु गतमानस:
তখন আমি করজোড়ে দাঁড়ালাম; আমার মন সম্পূর্ণ অস্ত্রবিদ্যায় নিবিষ্ট ছিল। মনে মনে ভগবান শঙ্করকে প্রণাম করে বললাম—“যদি প্রভু আমার প্রতি প্রসন্ন হন, তবে এই বরই আমার কাম্য: দেবতাদের নিকট যে যে দিব্যাস্ত্র আছে, আমি সেগুলি সকলই জানতে চাই।” এ কথা শুনে ভগবান শঙ্কর বললেন—“পাণ্ডুনন্দন! আমি তোমাকে সকল দিব্যাস্ত্র লাভের বর দিচ্ছি।”
Verse 49
प्रणम्य मनसा शर्व ततो वचनमाददे । भगवान् मे प्रसन्नश्वेदीप्सितो5यं वरो मम
মনে মনে শর্ব (শিব)কে প্রণাম করে আমি বললাম—“যদি ভগবান আমার প্রতি প্রসন্ন হন, তবে এই বরই আমার অভীষ্ট: দেবতাদের নিকট রক্ষিত যে দিব্যাস্ত্রসমূহ আছে, আমি সেগুলি সকলই জানতে ও লাভ করতে চাই।”
Verse 50
अस्त्राणीच्छाम्यहं ज्ञातुं यानि देवेषु कानिचित् । ददानीत्येव भगवानन्रवीत् त्रयम्बकश्न माम्
অর্জুন বলল—“দেবতাদের মধ্যে যে যে দিব্যাস্ত্র আছে, আমি সেগুলি জানতে চাই।” তখন ভগবান ত্র্যম্বক (শিব) আমাকে বললেন—“আমি দিচ্ছি।”
Verse 51
रौद्रमस्त्रं मदीयं त्वामुपस्थास्यति पाण्डव । प्रददौ च मम प्रीत: सो<स्त्रं पाशुपतं महत्
“হে পাণ্ডব! আমার রৌদ্র অস্ত্র নিজে থেকেই তোমার অধিকারভুক্ত হবে।” এ কথা বলে প্রসন্ন ভগবান পাশুপতি আমাকে তাঁর মহান পাশুপত অস্ত্র প্রদান করলেন।
Verse 52
उवाच च महादेवो दत्त्वा मे5स्त्रं सनातनम् | न प्रयोज्यं भवेदेतन्मानुषेषु कथठ्चन,अपना सनातन अस्त्र मुझे देकर महादेवजी फिर बोले--तुम्हें मनुष्योंपर किसी प्रकार इस अस्त्रका प्रयोग नहीं करना चाहिये
আমাকে তাঁর সনাতন অস্ত্র দান করে মহাদেব আবার বললেন—“মানুষের বিরুদ্ধে কোনো অবস্থাতেই এই অস্ত্র প্রয়োগ করা যাবে না।”
Verse 53
जगद् विनिर्दहेदेवमल्पतेजसि पातितम् | पीड्यमानेन बलवत् प्रयोज्यं स्याद्ू धनंजय
অর্জুন বললেন—“যদি অল্প তেজস্বীর ওপর নিক্ষিপ্ত হলে এভাবে সমগ্র জগৎ দগ্ধ হয়ে যায়, তবে হে ধনঞ্জয়, এটি কেবল প্রকৃত শক্তিশালীর বিরুদ্ধে, প্রবল শক্তি প্রয়োগ করে তবেই ব্যবহারযোগ্য।”
Verse 54
तदप्रतिहतं दिव्यं सर्वास्त्रप्रतिषिधनम्
অর্জুন বললেন—“সে অস্ত্র অপ্রতিহত, দিব্য; এবং সকল অস্ত্রকে প্রতিহত ও নিষ্ক্রিয় করার ক্ষমতাসম্পন্ন।”
Verse 55
उत्सादनममित्राणां परसेनानिकर्तनम्
অর্জুন বললেন—“সে অস্ত্র শত্রুনাশক, প্রতিপক্ষের সেনাবিনাশক। তাকে লাভ করা অতি দুর্লভ। দেবতা, দানব ও রাক্ষসের পক্ষেও তার অপ্রতিহত বেগ সহ্য করা কঠিন। তারপর ভগবান শিবের আদেশে আমি সেখানেই বসে রইলাম; আর আমার চোখের সামনেই তিনি অন্তর্ধান করলেন।”
Verse 56
दुरासदं दुष्प्रसहं सुरदानवराक्षसै: । अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम्
অর্জুন বললেন—“সে (দিব্য শক্তি/অস্ত্র) অতি দুরাসদ ও অসহনীয়—দেবতা, দানব ও রাক্ষসদের পক্ষেও। তারপর তাঁর অনুমতি পেয়ে আমি সেখানেই বসে রইলাম; আর আমার চোখের সামনেই মহাদেব অন্তর্ধান করলেন।”
Verse 57
प्रेक्षतश्नैेव मे देवस्तत्रैवान्तरधीयत
অর্জুন বললেন—আমি তখনও তাকিয়ে আছি, এমন সময় সেই দিব্য সত্তা সেখানেই ধীরে ধীরে অন্তর্ধান করলেন। তিনি শত্রুনাশক ও প্রতিপক্ষ-সেনাবিধ্বংসক; তাঁকে লাভ করা অতিশয় দুর্লভ। দেবতা, দানব ও রাক্ষসের পক্ষেও তাঁর বেগ সহ্য করা অত্যন্ত কঠিন। তারপর ভগবান শিবের আদেশে আমি সেই স্থানেই বসে রইলাম, আর তিনি আমার চোখের সামনেই অদৃশ্য হয়ে গেলেন।
Verse 167
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि गन्धमादनवासे युधिष्ठटिरार्जुनसंवादे सप्तषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বে—নিবাতকবচ-যুদ্ধপর্বের অন্তর্গত—গন্ধমাদনে পাণ্ডবদের বাসকালে, যুধিষ্ঠির ও অর্জুনের সংলাপে, একশো সাতষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 473
अमरत्वमपाहाय ब्रूहि यत् ते मनोगतम् । तदनन्तर मेरे धनुष और अक्षय बाणोंसे भरे हुए दोनों तरकस लेकर भगवान् शिवने मुझे ही दे दिये और कहा--'परंतप! ये अपने अस्त्र ग्रहण करो।' कुन्तीकुमार! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ। बोलो
অর্জুন বললেন—“অমরত্ব বাদ দিয়ে, তোমার মনে যা আছে তা বলো।” এরপর ভগবান শিব আমার ধনুক এবং অক্ষয় বাণে পূর্ণ দুই তূণীর তুলে নিয়ে আমাকে ফিরিয়ে দিয়ে বললেন—“পরন্তপ! এই অস্ত্রগুলি গ্রহণ করো। কুন্তীপুত্র! আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন। বলো—তোমার কোন কাজ সিদ্ধ করে দিই? বীর! তোমার হৃদয়ে যে বাসনা আছে, বলো; আমি তা পূর্ণ করব। অমরত্ব বাদ দিয়ে, মনে যা আছে তাই বলো।”
Verse 536
अस्त्राणां प्रतिघाते च सर्वथैव प्रयोजयेत् । “अपनेसे अल्पशक्तिवाले विपक्षी पर यदि इसका प्रहार किया जाय तो यह सम्पूर्ण विश्वको दग्ध कर देगा। धनंजय! जब शत्रुके द्वारा अपनेको बहुत पीड़ा प्राप्त होने लगे
অর্জুন বললেন—“অস্ত্রের প্রতিঘাতে এ অস্ত্র সর্বতোভাবে প্রয়োগ করা উচিত। যদি এটি কম শক্তিসম্পন্ন প্রতিদ্বন্দ্বীর উপর নিক্ষেপ করা হয়, তবে সমগ্র জগৎ দগ্ধ হয়ে যাবে। অতএব, হে ধনঞ্জয়! শত্রুর দ্বারা যখন প্রবল যন্ত্রণা ভোগ করতে হয়, তখন আত্মরক্ষার জন্যই এর ব্যবহার করা উচিত। শত্রুর অস্ত্রসমূহ বিনষ্ট করতে এর প্রয়োগ সর্বথাই সমুচিত।”
Verse 546
मूर्तिमन्मे स्थित पारश्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे । इस प्रकार भगवान् वृषभध्वजके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करनेवाला और कहीं भी कुण्ठित न होनेवाला दिव्य पाशुपतास्त्र मूर्तिमान् हो मेरे पास आकर खड़ा हो गया
অর্জুন বললেন—গোবৃষধ্বজ ভগবান প্রসন্ন হলে, সকল অস্ত্র নিবারণকারী এবং কোথাও অপ্রতিহত সেই দিব্য পাশুপতাস্ত্র মূর্তিমান হয়ে আমার পাশে এসে দাঁড়াল।
How to maintain disciplined agency when perception is compromised: Arjuna must act decisively while resisting panic and avoiding indiscriminate escalation amid māyā-driven sensory collapse.
Competence is ethical: trained discernment and proportionate response—matching specific threats with specific remedies—functions as a moral technology for stability under uncertainty.
No explicit phalaśruti is present in this chapter segment; its meta-significance is implicit, illustrating how instruction (Indra’s teaching) and composure transform chaos into intelligible, governable conditions.