Adhyaya 74
Udyoga ParvaAdhyaya 7424 Verses

Adhyaya 74

भीमसेनस्य आत्मबलप्रशंसा — Bhīmasena’s Assertion of Strength (Udyoga Parva, Adhyāya 74)

Upa-parva: Bhīmasena–Kṛṣṇa Saṃvāda (Boast and Reassurance Episode)

Vaiśaṃpāyana narrates a post-remark exchange in which Bhīmasena, described as consistently wrathful and impatient of insult, responds to Vāsudeva Kṛṣṇa. Bhīma interprets Kṛṣṇa’s words as misjudging his intent and capacity in battle, and he challenges the appropriateness of such speech toward him. He then delivers a self-assessment that he acknowledges as generally improper (self-praise being socially discouraged), yet he proceeds due to provocation. Employing cosmic-scale imagery, Bhīma claims he could restrain even the two ‘worlds’ (rodasī) if they collided in anger, and describes the inescapability of his arms, likening them to massive iron bars. He asserts that even formidable natural or divine forces would not protect adversaries once he has engaged them, and he frames future combat as the arena where Kṛṣṇa will empirically ‘know’ his power. Despite the intensity, Bhīma concludes by reframing his endurance of hardship as grounded in friendship and compassion, requesting that the Bhāratas not be destroyed—thus tempering martial boast with a stated preference for the welfare of the polity.

Chapter Arc: भीम—जो सामान्यतः अग्नि-सा उग्र है—आज एकान्त में बोझ से दबे दुर्बल-से मनुष्य की भाँति बैठा है; कभी हँसता, कभी रोता-सा, आँखें मूँदे, भौंहें चढ़ाए—यह उलटा दृश्य सबको चकित करता है। → श्रीकृष्ण (शौरि, शार्ङ्गधन्वा) भीम के मुख से निकले ‘अभूतपूर्व मृदु’ वचन सुनकर आश्चर्य करते हैं—यह तो पावक में शीतलता या पर्वत के सरकने जैसा है। वे भीम के भीतर उठे विषाद, ग्लानि और मन्यु-जन्य विक्षोभ को पहचानकर उसे टटोलते हैं और कारण पूछते हैं। → कृष्ण का तीक्ष्ण, पर करुण, उत्तेजक उपदेश: ‘यह तुम्हारे योग्य नहीं; अपने कर्म, अपने कुल और क्षत्रिय-धर्म को देखो—उठो, विषाद मत करो; जो पराक्रम से नहीं मिलता, उसे क्षत्रिय शोभा नहीं देता।’ भीम के ‘असंगत’ मृदु-वचन को वे पर्वत-सरकने जैसा महदाश्चर्य कहकर झकझोरते हैं। → कृष्ण भीम के मन में जमी ग्लानि को ‘अनुरूप नहीं’ कहकर काटते हैं और उसे स्थिरता, धैर्य तथा कर्तव्य-निष्ठा की ओर मोड़ते हैं—भीम का मन्यु अब दिशाहीन नहीं, धर्म-संगत संकल्प में ढलने लगता है। → कृष्ण द्वारा भीम को उठाकर कर्तव्य-पथ पर लाने के बाद प्रश्न शेष रहता है—यह जाग्रत भीम आगे किस प्रतिज्ञा/कर्म-निर्णय की ओर बढ़ेगा, और दूत-यात्रा के व्यापक राजनैतिक संकट में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भीमवाक्यविषयक चौद्तत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ ऑपन-माजल बछ। अं कऋाज पड्चसप्ततितमो< ध्याय: श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा महाबाहु: केशव: प्रहसन्निव । अभूतपूर्व भीमस्य मार्दवोपहितं वच:

বৈশম্পায়ন বললেন—ভীমসেনের মুখে এমন অভূতপূর্ব কোমলতাপূর্ণ বাক্য শুনে মহাবাহু কেশব যেন হাসিতে ফেটে পড়লেন। তারপর শার্ঙ্গধন্বা রামানুজ শ্রীকৃষ্ণ দয়ায় আর্দ্র হয়ে পাশে বসা বৃকোদরকে নিজের বাক্য দ্বারা তেমনই উদ্দীপ্ত করলেন, যেমন বায়ু অগ্নিকে প্রজ্বলিত করে।

Verse 2

गिरेरिव लघुत्वं तच्छीतत्वमिव पावके । मत्वा रामानुज: शौरि: शार्ज्र्धन्वा वृकोदरम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—ভীমসেনের মুখে করুণায় স্নিগ্ধ সেই অভূতপূর্ব কোমল বাক্য শুনে মহাবাহু ভগবান শ্রীকৃষ্ণ হাসতে লাগলেন। যেন পর্বত হালকা হয়ে গেছে, কিংবা অগ্নিতে শীতলতা দেখা দিয়েছে—ভীমের মধ্যে এমনই বিস্ময়কর বিনয়ের উদয় হল। তা বুঝে রামানুজ শৌরি, শার্ঙ্গধনু ধারণকারী শ্রীকৃষ্ণ, পাশে বসা দয়ায় গলিত বৃকোদর ভীমকে বাক্য দ্বারা পুনরায় উদ্দীপ্ত করলেন—যেমন বায়ু অগ্নিকে প্রজ্বলিত করে।

Verse 3

संतेजयंस्तदा वाम्भिर्मातरिश्वेव पावकम्‌ | उवाच भीममासीनं कृपयाभिपरिप्लुतम्‌

তখন তিনি মাতরিশ্বা (বায়ুদেব) যেমন ঝোড়ো হাওয়ায় অগ্নিকে জ্বালিয়ে তোলে, তেমনি বাক্য দ্বারা পাশে বসা করুণায় প্লাবিত ভীমকে উদ্দীপ্ত করলেন।

Verse 4

श्रीभगवानुवाच त्वमन्यदा भीमसेन युद्धमेव प्रशंससि । वधाभिनन्दिन: क्रूरान्‌ धार्तराष्ट्रानू मिमर्दिषु:

শ্রীভগবান বললেন—হে ভীমসেন, অন্য দিনগুলোতে তুমি কেবল যুদ্ধেরই প্রশংসা করতে; মনে রাখতে ধৃতরাষ্ট্রের সেই নিষ্ঠুর পুত্রদের—যারা হত্যায় আনন্দ পায়—চূর্ণ করে দেওয়ার বাসনা।

Verse 5

न च स्वपिषि जागर्षि न्युब्ज: शेषे परंतप । घोरामशान्तां रुषतीं सदा वाचं प्रभाषसे

হে পরন্তপ! শুয়ে পড়লেও তুমি ঘুমোতে না, জেগেই থাকতে। আর কখনও শুতে হলে উপুড় হয়ে শুতে; তোমার মুখ থেকে সর্বদা ভয়ংকর, অশান্ত ও ক্রোধময় বাক্যই বেরোত।

Verse 6

निःश्वसन्नग्निवत्‌ तेन संतप्त: स्वेन मन्युना । अप्रशान्तमना भीम सधूम इव पावक:

হে ভীম! তুমি বারবার অগ্নির মতো দীর্ঘশ্বাস ফেলতে, আর নিজেরই ক্রোধে দগ্ধ হতে। তোমার মন শান্তি পেত না; ধোঁয়ায় আচ্ছন্ন শিখার মতো তুমি সর্বদা অশান্তিতে ঢাকা থাকতে।

Verse 7

एकान्ते निः:श्वसज्छेषे भारार्त इव दुर्बल: । अपि त्वां केचिदुन्मत्तं मन्यन्तेडतद्विदों जना:

একান্তে তুমি ভারাক্রান্ত দুর্বল মানুষের মতো বারবার দীর্ঘশ্বাস ফেলতে; তাই যারা এ কথা জানে না, এমন কতক লোক তোমাকে উন্মত্ত বলে মনে করে।

Verse 8

आरुज्य वक्षान्‌ निर्मूलान्‌ गज: परिरुजन्निव | निष्नन्‌ पद्धिः क्षितिं भीम निष्टनन्‌ परिधावसि

ভীম! যেমন হাতি গাছকে শিকড়সমেত উপড়ে ফেলে পায়ের পদাঘাতে চূর্ণ করে, তেমনি তুমিও পায়ে ভূমিতে আঘাত করতে করতে উচ্চ গর্জনে চারদিকে দৌড়াতে।

Verse 9

नास्मिज्जने5भिरमसे रह: क्षिपसि पाण्डव । नान्यं निशि दिवा चापि कदाचिदभिनन्दसि

পাণ্ডব! এই জনসমুদায়ে তুমি কখনও আনন্দ পেতে না; বরং একান্তে সময় কাটাতে। দিন হোক বা রাত, তুমি কখনও কাউকে অভিনন্দন বা সাদর সম্ভাষণ জানাতে না।

Verse 10

अकस्मात्‌ स्मयमानश्न रहस्यास्से रुदन्निव | जान्वोर्मूर्धानमाधाय चिरमास्से प्रमीलित:

কখনও তুমি হঠাৎ হাসতে, কখনও একান্তে বসে কাঁদছ বলে মনে হতো; আর কখনও হাঁটুর ওপর মাথা রেখে চোখ বুজে দীর্ঘক্ষণ বসে থাকতে।

Verse 11

भ्रुकुटिं च पुन: कुर्वन्नोष्ठी च विदशन्निव । अभीक्षणं दृश्यसे भीम सर्व तन्‍्मन्युकारितम्‌

ভীমসেন! আমি তোমাকে বারবার ভ্রূকুটি করে, যেন ঠোঁট কামড়াচ্ছ, এমনভাবে দেখেছি। এ সবই তোমার ক্রোধের কৃতকর্ম।

Verse 12

यथा पुरस्तात्‌ सविता दृश्यते शुक्रमुच्चरन्‌ । यथा च पश्चान्निर्मुक्तो ध्रुवं पर्येति रश्मिवान्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—যেমন পূর্বদিকে সূর্য উদিত হয়ে উজ্জ্বল দীপ্তি প্রকাশ করে দেখা যায়, এবং যেমন অগ্রসর হয়ে সেই রশ্মিমান সূর্য অবিচল নিয়মে পশ্চিমাভিমুখে গমন করে—তেমনি এই বিষয়ও অচ্যুত, নিয়ত ও নিশ্চিত ক্রমে অগ্রসর হয়।

Verse 13

तथा सत्य ब्रवीम्येतन्नास्ति तस्य व्यतिक्रम: । हन्ताहं गदयाभ्येत्य दुर्योधनममर्षणम्‌

তেমনি আমি সত্যই বলছি—এতে কোনো বিচ্যুতি হবে না। আমি গদা হাতে অগ্রসর হয়ে অসহিষ্ণু দুর্যোধনকে বধ করব।

Verse 14

इति सम मध्ये भ्रातृणां सत्येनालभसे गदाम्‌ । तस्य ते प्रशमे बुद्धिर्ध्रियतेडद्य परंतप

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে ভ্রাতৃদের মধ্যেই সত্যের বলেই তুমি গদা লাভ করেছিলে। অতএব, হে পরন্তপ, আজ তোমার বুদ্ধি শমন ও সংযমে স্থির থাকুক—আজ মনকে শান্তি প্রতিষ্ঠায় নিয়োজিত করো।

Verse 15

तुम अपने भाइयोंके बीचमें सत्यकी शपथ खाकर बार-बार गदा छूते हुए यह कहते थे -- जैसे सूर्यदेव पूर्वदिशामें उदित होते हुए अपने तेजोमण्डलको प्रकट करते दिखायी देते हैं और पश्चिमदिशामें वे ही अंशुमाली अस्ताचलको जाकर निश्चितरूपसे मेरुपर्वतकी परिक्रमा करते हैं, उनके इस नियममें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता; उसी प्रकार मैं यह सच कहता हूँ कि अमर्षशील दुर्योधनके पास जाकर अपनी गदासे उसके प्राण ले लूँगा। मेरे इस कथनमें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ सकता।” परंतप! ऐसी प्रतिज्ञा करनेवाले तुम-जैसे वीरशिरोमणिकी बुद्धि आज शान्ति-स्थापनमें लग रही है; (यह आश्वर्यकी बात है!) ।। १२ -१४ || अहो युद्धाभिकाड्क्षाणां युद्धकाल उपस्थिते । चेतांसि विप्रतीपानि यत्‌ त्वां भीर्भीम विन्दति,अहो! युद्धका अवसर उपस्थित होनेपर पहलेसे युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले लोगोंके विचार भी इतने बदल जाते हैं कि वे विपरीत सोचने लगते हैं। भीमसेन! जान पड़ता है, इसीलिये तुम्हें भी युद्धसे भय होने लगा है

বৈশম্পায়ন বললেন—ভ্রাতৃদের মধ্যেই তুমি সত্যের শপথ করে বারবার গদা স্পর্শ করে বলতে—‘যেমন সূর্য পূর্বদিকে উদিত হয়ে নিজের তেজোমণ্ডল প্রকাশ করে, এবং সেই রশ্মিমান সূর্য পশ্চিমের অস্তাচলে গিয়ে নিত্য মেরুর পরিক্রমা করে—তার নিয়মে কখনো ভেদ হয় না; তেমনি আমি সত্য বলছি—আমি অমর্ষশীল দুর্যোধনের কাছে গিয়ে আমার গদায় তার প্রাণ হরণ করব; আমার বাক্যে পরিবর্তন হতে পারে না।’ কিন্তু হে পরন্তপ, আজ সেই প্রতিজ্ঞাবদ্ধ বীরশিরোমণির বুদ্ধি শান্তি প্রতিষ্ঠায় নিবদ্ধ—এ বড় আশ্চর্য। হায়! যুদ্ধের সময় উপস্থিত হলে যুদ্ধকামীদের মনও উল্টো হয়ে যায়; তাই, হে ভীম, মনে হয় যুদ্ধের ভয় তোমাকেও গ্রাস করেছে।

Verse 16

अहो पार्थ निमित्तानि विपरीतानि पश्यसि । स्वप्रान्ते जागरान्ते च तस्मात्‌ प्रशममिच्छसि

বৈশম্পায়ন বললেন—হায়, হে পার্থ! তুমি ঘুমের শেষে ও জাগরণের শেষে—উভয় অবস্থাতেই বিপরীত ফল নির্দেশকারী অশুভ লক্ষণ দেখছ; তাই, হে কুন্তীনন্দন, তুমি শমন ও শান্তির কামনা প্রকাশ করছ।

Verse 17

अहो नाशंससे किज्वचित्‌ पुंस्त्वं क्लीब इवात्मनि । कश्मलेनाभिपन्नो$सि तेन ते विकृतं मन:

বৈশম্পায়ন বললেন—হায়! তুমি নিজের মধ্যে কোথাও পুরুষার্থ স্বীকার করছ না; যেন নিজের প্রতিই তুমি নপুংসক। কশ্মল (মোহ-ভ্রান্তি) তোমাকে আচ্ছন্ন করেছে, তাই তোমার মন বিকৃত হয়েছে।

Verse 18

अहो! कायर और नपुंसककी भाँति इस समय तुम अपनेमें कुछ भी पुरुषार्थ नहीं मानते। तुम्हारे ऊपर मोह छा गया है, जिससे तुम्हारी मानसिक दशा बिगड़ गयी है ।।

বৈশম্পায়ন বললেন—তোমার হৃদয় কাঁপছে, আর মন বিষাদে ডুবে যাচ্ছে। যেন জঙ্ঘা জড়তায় আবদ্ধ হয়ে গেছে, এগোতে পারছ না; তাই তুমি ‘শান্তি’ চাইছ—জ্ঞান থেকে নয়, সংকল্প ভেঙে পড়া থেকে।

Verse 19

अनित्यं किल मर्त्यस्य पार्थ चित्त चलाचलम्‌ | वातवेगप्रचलिता अछ्लीला शाल्मलेरिव

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পার্থ! বলে থাকে, মর্ত্যের চিত্ত এক সংকল্পে স্থির থাকে না; তা অনিত্য ও চঞ্চল। বায়ুর বেগে দুলতে থাকা শাল্মলী (শিমুল) তুলোর মতো তা টলমল করে।

Verse 20

तवैषा विकृता बुद्धिर्गवां वागिव मानुषी । मनांसि पाण्डुपुत्राणां मज्जयत्यप्लवानिव

বৈশম্পায়ন বললেন—তোমার এই বিকৃত বুদ্ধি যেন গোরুর মানববাক্য—অস্বাভাবিক ও বিকল। তেমনি এটি পাণ্ডুপুত্রদের মনকে উদ্বেগে ডুবিয়ে দেয়, যেমন নৌকা ছাড়া মানুষ গভীর সমুদ্রে ডুবে যায়।

Verse 21

इदं मे महदाश्चर्य पर्वतस्येव सर्पणम्‌ । यदीदृशं प्रभाषेथा भीमसेनासमं वच:

বৈশম্পায়ন বললেন—এ আমার কাছে মহা আশ্চর্য, যেন পর্বতই চলতে শুরু করেছে। হে ভীমসেন! তোমার মুখে এমন কথা শোভা পায় না; এই শান্তির প্রস্তাব আমাকে বিস্ময়ে ফেলেছে।

Verse 22

स दृष्टवा स्वानि कर्माणि कुले जन्म च भारत | उत्तिष्ठस्व विषादं मा कृथा वीर स्थिरो भव

হে ভারত! নিজের কর্মের দিকে চেয়ে দেখো, আর যে মহৎ কুলে তোমার জন্ম, তাও স্মরণ করো; উঠে দাঁড়াও। হে বীর! বিষাদ কোরো না; স্থির হয়ে ক্ষত্রিয়ধর্মের কর্তব্যে দৃঢ় থাকো।

Verse 23

न चैतदनुरूपं ते यत्‌ ते ग्लानिररिंदम । यदोजसा न लभते क्षत्रियो न तदश्लुते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে শত্রুদমন! তোমার মধ্যে যে গ্লানি জেগেছে, তা তোমার মতো বীরের পক্ষে মোটেই শোভন নয়; কারণ ক্ষত্রিয় যে বস্তু নিজের তেজ ও পরাক্রমে অর্জন করতে পারে না, তার ভোগ সে করে না।

Verse 75

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भीमोत्तेजकश्रीकृष्णवाक्ये पजञ्चसप्ततितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে, ভীমের তেজ উদ্দীপিতকারী শ্রীকৃষ্ণবাক্যে চিহ্নিত পঁচাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether forceful self-assertion (including socially disfavored self-praise) is justified to correct perceived disrespect, versus maintaining restraint to preserve harmonious counsel among allies.

Speech is ethically consequential: counsel should be truthful and strategic while honoring the recipient’s dignity; simultaneously, personal power must be governed by friendship, compassion, and responsibility to collective welfare.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the meta-level function is character-ethical, positioning Bhīma’s rhetoric as a psychological and political signal within the pre-conflict narrative rather than a ritualized promise of merit.